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भाजपा की लड़ाई आखिर किससे है?

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आखिर भाजपा की लड़ाई किसके साथ है? - फोटो : अमर उजाला
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इस लोकसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी की आलोचना करने वाले विभिन्न मुद्दों पर पार्टी की आलोचना तो करते हैं, लेकिन इस बात की चर्चा कम हो रही है कि आखिर भाजपा की लड़ाई किसके साथ है? क्या सचमुच भाजपा अपने राजनीतिक विरोधियों के साथ लड़ाई लड़ रही है या फिर वह खुद के साथ लड़ रही है, इसपर गंभीर बहस की गुंजाइश है।

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किसके साथ चुनाव लड़ रही है भाजपा? 
गौर से देखें तो इस चुनाव में भाजपा न तो कांग्रेस के साथ लड़ रही और न ही साम्यवादी-समाजवादी दलों के साथ, वह खुद के साथ लड़ रही है। यह दोनों की स्तर पर हो रहा है। सांगठनिक स्तर पर भी और सैद्धांतिक स्तर पर भी। इस मुद्दे की चर्चा मीडिया में भी होती रही है। 

देखा जाए तो यह सवाल उठता भी है कि क्या वाकई भाजपा अपने आप से लड़ रही है? यदि गौर से देखें तो 2014 में जिन मुद्दों के साथ गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी प्रधानमंत्री की दौड़ में शामिल हुए थे, वे मुद्दे प्रधानमंत्री बनने के बाद गायब हो गए। पूरे पांच साल समय-समय पर उसकी चर्चा होती रही, लेकिन वे मुद्दे मोदी के शासन काल में न तो प्रभावी हुए और न ही उन मुद्दों पर गंभीरता से विचार किया गया। जबकि जिन मुद्दों के साथ प्रधानमंत्री शासन कर रहे थे वे मुद्दे भी 2019 के चुनाव में मौन और गौण हैं।

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2014 के मुद्दे इस चुनाव से गायब हैं? - फोटो : अमर उजाला
कौन से हैं वे मुद्दे? आखिर किनसे लड़ रही है भाजपा? 
मसलन, 2014 का चुनाव भ्रष्टाचार, विकास व खेती-किसानी के मुद्दे पर लड़ा गया था| नरेन्द्र मोदी प्रधानमंत्री बने उनकी प्राथमिकताओं में ये मुद्दे उतने प्रभावी नज़र नहीं आए। अपने पूरे शासन काल में उन्होंने अपनी पूर्ववर्ती, संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन की सरकार के द्वारा छोड़े गए आधे-अधूरे कामों को पूरा किया। अपनी ओर से मोदी सरकार ने एक-दो काम जरूर किए जो उनके चुनावी एजेंडे में नहीं थे।  

2014 के अपने चुनावी एजेंडे में नोटबंदी का भाजपा ने कहीं जिक्र तक नहीं किया था, लेकिन नोटबंदी के साथ ही साथ उन्होंने जीएसटी भी लागू किया और बाद में खुदरा बाजार में 100 प्रतिशत एफडीआई को भी लागू कर दिया। गौर से देखिए, अब 2019 चुनाव के मौदान में वे अपने काम के आधार पर वोट नहीं मांग रहे हैं। वे हिन्दुत्व और राष्ट्रवाद के मुद्दे को लेकर जनता के बीच हैं। मोदी की भाजपा के सामने यह सबसे बड़ा वैचारिक संकट है।

कहां दिखे जो सक्रिय थे 2014 के चुनावों में?  
सांगठनिक स्तर पर भी जो लोग 2014 में मोदी को लाने के लिए मोदी के साथ खड़े थे वे मोदी के शासनकाल में कहीं नहीं दिखे और अब वे चुनाव के महासंग्राम में अपनी डफली खुद बजा रहे हैं, या फिर आराम फरमा रहे हैं। कुछ नेता सक्रिय होने की सोच भी रहे थे तो वे फिलहाल चुप हैं।

उदाहरण के लिए 2014 का चुनाव अमित शाह के नेतृत्व में नहीं लड़ा गया था। वे केवल उत्तर प्रदेश के प्रभारी थे, लेकिन 2019 का चुनाव शाह के नेतृत्व में ही लड़ा जा रहा है। उस चनुाव में वे केवल उत्तर प्रदेश में ही सक्रिय थे। 

2014 के आम चुनाव में कुछ वरिष्ठ नेताओं की अनबन छोड़ दें तो अधिकांश मोदी को प्रधानमंत्री बनाने में लगे थे, लेकिन इस चुनाव में अधिकतर नेता नेपथ्य में चले गए हैं। कुछ घर बैठे हैं, तो कुछ अपने आप को तटस्थ बनाने की कोशिश में लग गए हैं।

क्या 2019 की जंग 2014 जितनी ही आसान है? - फोटो : Twitter
मुद्दे गौण और दिग्गज मौन? कौन है सक्रिय
इस प्रकार हम देखते हैं कि सांगठनिक स्तर पर भी जो लोग 2014 में मोदी के साथ थे वे आज उनके साथ नहीं हैं। अधिकतर मुद्दे भी गौण हैं। पांच साल तक मोदी सरकार ने जो किया उसके आधार पर वोट नहीं मांग रहे हैं। वे राष्ट्रवाद और हिन्दुत्व के मुद्दे पर वोट मांग रहे हैं। हालांकि ये दोनों मुद्दे देश के मध्य और नव अभिजात्य वर्ग के लोगों को अपील भी कर रहे हैं, लेकिन जिस क्षेत्र में पार्टी की अपीलिंग होनी चाहिए वह क्षेत्र छूट रहा है।

आंकड़े बताते हैं कि देश में लगभग 2 करोड़ लोग राजनीति में किसी न किसी रूप में सक्रिय हैं। कुछ इसी तरह का दुनिया का आंकड़ा है। विकसित देशों में भी लगभग 2 प्रतिशत जनता ही राजनीतिक दृष्टि से सक्रिय हो पाती है। यदि इस आंकड़ों पर हम भरोसा करें तो देश की अधिकतर जनसंख्या अभी भी आधुनिक संचार माध्यमों से नहीं जुड़ पाई है। जो मुद्दे मोदी जी इस बार लेकर आए हैं वह शहरी और अभिजात्य मतदाताओं को अपनी ओर आकर्षित तो करता है लेकिन गांव में अभी भी खेती-किसानी, रोजगार, पलायन, गरीबी, भूखमरी बड़ी समस्या है। 

कांग्रेस सहित संपूर्ण विपक्ष पूरी कोशिश कर रहे हैं कि यह चुनाव किसानी, गरीबी, बेरोजगारी और समावेशी राष्ट्रवाद के मुद्दे पर लड़े जाएं, लेकिन सरकार में शामिल भाजपा कुछ और चाहती है। यही नहीं जिन मुद्दों के साथ भाजपा ने 2014 का चुनाव लड़ा उसे वे सारे मुद्दे पसंद नहीं हैं। 
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क्या भाजपा की कार्यपद्धति बदल गई है? - फोटो : अमर उजाला
बदल रही है भाजपा की कार्यपद्धति?  
इसके अलावा भाजपा की कार्यपद्धति भी इस बार की बदली-बदली-सी लग रही है। पहले चुनाव में प्रत्याशियों को लेकर भाजपा और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ व अनुषांगिक संगठनों में जमकर चर्चा होती थी, लेकिन इस बार प्रत्याशियों के चयन में उतनी पारदर्शिता और सहभागिता दोनों ही दिखाई नहीं पड़ते। यही नहीं इस बार सहयोगी पार्टियों के साथ समझौते में भी सबकी राय नहीं ली गई है| ।

यही कारण है कि कई महत्वपूर्ण सीटें भाजपा जो पारंपरिक रूप जीतती रही है सहयोगियों को दे दी गईं। सूत्र तो यहां तक बताते हैं कि संघ के द्वारा भेजे गए संगठन के एक वरिष्ठ कार्यकर्ता इस मामले को लेकर कई बार संघ प्रमुख मोहन भागवत को शिकायत भी कर चुके हैं।

इधर, भाजपा के कुछ नेता इस बात को लेकर मुखर हैं। संघ पृष्ठभूमि के एक भाजपा नेता ने तो यहां तक बताया कि अब भाजपा में आंतरिक लोकतन्त्र कम हो चला है। संसदीय बोर्ड की बैठक में भी चर्चा नहीं हो रही है। बस प्रदेश अध्यक्ष के द्वारा भेजे गए तीन नाम पढ़ दिए जाते हैं। 

भाजपा पर नजर रखने वाले एक पत्रकार का दावा है कि इस बार भाजपा, पीआर एजेंसी, सर्वक्षण एजेंसी और एड एजेंसियों के माध्यम से चुनाव लड़ रही है। यह भाजपा की कार्यपद्धति का भी तिरोहन है। गुमनामी और सामूहिकता भाजपा की कार्यपद्धति का महत्वपूर्ण हिस्सा रहा है, लेकिन इस चुनाव में ऐसा कुछ भी देखने को नहीं मिल रहा है। ऐसे में कहा जा सकता है कि भाजपा इस बार किसी और के साथ नहीं खुद के साथ लड़ाई लड़ रही है।
डिस्क्लेमर (अस्वीकरण) : यह लेखक के निजी विचार हैं. आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है. आप भी अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं. लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें.
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