सोशल मीडिया और 24 घण्टे के खबरिया चैनलों ने देश मे गजब की राजनीतिक मुखरता को जन्म दिया है।
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लोकसभा चुनाव में 2014 की ऐतिहासिक पराजय के बाद गठित एंटनी कमेटी ने जोर देकर कहा था कि देश भर के मतदाताओं में कांग्रेस की छवि प्रो मुस्लिम और एंटी हिन्दू की बन गई है और इसे बदलने की आवश्यकता है। 2019 तक आते-आते गुजरात, मप्र, राजस्थान के टेम्पल रन के बावजूद कांग्रेस एंटनी कमेटी की सिफारिशों पर अमल की जगह दिग्भ्रमित ज्यादा नजर आई है। वायनाड जाकर लड़ने का राहुल गांधी का निर्णय इसी दोहरी औऱ आधी अधूरी मनस्थिति का नतीजा था। असल मे वायनाड जाने का निर्णय ही अमेठी में राहुल और देश मे कांग्रेस की हार के बुनियादी सबबो में एक साबित हुआ है।
सोशल मीडिया और 24 घण्टे के खबरिया चैनलों ने देश मे गजब की राजनीतिक मुखरता को जन्म दिया है। संचार,सम्प्रेषण ने आज अंतिम छोर तक अपनी ताकत स्वयंसिद्ध की है, जिस दिन राहुल गांधी ने वायनाड में जाकर पर्चा भरा उस दिन औऱ उसके बाद 19 मई तक नामांकन रैली के वो वीडियो और चित्र देश के करोडो स्मार्ट फोन्स में मौजूद थे, जिसमें मुस्लिम लीग के झंडों ने कांग्रेस के झंडे को दबा रखा है। वायनाड की पूरी डेमोग्राफी लोगों के जुबान पर थी।
एंटनी की रिपोर्ट को क्यों दरकिनार कर रही कांग्रेस
दरअसल, 69 फीसदी अल्पसंख्यक वोटरों वाले इस संसदीय क्षेत्र से राहुल की जीत आखिरकार कांग्रेस को बहुत महंगी पड़ी क्योंकि इस चयन ने यही सन्देश स्थापित किया कि एक तरफ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी काशी जैसे शहर से चुनाव लड़ रहे हैं जो भारत की हजारों साल पुरानी हिन्दू अस्मिता से जुड़ा है जिसका उल्लेख पुराणों में भी मिलता है। वहीं मोदी को हटाने की लड़ाई लड़ने वाले राहुल उस वायनाड से मैदान में हैं जहां 69 फीसदी मुस्लिम और ईसाई हैं। अल्पसंख्यकवाद की इस राजनीति ने ही कांग्रेस को अधोपतन की कगार पर लाकर खड़ा किया है। राहुल गांधी आज भी इस वाम पोषित व्याख्या के लोह आवरण में कैद नजर आते हैं। वहीं प्रधानमंत्री मोदी ने अपने सियासी कौशल से खुद को बदलते वक्त के भारत के साथ सयुंक्त कर लिया है।
आज सेकुलवरवाद औऱ अल्पसंख्यकवाद की राजनीति के दिन खत्म हो गए हैं। देश में बहुलतावाद की नेहरुयुगीन थ्योरी को आर्थिक उदारीकरण के बाद के प्रगतिशील भारत में लोग सहजता से स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं हैं उन्हें लगता है यह बहुसंख्यकों की कीमत पर किया जा रहा है और मनमोहन सिंह जब प्रधानमंत्री के रूप में कहते हैं कि देश के संसाधनों पर पहला हक अल्पसंख्यकों का है तब कांग्रेस के प्रति धारणा का स्तर वही निर्मित होता है जिसे ए के एंटनी प्रो मुस्लिम फैक्टर के रूप में कांग्रेस की हार के कारणों में रेखांकित करते हैं। इस लोकसभा चुनाव के नतीजे बताते हैं कि देश के मुसलमानों ने 2014 के 9 फीसदी की तुलना में इस बार एक प्रतिशत कम यानी 8 फीसदी ही वोट किया है बीजेपी को।
राहुल गांधी आज भी परिवार के इंदिरा युगीन प्रभुत्व की परिछाइयों से बाहर नही आ पाए हैं !
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हार का मूल्यांकन कैसे करेंगे राहुल
इस बीच मुस्लिम बहुल वायनाड से राहुल साढ़े चार लाख वोट से जीतते हैं। अच्छा होता राहुल वायनाड की जगह गुजरात की किसी सीट से जाकर मोदी के घर जाकर चुनौती देते भले ही वे हार जाते, लेकिन उनकी एक अलग छवि निर्मित होती औऱ संभव है वे अमेठी से भी न हारते। लेकिन राहुल गांधी आज भी परिवार के इंदिरा युगीन प्रभुत्व की परिछाइयों से बाहर नही आ पाए हैं, जब कांग्रेस का गांधी परिवार कांग्रेस नेताओ के लिए सत्ता और चुनावी प्लेटफॉर्म न होकर एक अखिल भारतीय स्वीकार्यता का प्रतीक भी था।
नेहरू और इंदिरा के नेतृत्व में आजादी की लड़ाई का संघर्ष भी समाहित था। उन्होंने नेतृत्व को खुद भी निजी रूप से जमीनी अनुभव और योगदान से तपाया था लेकिन इंदिरा गांधी के बाद परिवार विशुद्ध रूप से विरासत पर अबलंबित है। 19 साल अध्यक्ष रहते हुए सोनिया गांधी ने कांग्रेस विचार और संगठन को आखिर क्या दिया है? इसकी ईमानदारी से व्याख्या होनी चाहिए?
वे इतिहास की सबसे शर्मनाक 44 सीट के सफर की गवाह बनी। 10 साल मनमोहन सिंह की सरकार क्षेत्रीय दलों और कांग्रेस के दरबारी लोगों के सत्ता सुख की सबब से ज्यादा कुछ नहीं दे पाई। राहुल गांधी ने 44 को 52 पर ला दिया। इसे देश के सबसे बड़े और पुराने राजनीतिक दल के लिए कोई उपलब्धि के रूप में कैसे अधिमान्य कर सकता है? भारत के संसदीय लोकतंत्र के लिए कांग्रेस का यह अधोपतन बेहद दुखद पहलू है क्योंकि सशक्त औऱ सार्थक विपक्ष के बगैर भारत की संसदीय यात्रा समावेशी नहीं हो सकती है।
विपक्ष को ठीक से नहीं समझ पाई कांग्रेस
अटल जी ने एक बार विपक्ष को परिभाषित करते हुए कहा था कि "विपक्ष का मतलब है विशेष पक्ष".।भारत भले बहुलता से भरा मुल्क हो, लेकिन कोई भी राष्ट्रीय नेता वर्तमान की चेतना को समझे बगैर मोदी नहीं बन सकता है। आज राहुल गांधी को भारत यात्रा पर निकलना चाहिए। कम से कम पांच साल तक दिल्ली से दूर रहकर भारत को समझने का प्रयास करना चाहिए और तब तक अमरिंदर सिंह जैसे नेता को कप्तानी सौंपना कांग्रेस के लिए बेहतर होगा, क्योंकि राज्यों में जीत के बावजूद उन्हीं राज्यों में मोदी के सामने कांग्रेस का पूरी तरह से सफाया हुआ।
इस चुनाव को लोग राष्ट्रवाद की जीत बता रहे हैं पर यह सांगोपांग सच्चाई नहीं है। असल में यह राहुल और मोदी के बीच भारत की पसन्द का चुनाव भी है क्योंकि राहुल आज भी जनता को प्रभावित नहीं कर पा रहे हैं खासकर मोदी जैसे अदभुत वक्ता औऱ निजी जीवन मे ईमानदार शख्सियत से लड़ने के लिए उन्हें वाम वैचारिकी से बाहर आना होगा, लेकिन केरल के वायनाड में राहुल ने उसी भाषा का प्रयोग किया जिसे 23 मई को देश की जनता ने खारिज किया है।
उन्होंने मोदी पर नफरत की राजनीति का आरोप लगाया यह वामी भाषा है जो आज भारत के संसदीय मॉडल में डस्टबिन में जा चुकी है। राहुल गांधी को समझना होगा कि उनके औऱ उनके पूर्वजों ने जिस वाम बुद्विजीवी वर्ग को पाला पोसा वही उनके पतन का कारण है। अंग्रेजी में सोचने-समझने-बोलने वाले,गार्डियन औऱ टाइम्स मैगजीन को पढ़ने वाले इस मुल्क में एक फीसदी भी नहीं है इसलिए इन एनजीओ टाइप सलाहकारों से दूर होकर उन्हें भारत के अवचेतन के साथ एकीकृत होना पड़ेगा।
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