कांग्रेस नरेंद्र मोदी को ठीक से घेर ही नहीं पाई।
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3. मुद्दे उठाने के बजाय मोदी के पीछे लगी रही कांग्रेस
कांग्रेस की हार के पीछे एक बड़ी वजह यह भी रही कि वह मुद्दे तलाशती रही ताकि वह नरेंद्र मोदी को घेर सके। पार्टी ने एक के बाद एक मुद्दों को जनता के सामने लाने की कोशिश की। मसलन, पहले नोटबंदी फिर जीएसटी और फिर राफेल में हेराफेरी का मामला। कांग्रेस ने किसानों और बेरोजगारी का सवाल भी उठाया। लेकिन नरेंद्र मोदी और अमित शाह की जोड़ी ने उनके सभी मुद्दों को हवा कर दिया। हालत यह हो गई कि जब राहुल गांधी ‘न्याय’ के तहत लोगों को प्रतिवर्ष 70,000 रुपए देने की बात कही तब भी लोगों ने इसे जुमला ही समझा। ठीक वैसे ही जैसे 2014 में नरेंद्र मोदी ने सभी के खाते में 15-15 लाख देने का वादा किया था और बाद में अमित शाह ने इसे राजनीतिक जुमला करार दे दिया।
दरअसल, कांग्रेस की त्रासदी यह रही कि वह नरेंद्र मोदी से आगे कभी निकल ही नहीं सकी। कांग्रेसी नेता हरसमय इस फिराक में रहे कि मोदी कोई गलती करें और वे (कांग्रेसी) जनता के समक्ष रखें। लेकिन तमाम प्रयासों के बावजूद कांग्रेसी नेता नरेंद्र मोदी के पीछे-पीछे हांफते ही रहे।
4. कांग्रेस की अंतर्कलह
लोकसभा चुनाव 2019 में जिस तरह की हार कांग्रेस को मिलती दिख रही है, उसके पीछे एक बड़ी वजह कांग्रेसी नेताओं की अपनी अंर्तकलह भी है। खासकर उन राज्यों में जहां कांग्रेसी सरकारें हैं, वहां के नेताओं के साथ जिस तरह का समन्वय होना चाहिए था, राहुल गांधी नहीं बना सके। मसलन, मध्य प्रदेश में कमलनाथ जैसे सक्षम मुख्यमंत्री के बावजूद कांग्रेस भाजपा से पीछे रह गई। यही स्थिति छत्तीसगढ़ में ही दिखी। वहां के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल को न तो स्थानीय कांग्रेसी नेताओं का सहयोग मिला और न ही आलाकमान से।
उधर राजस्थान में अशोक गहलोत और सचिन पायलट के बीच भी समन्वय की कमी का असर साफ दिखा। उत्तर प्रदेश की बात करें तो वहां के प्रदेश अध्यक्ष के रूप में राज बब्बर एक बार फिर जमीनी स्तर पर कांग्रेसी नेताओं और कार्यकर्ताओं से संवाद स्थापित करने में विफल रहे।
5. यूपी में बिगड़ा समीकरण
कांग्रेस को जिस राज्य से सबसे अधिक उम्मीदें थीं, उनमें उत्तर प्रदेश पहले नंबर पर था। प्रारंभ में ऐसे संकेत मिल रहे थे कि समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी के साथ मिलकर कांग्रेस कोई बड़ा गठबंधन बनाने में कामयाब हो जाएगी ताकि गैर भाजपाई वोटों में बिखराव न हो, लेकिन अखिलेश-मायावती ने कांग्रेस के अरमानों पर पानी फेर दिया। हालांकि पश्चिमी उत्तर प्रदेश में कांग्रेस ने प्रियंका गांधी को प्रभार देकर कुछ बेहतर करने का प्रयास जरूर किया, परंतु इन इलाकों में भी वह गैर भाजपाई वोटों में बिखराव को रोकने में विफल ही रही।
6. बिहार-बंगाल में चर्चाहीन रही कांग्रेस
एक समय कांग्रेस का गढ़ माना जाने वाला राज्य पश्चिम बंगाल इस बार पूर्णरूपेण बदला हुआ नजर आया। इस बार के चुनाव में कांग्रेस की हालत यह रही कि वहीं कहीं भी नजर नहीं आई। पूरी लड़ाई ममता बनर्जी और नरेंद्र मोदी के बीच रही। जबकि बंगाल में उसके पास एक से बढ़कर एक कद्दावर नेता हैं।
यही हाल पड़ोसी राज्य बिहार का रहा। हालांकि उसने राजद के साथ मिलकर महागठबंधन जरूर बनाया। लेकिन वहां भी कांग्रेस भी कोई पार्टी है जो चुनाव लड़ रही है, लोगों को यह बताने में असफल रही। युवा नेता के रूप में तेजस्वी यादव ने अपनी छवि जरूर बना ली। बिहार में ही कांग्रेस की त्रासदी रही कि राहुल गांधी के विश्वस्त सिपाहसलारों में से एक शकील अहमद ने बगावत कर दी और मधुबनी से निर्दलीय चुनाव लड़े। वहां वोटों का बिखराव हुआ।
राहुल गांधी का मैनेजमेंट दमदार नहीं रहा।
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7. दक्षिण में नहीं चला राहुल का जादू
इस बार के चुनाव में राहुल गांधी ने दक्षिण भारत के राज्यों पर फोकस किया। वे कर्नाटक विधानसभा चुनाव में मिली सफलता के कारण उत्साह से लबरेज थे। यही वजह रही कि उन्होंने केरल से भी चुनाव लड़ा। जाहिर तौर पर उनके निशाने पर भाजपा थी जो दक्षिण के राज्यों में अपने पैर अंगद की तरह जमा चुकी है। लेकिन केरल में सबरीमाला मंदिर प्रकरण में भाजपा ने अयप्पा के मंदिर में माहवारी महिलाओं के प्रवेश पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले का विरोध कर वहां के हिंदू समुदायों पर अपनी पकड़ बनाए रखी। जबकि कांग्रेस इस मामले में कोई स्पष्ट राय लोगों के बीच रखने में विफल रही। हालांकि यह कहना भी अतिश्योक्ति नहीं कि उसने स्वयं को इस मामले से दूर ही रखा। इसी प्रकार कर्नाटक में लिंगायत मामले में भी कांग्रेस पूरी तरह से अपनी स्थिति साफ नहीं कर सकी।
8. ऊंची जातियों का भाजपा से लगाव
कांग्रेस की हार की एक बड़ी वजह यह भी रही कि जातिगत खांचों में वह अब फिट नहीं बैठ रही है। दलित, आदिवासी और ओबीसी आदि जातियों के बीच उसकी पैठ पहले से ही न्यून थी। ऊंची जातियों में भी उसका प्रभाव जाता रहा है। हालत यह हो गई है कि ऊंची जातियों के लोगों ने अब पूरी तरह भाजपा को अपनी पार्टी मान लिया है।
9. उदार हिंदू बनना पड़ा महंगा
पिछले वर्ष विधानसभा चुनावों के दौरान राहुल गांधी ने स्वयं को हिंदू साबित करने की पुरजोर कोशिश की। भाजपा के हिंदुवादी एजेंडे का मुकाबला करने के लिए राहुल गांधी ने अपना जनेऊ तक दिखाया, लेकिन वे कामयाब न हो सके। दरअसल, हिंदू होने का प्रमाण देते समय राहुल यह भूल गए कि कांग्रेस की छवि धर्मनिरपेक्ष दल की है जो जवाहरलाल नेहरू ने बनाई थी। हिंदू होने का प्रमाण देने के बजाय यदि उन्होंने यह बताया होता कि कांग्रेस धर्मनिरपेक्षता में यकीन रखती है और भाजपा मुद्दों से दूर भाग रही है तो शायद तस्वीर कुछ और ही होती। जनेऊधारी राहुल की छवि से कांग्रेस की छवि काे नुकसान पहुंचा।
10. राहुल मुद्दों को अपने पक्ष में करने में कामयाब नहीं हुए
नोटबंदी, जीएसटी जैसे सबसे अहम और आम जनता से जुड़े मुद्दों को कांग्रेस जनता तक ले जाने में असफल रही। इसकी तुलना में बीजेपी ने इसे ही अपने पक्ष में कर लिया। कुल मिलाकर कांग्रेस की हार की बड़ी वजह मुद्दों को लेकर टाइमिंग, खराब मैनेजमेंट और सही समय पर चेहरा ना पेश कर पाना रही।
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