दिग्विजय सिंह साध्वी प्रज्ञा के खिलाफ अपनी रणनीति बना चुके हैं।
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दिग्विजय सिंह तय कर चुके थे अपनी रणनीति
भाजपा ने जब साध्वी प्रज्ञा को अपना उम्मीदवार घोषित किया तब तक दिग्विजय सिंह चुनव जीतने के लिए अपनी रणनीति तय कर चुके थे और चुनावी मैदान में अपनी व्यूह रचना को अंतिम रूप देने में भी वे सफल होते दिख रहे हैं। भाजपा प्रत्याशी की घोषणा में हुआ अप्रत्याशित एवं आश्चर्य जनक विलंब पार्टी कार्यकताओं के लिए भी उलझन का कारण बना रहा है।
दरअसल, कार्यकर्ता समझ नहीं पा रहे थे कि जब पार्टी का नेतृत्व यहां से प्रत्याशी तय करने में इस तरह अनिर्णय का शिकार बना हुआ है तब उनसे ऐसी अपेक्षा कैसे की जा सकती है कि वे पार्टी के प्रचार अभियान में अपना योगदान जोर शोर से देते रहे। इसके विपरीत कांग्रेस पार्टी ने शुरू में ही पूर्व मुख्यमंत्री एवं वरिष्ठ नेता दिग्विजय को भोपाल सीट से प्रत्याशी घोषित कर दिया,जिसके बाद पार्टी के स्थानीय कार्यकर्ताओं में उमंग और उल्लास की लहर दौड़ गई और वे बिना देरी किए पार्टी के प्रचार अभियान में जुट गए थे। यही कारण है कि 1991 से ही भाजपा का गढ़ बनी हुए भोपाल लोकसभा सीट पर कांग्रेस की चुनौती ने भाजपा को चिंता में डाल रखा है।
चुनाव प्रचार की कमान शिवराज सिंह चौहान के हाथों में है।
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शिवराज सिंह के हाथ में है प्रचार की कमान
राज्य की पूर्ववती भाजपा सरकार के मुखिया शिवराज सिंह चौहान जो मौजूदा चुनाव में राज्य में पार्टी के प्रचार अभियान की बागडौर थामे हुए हैं, ने सभी पार्टी नेताओं एवं कार्यकर्ताओं से साध्वी को जिताने के लिए आपसी मतभेद भूलकर एकजुट होने की अपील की है, परन्तु वे भी इस सच्चाई से अनजान नहीं है कि देरी से प्रत्याशी घोषित होना जीत की संभावनाओं को प्रभावित कर सकता है।
हालांकि भाजपा ने साध्वी प्रज्ञा को भोपाल सीट से उतारकर मुकाबले को हार्डकोर हिंदुत्व बनाम सॉफ्ट हिंदुत्व में बदल दिया है, जिससे दिग्विजय सिंह एवं कांग्रेस पार्टी दूरी बनाकर चल रही थी। अब साध्वी के मैदान में आने के बाद हिंदुत्व के मुद्दे से कांग्रेस एवं दिग्विजय सिंह को दो चार होना ही पड़ेगा। साध्वी प्रज्ञा की गिनती दिग्विजय सिंह के प्रमुख आलोचकों में होती है। उन्होंने टिकट मिलने के बाद कहा भी था कि यह चुनाव नहीं बल्कि धर्मयुद्ध है।
उधर, दिग्विजय सिंह ने बड़े ही सधे ही अंदाज में कहा कि साध्वी जी "जो बोले उन्हें बोलने दें" यह उनका हक है। मै मां नर्मदा से प्राथना करता हूं कि हम सब सत्य अहिंसा एवं धर्म के मार्ग पर चलें। इधर दिग्विजय सिंह ने गत् वर्ष नर्मदा परिक्रमा कर एवं विगत् दिनों में विभिन्न मंदिरों एवं धार्मिक स्थलों पर पूजा कर अपनी छवि सॉफ्ट हिंदुत्व की कोशिश की है। उन्हें विश्वास है कि चुनाव में उनकी यह छवि मतदाताओं का विश्वास जीतने में सहायक साबित होगी।
गौरतलब है कि केंद्र में यूपीए सरकार के कार्यकाल में भगवा आतंकवाद का मुद्दा जोर-शोर से उठाने वाले कांग्रेस नेताओं में दिग्विजय सिंह का नाम प्रमुखता से लिया जाता है। इसीलिए संघ की विशेष पहल पर दिग्विजय के खिलाफ साध्वी प्रज्ञा को उतारा गया है, जो कट्टर हिंदुत्व में अपनी आस्था को उजागर करने में कोई संकोच नहीं करती हैं।
चुनाव के नजरिये से भोपाल सीट अब अब हाईप्रोफाइल हो चुकी है।
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पूरे देश की नजरें टिकी हैं भोपाल पर
भोपाल लोकसभा सीट अब हाईप्रोफाइल होने के कारण इसके चुनाव परिणाम पर अब सारे देश की नजरें टिकी हुई हैं। भाजपा ने साध्वी प्रज्ञा को उम्मीदवार बनाकर वोटो के ध्रुवीकरण का जो प्रयास किया है उसमे उन्हें कितनी सफलता मिलती है यह तो आने वाला समय ही बताएगा, लेकिन जिस तरह से साध्वी प्रज्ञा ने इसे धर्मयुद्ध करार दिया है उससे तो यही अनुमान अब लगाया जा रहा है कि भाजपा यहां हिंदुत्व के मुद्दे को प्रमुखता से अपने प्रचार का हिस्सा बनाएगी।
साध्वी प्रज्ञा और दिग्विजय सिंह के वादे
वैसे साध्वी ने यह भी कहा है कि भोपाल को एजुकेशन हब बनाने एवं विकास एवं रोजगार के अवसरों में वृद्धि के साथ ही अपराधों की रोकथाम उनकी प्रमुख प्राथमिकताएं होगी। दूसरी और कांग्रेस उम्मीदवार दिग्विजय सिंह ने भोपाल को केपिटल रीजन का निर्माता, शहर के आसपास सेटेलाइट टाउनशिप का विकास, भोपाल से लगे सीहोर में मेडिकल कालेज एवं भोपाल को किसान हब बनाने के साथ -साथ महिलाओं की सुरक्षा को अपने विजन डॉक्युमेंट में प्रमुखता से शामिल किया है।
कुल मिलाकर भोपाल में पिछले तीन दशक से जो एक पक्षीय मुकाबला देखने को मिलता था वह अब नहीं दिखाई दे रहा है। हालांकि भाजपा की सबसे बड़ी दुविधा यह है कि जब कांग्रेस प्रत्याशी दिग्विजय सिंह का चुनावी अभियान पूरी तरह जोर पकड़ चूका है तब भाजपा को अपने अभियान का श्रीगणेश करना है ,लेकिन पार्टी को बूथ स्तर तक फैले अपने कार्यकर्ताओ पर पूरा भरोसा है। अतः अब देखना है कि भाजपा उन्हें कितनी जल्दी तैयार कर पाती है।
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