बेरोजगारी के आंकड़ों पर सरकार और विपक्ष आमने-सामने हैं।
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बेरोजगारी की समस्या, जिसे सरकार खुद अपने ही ताजा (एनएसएसओ 2017-18 के) आंकड़ों में भारी उछाल देख कर नकारने पर तुली हुई है, पिछले दशक में हमारी आंखों के सामने ही क्रमश: बनी है। हर साल खबरें आती हैं कि पुलिस या रेलवे की सरकारी नौकरियों की भर्ती खुलने पर जब कुछ हजार नौकरियों के लिए लाखों युवा पहुंच गए तो भारी भगदड़ मची। अपने शिक्षित बेरोजगार बच्चे को कहीं ‘लगवा’देने की दयनीय याचना करने वाले भी हर कहीं मिल जाते हैं। भारत में आजादी के चार दशकों तक समाजवाद अगर बहुत स्वीकार्य बना रहा तो इसी वजह से, कि उसने इस दौरान भरपूर सरकारी नौकरियों का सृजन किया। पर इससे मध्य वर्ग का आकार भी फैलता गया और महत्वाकांक्षाएं भी।
सामान्य किराना व्यापारी, बैंकों के क्लर्क, प्रैक्टिसविहीन वकील और डॉक्टर, लेक्चरर, सेल्स प्रतिनिधि, बड़े किसान- सबने पेट काटकर अपने बच्चों को उन शिक्षा संस्थाओं में भेजना शुरू किया जहां बड़े लोगों के बच्चे पढ़ते थे। फिर शिक्षा लोन की आकर्षक शुरुआत हुई, तो लोन लेकर बच्चे को पढ़ाने के इच्छुक माता-पिता की मांग देखकर कई राज्यों के राजनेताओं ने (इतना पैसा और किसके पास था?) बेशुमार निजी मेडिकल और इंजीनियरिंग कॉलेज खोल दिए, जहां से डिग्रीधारी डॉक्टरों-इंजीनियरों की एक बड़ी बाढ़ निकली और नौकरियों के अभाव में साल 2000 तक बेरोजगारों की संख्या एक करोड़ से एक करोड़ बीस लाख तक जा पहुंची।
इस चुनाव में बेरोजगारी पर विपक्ष सरकार को घेर रहा है?
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चुनाव के बीच कहां खो गए बुनियादी मुद्दे?
यह फिर एक चुनाव का साल है और सरकार साल 2017-18 के विकराल बेरोजगारी के उन आंकड़ों को नकार रही है, जो बरसों से अंतरराष्ट्रीय तौर से भरोसेमंद आंकड़े देती आई सरकार की सांख्यिकीय संस्था ने तैयार किए थे। इस बीच जाने किस तरह रपट मीडिया में लीक हुई। सरकार उस रपट को एक ड्राफ्ट रपट बता रही है जिसे अभी नीति आयोग सरीखी छन्नी से छाना जाना है। विचित्र बात है। ये आंकड़े किसी राजनीतिक विश्लेषण या अनुमान से नहीं, वैज्ञानिक तौर से तैयार किए मानकों पर प्रशिक्षित प्रतिनिधियों द्वारा घर-घर जाकर जमा किए गए सैंपलों के बहुत बड़े जखीरे से अनुभवी लोगों द्वारा तैयार किए जाते हैं। आज तक कभी भी उनकी विश्वसनीयता को किसी अन्य सरकारी संस्था से जंचवाया नहीं गया।
खैर, हालात ठीक नहीं हैं। बीते लोकसभा चुनाव में जिस गुजरात मॉडल की बात की गई थी, उस गुजरात में बेरोजगारी की दर सर्वाधिक है। एक रिपोर्ट के अनुसार, गुजरात में बेरोज़गारी दर सबसे तेज़ी से बढ़ी है। यह दर साल 2011-12 में 0.5 फीसदी थी, जबकि 2017-18 में बढ़कर 4.8 फीसदी पर पहुंच गई। हरियाणा, असम, झारखंड, केरल, ओडिशा, उत्तराखंड और बिहार में 2011-12 की तरह बेरोजगारी दर 2017-18 में भी राष्ट्रीय औसत से ज्यादा रही है। इसके अलावा, 2017-18 की इस सूची में पंजाब, तमिलनाडु, तेलंगाना और उत्तर प्रदेश नए राज्य शामिल हुए हैं। साल 2011-12 में जब आखिरी सर्वेक्षण हुआ था तो नौ राज्यों में बेरोजगारी दर राष्ट्रीय स्तर के मुकाबले अधिक थी। बरोजगारी दर हरियाणा में 8.6 फीसदी, असम में 8.1 फीसदी और पंजाब में 7.8 फीसदी रही।
ये आंकड़े जुलाई से लेकर जून के बीच की अवधि के हैं। मालूम हो कि मोदी सरकार ने इस रिपोर्ट को आधिकारिक रूप से जारी नहीं किया है। सरकार का कहना है कि यह अभी मसौदा है, जबकि इसके लिए सभी मंजूरियां मिल चुकी हैं। रिपोर्ट के मुताबिक साल 2017-18 में राष्ट्रीय स्तर पर बेरोजगारी दर 6.1 फीसदी रही, जबकि 2011-12 में यह 2.2 फीसदी था। साल 2017-18 में छत्तीसगढ़ में सबसे कम बेरोजगारी दर 3.3 फीसदी रही। यह दर मध्य प्रदेश में 4.5 फीसदी और पश्चिम बंगाल में 4.6 फीसदी रही। हालांकि सभी प्रमुख राज्यों में बेरोजगारी दर बढ़ी है। गुजरात में 2011-12 में सबसे कम बेरोजगारी दर थी, लेकिन 2017-18 में यह कर्नाटक के बराबर पहुंच गई और महाराष्ट्र, पश्चिम बंगाल और मध्य प्रदेश से अधिक हो गई है। देखना ये है कि इस लोकसभा चुनाव में कौन सी पार्टी बेरोजगारी के मुद्दे को एक मूलभूत जरूरत समझकर उठाती है और वादों पर खरा उतरती है।
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