ममता के लिए बीजेपी नई चुनौती बनकर उभरी है?
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बीजेपी के लिए इसलिए बंगाल बना महत्वपूर्ण
देश के पांच राज्यों में हुए पिछले विधानसभा चुनाव बीजेपी के लिए संख्या बल और नतीजों के हिसाब बहुत ज़्यादा उत्साही नतीजे देने वाले नहीं रहे। इन 5 में से 3 राज्य छत्तीसगढ़, मध्यप्रदेश और राजस्थान हिंदी भाषी प्रदेश हैं और विधानसभा व लोकसभा चुनावों के बीच बहुत ही कम समय का अंतर होने से इस बात की आंशका बढ़ जाती है कि राज्य की जनता का फैसला इतनी जल्दी बदलेगा, जिसका असर कहीं न कहीं बीजेपी के वर्चस्व पर पड़ना तय है।
शायद इसी अंदेशे को ध्यान में रखते हुए बीजेपी ने बहुत ही सोची-समझी रणनीति के तहत अपनी ताकत का एक बड़ा हिस्सा बंगाल के चुनावों में झोंक दिया है, जहां अब तक बीजेपी को कोई बड़ी सफलता नहीं मिल पाई है और जहां के लोगों में अब धीरे-धीरे ममता सरकार के खिलाफ़ माहौल बनने लगा है जो किसी भी लंबी चलने वाली सरकार के खिलाफ़ बनना स्वाभाविक भी है और बोलचाल की भाषा में हम जिसे एंटी-इनकंबेंसी फैक्टर कहते हैं।
विरासत बचाने के लिए है जंग
इन दोनों ही पार्टियों के अलावा पश्चिम बंगाल लेफ्ट का भी एक बड़ा और महत्वपूर्ण गढ़ है, लेकिन लेफ्ट दलों के आपसी मतभेद, केंद्रीय नेतृत्व की उदासीनता और काडर का टूटना उनके लिए नुकसानदायक साबित हो रहा है और जिसका सीधा फायदा बीजेपी को स्थानीय स्तर पर अपना काडर मजबूत करने में हो रहा है। इसे हम सीधे-सीधे इस तरह से भी देख सकते हैं कि कैसे राज्य में पहले जहां तृणमूल और सीपीएम कार्यकर्ताओं के बीच हिंसक झड़पें होने की ख़बरें आया करतीं थी, अब वो ख़बर बीजेपी और तृणमूल कार्यकर्ताओं के बीच होने लगी हैं।
इन सब के बीच जो सवाल सबसे ज़्यादा ज़रूरी है वो ये कि आख़िर ये चुनाव ममता बनर्जी और बीजेपी के लिए उनकी आन की लड़ाई क्यों बन गया है? आख़िर क्यों - दोनों ही दल के नेता बंगाल की जनता पर अपना एकाधिकार चाहते हैं, तो इसका जवाब ये है कि ममता बनर्जी के लिए ये चुनाव न सिर्फ़ अपनी मुख़्यमंत्री की कुर्सी बचाने के लिए बेहद ज़रूरी है बल्कि उनकी जो विस्तृत भविष्य की योजनाएं उसके लिए भी ये बेहद ज़रूरी है।
क्या है सीटों का गणित?
इस समय ममता की पार्टी के पास 34 सीटें हैं, जिसे वो हर हाल में बढ़ाना चाहती हैं। इससे न सिर्फ़ राज्य में उनकी स्थिति मज़बूत होगी बल्कि ऐसा होने पर वो विपक्ष के महागठजोड़ में ख़ुद को प्रधानमंत्री पद की उम्मीदवार के तौर पर भी आगे कर सकती है। सीटों की बढ़ी हुई संख्या उनकी एक राष्ट्रीय स्तर की नेता के तौर पर स्वीकार्यता बढ़ाने का काम तो करेगी ही, पश्चिम बंगाल में भी उनका वर्चस्व कायम रखेगा। दूसरी तरफ़ बीजेपी के लिए पश्चिम बंगाल इसलिए ज़रूरी है क्योंकि उसे उत्तर भारत के हिंदी भाषी प्रदेशों में जो नुकसान हुआ है या हो सकता है उसे उसकी भरपाई करनी है।
बंगाल की जनता क्या बीजेपी पर भरोसा दिखाएगी?
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बीजेपी के पास खोने को कुछ नहीं, ममता के सामने है विरासत बचाने की चुनौती
सच ये है कि बीजेपी के लिए बंगाल एक उर्वर ज़मीन थी जिसकी खुदाई तो वाम-दलों ने की थी, लेकिन जहां जाकर बीज बोने का काम भारतीय जनता पार्टी ने किया है। अब देखने वाली बात ये होगी कि बंगाल की जनता अपनी उर्वरता को बचाए रखने के लिए किसी नए किसान का साथ देती है या पुराने पर भरोसा करना पसंद करती है।
सच ये है कि इन चुनावों में बीजेपी के पास खोने के लिए कुछ नहीं उसके लिए हर हाल में ये फायदे का सौदा है अगर कुछ ताक पर है तो वो ममता बनर्जी के राजनैतिक जीवन की पूंजी है जिसे उन्होंने अपनी सोच-समझ, जुझारूपन, राजनैतिक सूझबूझ और दिलेरी से हासिल किया है, इसके अलावा उन्होंने बंगाल की जनता के दिलों में भी अपनी जगह बनाई है, उनका भावनात्मक कनेक्ट उनकी सबसे बड़ी पूंजी है जो विपक्ष को चौंका सकती है।
चौंकाने का काम ममता सदा से करती रहीं हैं उनके लिए राजनीति में कोई सीमा नहीं है और वो किसी भी हद तक जा सकती हैं, उनकी यही ‘बेहद’ वाली छवि उन्हें इन चुनावों में बीजेपी के खिलाफ़ मैदान में उतरा सबसे प्रबल चेहरा बनाता है जिन्हें नज़रअंदाज़ करने की भूल न मोदी कर सकते हैं न राहुल गांधी !
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