गांधी से लड़ना आसान नहीं है। और जनमानस के भीतर बसे गांधी से लड़ना तो और भी आसान नहीं है
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गांधी से लड़ना आसान नहीं है।
गांधी से लड़ना आसान नहीं है। और जनमानस के भीतर बसे गांधी से लड़ना तो और भी आसान नहीं है। सन् सैंतालिस में बंटवारे की वजह से देश में जिस तरह का ध्रुवीकरण था, जनसंघ या किसी हिंदूवादी दल के लिए एकाध दशक में देश की सत्ता में आना आसान था, लेकिन गांधीजी की हत्या और हत्या के आरोप ने संघ और जनसंघ को देश की जनता की निगाह में संदेहास्पद बना दिया। जनसंघ/बीजेपी को फिर से पनपने में 40-50 साल लग गए। आस्था में बसे हुए गांधी ने उसे 50 साल पीछे धकेल दिया था। बीजेपी अगर फिर से वही ग़लती करेगी तो उसे फिर से इसका खामियाजा भुगतना पड़ेगा।
दरअसल, गांधी खुद हिंदूवादी थे, बल्कि उनका हिंदू धर्म अपने धर्म को अंदर से मजबूत और बुराइयों को दूर कर देश की आजादी और विश्व कल्याण में योगदान देने वाला था। वामपंथी इतिहासकारों ने उन्हें 'हिंदू राइट' कहा तो जिन्ना उनको अपना 'हिंदू प्रतिस्पर्धी' मानते थे।
इतिहासकार पेट्रिक फ्रेंच लिखते हैं- गांधी के भारत में आगमन, विशाल जनसभाओं और प्रतिरोध के उनके अभिनव तरीकों और उसे मिले जनसमर्थन ने मुसलमानों को चौकन्ना कर दिया और मुस्लिम लीग को मजबूत करने में बड़ी भूमिका अदा की।
जाहिर है, आमतौर पर मुसलमान भी गांधी को हिंदू नेता मानते थे जिसका प्रमाण उन चुनावों में मिला जिसमें मुस्लिम लीग के उम्मीदवार मुसलमानों के लिए आरक्षित लगभग सारी सीटों पर चुनाव जीत गए और कांग्रेस फेल रही। एक ऐसे "हिंदू गांधी" से "हिंदू बीजेपी" लड़ना चाहती है। एक सॉफ्ट हिंदुत्व से हार्ड हिंदुत्व लड़ना चाहता है जिसने आज से 7 दशक पहले भी उसे राजनीतिक और नैतिक लड़ाई में मात दे दी थी.
सवाल यह है कि बीजेपी इस द्वंद से कब बाहर निकलेगी?
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