पटना साहिब में दो दिग्गजों के बीच संग्राम है। रविशंकर प्रसाद और शत्रुघ्न सिन्हा के बीच।
- फोटो : PTI
पटना साहिब : दो दिग्गजों के बीच संग्राम
इस बार के चुनाव में सबसे दिलचस्प संघर्ष पटना साहिब लोकसभा क्षेत्र में देखने को मिल रहा है, जहां दो स्वजातीय (कायस्थ) दोस्त एक-दूसरे के खिलाफ हैं। एक शत्रुघ्न सिन्हा जिनके पास बिहारी बाबू होने का टैग है तो दूसरी ओर रविशंकर प्रसाद हैं।
शत्रुघ्न सिन्हा इससे पहले तक भाजपा उम्मीदवार के रूप में लड़ते और जीतते रहे हैं। लेकिन इस बार वे कांग्रेस के उम्मीदवार हैं। इस बार के परिणाम क्या होंगे, इसके आकलन से पहले पिछली बार हुए चुनाव परिणाम को देखना जरूरी होगा।
वर्ष 2014 के लोकसभा चुनाव में पटना साहिब की जनता ने भाजपा के उम्मीदवार रहे शत्रुघ्न सिन्हा को 4 लाख 85 हजार 905 वोट मिले थे और उन्होंने भोजपुरी सिनेमा के महानायक कहे जाने वाले कुणाल सिंह जो कि यादव जाति के हैं, को पराजित किया था। कुणाल सिंह तब कांग्रेस के उम्मीदवार थे। उन्हें 2 लाख 20 हजार 100 वोट मिले थे। जदयू ने पटना के लोकप्रिय चिकित्सक डॉ. गोपाल प्रसाद सिन्हा को शत्रुघ्न सिन्हा के मुकाबले मैदान में उतारा था। ये भी 91 हजार 24 वोट पाने में सफल रहे थे।
जातिगत समीकरणों के लिहाज से पटना साहिब कायस्थों का क्षेत्र माना जाने लगा है। रविशंकर प्रसाद की चुनौती यह होगी कि वे भाजपा के आधार वोटर जिसका मुख्य हिस्सा कायस्थों का है, में शत्रुघ्न सिन्हा को सेंधमारी करने से रोकें। यदि कायस्थ वोटरों में 30 से 35 फीसदी तक सेंधमारी करने में शत्रुघ्न सिन्हा कामयाब हो जाते हैं तब राजद के आधार वोटर यानी मुस्लिम और यादव दोनों मिलकर उन्हें जीत दिला सकते हैं। लेकिन यह मामला इतना सरल भी नहीं है। पटना साहिब में नरेंद्र मोदी का अपना प्रभाव भी है। लिहाजा न तो यह रविशंकर प्रसाद के लिए आसान है और न ही शत्रुघ्न सिन्हा के लिए।
पाटलिपुत्र : सवाल लालू प्रसाद यादव की विरासत का
एक बार फिर लालू प्रसाद की बड़ी बेटी मीसा भारती रामकृपाल यादव का मुकाबला कर रही हैं। पिछली बार मोदी लहर पर सवार होने के बावजूद रामकृपाल यादव को अपनी मुंह बोली भतीजी मीसा भारती को हराने में पसीने छूट गए थे। इस बार न तो मोदी की लहर है और न ही रामकृपाल यादव की अपनी साख। हालांकि उनके लिए संतोष की बात यह है कि लालू प्रसाद इस बार जेल में हैं और मीसा भारती को यह चुनाव अपने बूते लड़ना पड़ रहा है।
वहीं इसका एक दूसरा पक्ष यह भी है कि इस बार यादव जाति जो कि पाटलिपुत्र लोकसभा क्षेत्र में निर्णायक माने जाते हैं, लालू प्रसाद से सुहानुभूति रखते हैं और संभव है कि सहानुभूति की लहर पर सवार होकर मीसा भारती इसबार जीत दर्ज करें। लेकिन यह भी इतना आसान नहीं है।
मीसा भारती की सबसे बड़ी चुनौती न केवल यादव-मुसलमान मतदाताओं को गोलबंद रखना है बल्कि अति पिछड़ा वर्ग के वोटरों का विश्वास भी जीतना होगा। वजह यह कि पिछली बार उन्हें करीब 55 हजार मतों के अंतर से हार का सामना करना पड़ा था और इसकी एक बड़ी वजह अति पिछड़ा वर्ग था।
कन्हैया कुमार-गिरिराज सिंह के मुकाबले पर पूरे देश की निगाहे हैं।
- फोटो : social Media
आरा : लेनिनग्राद
पटना से सटे पश्चिम आरा को वही उपमा दी जाती है जो बेगूसराय को है। यानी लेनिनग्राद की। बेगूसराय में जिस तरह कन्हैया कुमार ने गिरिराज सिंह को चुनौती पेश की है, उसी तरह की चुनौती इस बार भाकपा माले के राजू यादव पूर्व नौकरशाह और भाजपा के निवर्तमान सांसद आरके सिंह को दे रहे हैं। राजू यादव के मुकाबले में होने की एक बड़ी वजह यह भी है कि राजद और कांग्रेस ने उन्हें अपना समर्थन दिया है। जातिगत समीकरणों के लिहाज से आरा में इस बार सीधे-सीधे अगड़ा बनाम पिछड़ा की लड़ाई है।
पिछली बार आरके सिन्हा जो कि राजपूत जाति के हैं, को आसान जीत मिली थी। इस आसान जीत की बड़ी वजह यह थी कि तब वे मोदी लहर पर सवार थे और दूसरी वजह यह भी रही कि तब राजद महागठबंधन बनाने में कामयाब नहीं हो सकी थी।
आंकड़ों पर गौर करें तो इस गणित को आसानी से समझा जा सकता है। राजद ने तब श्रीभगवान सिंह कुशवाहा को अपना उम्मीदवार बनाया था जो 2 लाख 55 हजार 204 वोट पाने में सफल रहे थे और भाजपा के आर के सिंह 3 लाख 91 हजार 74 वोट पाकर विजयी हुए थे।
श्रीभगवान सिंह कुशवाहा की हार की बड़ी वजह भाकपा माले के उम्मीदवार राजू यादव थे, जिन्हें करीब 1 लाख वोट मिले थे। जबकि जदयू की राजपूत नेत्री मीना सिंह को केवल 75 हजार 962 वोटों से संतोष करना पड़ा था। यानी इस बार मुकाबला आरके सिंह के लिए है। उन्हें यदि राजू यादव को जीतने से रोकना है तो न केवल सवर्ण वोटरों को अपने पाले में गोलबंद करना होगा (जो कि वर्तमान परिस्थिति में संभव दिख भी रहा है) बल्कि राजद और माले के आधार वोटबैंक में सेंधमारी करनी होगी। वर्ना उनकी हार तय है।
सासाराम : मीरा कुमार बनाम छेदी पासवान
मुगलों को परास्त करने वाले शेरशाह सूरी की धरती यानी सासाराम पर इस बार भी निगाहें लगी हैं। वजह यह है कि इस बार भी पूर्व लोकसभा अध्यक्ष मीरा कुमार भाजपा के छेदी पासवान का मुकाबला करेंगी। अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित इस सीट पर 2014 में हुए चुनाव में छेदी पासवान ने चुनाव के ठीक पहले जदयू से नाता तोड़कर भाजपा की शरण ली थी और मोदी लहर पर सवार होकर मीरा कुमार जैसी दिग्गज नेता को शिकस्त दी थी। तब श्री पासवान को 3 लाख 66 हजार 887 वोट मिले थे और मीरा कुमार 3 लाख 2 हजार 760 मत पाकर दूसरे स्थान पर थीं। तीसरे स्थान पर जदयू के उम्मीदवार रहे नौकरशाह केपी रमैय्या थे। उन्हें 93 हजार 310 वोट मिले थे। कहना अतिश्योक्ति नहीं कि जदयू के उम्मीदवार के कारण ही मीरा कुमार को तब हार का मुंह देखना पड़ा था।
इस बार लड़ाई एकदम सीधी है। छेदी पासवान भाजपा और मीरा कुमार महागठबंधन की उम्मीदवार हैं। मीरा कुमार को जीत के लिए जातिगत समीकरणों को सुलझाना ही होगा। जबकि छेदी पासवान को मोदी के नाम पर मिलने वाले वोटों के अतिरिक्त बड़ी संख्या में वोट अपने बूते हासिल करने होंगे।
बक्सर : सवर्णों की लड़ाई में जीत तय करेंगे गैर सवर्ण
यह लोकसभा क्षेत्र इस बार चर्चा के केंद्र में है। बक्सर बिहार का एकमात्र लोकसभा क्षेत्र रहा है जहां 1952 से लेकर अबतक अधिकांश सवर्ण (खासकर ब्राह्मण-भूमिहार व राजपूत) ही जीतते रहे हैं। हालांकि 1989 से लेकर 1996 तक बक्सर पर सीपीआई के तेजनारायण सिंह का कब्जा रहा जो यादव जाति के थे। यह वह दौर था जब बिहार में लालू प्रसाद यादव सत्तासीन हुए और सामाजिक समीकरणों में निर्णायक बदलाव हुए।
इस बार तमाम स्थानीय भाजपा कार्यकर्ताओं के कड़े विरोधों के बावजूद के भाजपा ने अश्विनी कुमार चौबे को ही अपना उम्मीदवार बनाया है। चौबे मूल रूप से भागलपुर के रहने वाले हैं और उनपर बक्सर के बजाय भागलपुर में एम्स ले जाने का आरोप भी है। पिछली बार ब्राह्मण जाति के अश्विनी चौबे राजद के कद्दावर राजपूत नेता जगदानंद सिंह को पराजित करने में सफल हुए थे।
हालांकि जगदानंद सिंह की हार की एक बड़ी वजह तब यह भी रही कि ददन यादव जो कि बहुजन समाज पार्टी के उम्मीदवार थे और उन्हें जगदानंद सिंह से करीब डेढ़ हजार कम मत मिले थे। जगदानंद सिंह को तब 1 लाख 86 हजार 674 मत और अश्विनी कुमार चौबे को 3 लाख 19 हजार 12 वोट मिले थे। वहीं जदयू के उम्मीदवार श्याम लाल सिंह कुशवाहा ने बतौर जदयू उम्मीदवार 1 लाख 17 हजार 12 वोट झटके थे।
अब 2014 के परिणाम के आधार पर और चुनाव प्रचार के दौरान अश्विनी कुमार चौबे को मिल ही चुनौतियों को संकेत मानें तो बक्सर के मतदाता उलटफेर कर सकते हैं। वैसे भी यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या इस बार भी वे किसी बाहरी को जीत दिलाएंगे।
काराकाट : दो कुशवाहों में गलाकाट संघर्ष
अंतिम चरण के चुनाव में काराकाट लोकसभा क्षेत्र में भी मतदान होना है। यहां कुशवाहा जाति के उम्मीदवारों के बीच सीधा मुकाबला है। इनमें से एक उपेंद्र कुशवाहा हैं जो नरेंद्र मोदी सरकार में करीब साढ़े चार वर्ष तक राज्यमंत्री रहने के बाद अब महागठबंधन के उम्मीदवार के रूप में चुनाव लड़ रहे हैं। उनका मुकाबला करने के लिए जदयू ने महाबलि सिंह को मैदान में उतारा है।
पिछली बार उपेंद्र कुशवाहा को आसान जीत मिली थी। वजह यह भी रही कि उन्हें मोदी नाम का सहारा मिला था। इस बार उन्हें लालू नाम का सहारा लेना पड़ रहा है।
पिछली बार उन्हें 3 लाख 38 हजार 892 वोट मिले थे जबकि दूसरे स्थान पर रहीं कांति सिंह को 2 लाख 33 हजार 651 वोट। इस बार जदयू ने कुशवाहा जाति महाबलि सिंह को उतारकर उनकी राह में कांटे बिछा दिए हैं।
माना यह जा रहा है कि उपेंद्र कुशवाहा की हार या जीत इस बात पर निर्भर करेगी कि महाबलि सिंह कुशवाहा वोटरों को कितना प्रभावित कर पाते हैं। दूसरा यह भी कि उन्हें राजद के आधार वोटरों का शत प्रतिशत विश्वास हासिल करना होगा।
जहानाबाद : जदयू का ट्विस्ट
पटना से सटे दक्षिण जहानाबाद लोकसभा क्षेत्र में इस बार लड़ाई का स्वरूप बदला है। पहले लड़ाई सवर्ण बनाम गैर सवर्ण होता था। इस बार जदयू ने लड़ाई में ट्विस्ट ला दिया है। उसने किसी भूमिहार या अन्य किसी सवर्ण को उम्मीदवार न बनाकर अति पिछड़ा वर्ग के चंद्रदेव प्रसाद चंद्रवंशी को मुकाबले में उतार दिया है। अब वे राजद के सुरेंद्र प्रसाद यादव का मुकाबला कर रहे हैं। सुरेंद्र यादव 1998 में यहां से चुनाव जीत भी चुके हैं। चंद्रदेव प्रसाद चंद्रवंशी के लिए मुश्किल यह भी है कि 2014 में विजयी रहे भूमिहार जाति के अरूण कुमार भी चुनाव लड़ रहे हैं।
लिहाजा यह कहना अतिश्योक्ति नहीं कि सुरेंद्र यादव या चंद्रदेव प्रसाद चंद्रवंशी की जीत का दारोमदार अरुण कुमार को मिलने वाले वोटों पर निर्भर करेगा। यदि चंद्रवंशी अति पिछड़ा वर्ग के वोटरों के साथ सवर्ण वोटरों का वोट पाने में कामयाब रहे तो वे सुरेंद्र प्रसाद यादव को चुनौती दे सकेंगे। वहीं सुरेंद्र प्रसाद यादव को इस बार हर हाल में राजद के आधार वोटरों के अलावा दलितों का वोट हासिल करना होगा। हालांकि पूर्व मुख्यमंत्री जीतनराम मांझी के महागठबंधन में शामिल होने के कारण यह बहुत कठिन नहीं दिखता है। फिर भी सुरेंद्र प्रसाद यादव की पहचान एक बाहुबली नेता के रूप में रही है। उनके उपर दलित कितना विश्वास करते हैं, यह तो 23 मई को ही पता चलेगा।
डिस्क्लेमर (अस्वीकरण) : यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है।आप भी अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।