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कोरोना संकट के बीच देश के अन्नदाता पर नई मुसीबत लाया 'टिड्डी दल

सार

  • विश्व में टिड्डियों की 10 प्रजातियां पाई जाती हैं।
  •  भारत में टिड्डी दल के हमलों से बचाव के लिए टिड्डी चेतावनी संगठन की स्थापना (एलडब्ल्यूओ) 1939 में की गई थी।
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आजकल देश के विभिन्न राज्यों पर टिड्डी दल के हमले हो रहे हैं - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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बचपन को याद करते-करते हमारे चेहरे पर अचानक एक मुस्कराहट सी दौड़ जाती है और हम रोमांचित हो उठते हैं उन यादों व किस्सों को याद कर। वैसे तो बचपन का हर लम्हा अपने आप में बेमिसाल होता है लेकिन कुछ चीजें बहुत यादगार बन जाती हैं और वह ताउम्र किसी न किसी मोड़ पर सामने आती रहती हैं।

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आजकल देश के विभिन्न राज्यों पर टिड्डी दल के हमले हो रहे हैं इसी टिड्डी नाम से याद आते हैं बचपन के वे दोस्त जिनका संबोधन हम असली नाम से ना करके अन्य मजाकिया उपनाम से कर देते थे। सबसे ज्यादा टर-टर करने वाले अर्थात् बातूनी या बेवजह हर कहीं घुसपैठ करने वाले मूर्ख दोस्त को मजाक में सभी 'टिड्डा' कहकर संबोधित करते थे, तब टिड्डा एक मजाक लगता था लेकिन पता नहीं था एक दिन असली टिड्डे दुनिया के लिए आफत बन जाएंगे।


ठीक है एक अकेला मूर्ख इंसान समाज के लिए इतनी बड़ी आफत नहीं होता, लेकिन इन्हीं मूर्खों का यदि दल बन जाए तो वह समाज रूपी फसल को फटाफट चट करते देर नहीं लगाता। यह भी सच है कि एक अकेला टिड्डा कुछ नहीं कर सकता वह तो पत्ते और तने खाता है लेकिन जब यही टिड्डा झुंडों या दल बल के साथ आता आता है तो भारी तबाही मचाता है, तब यह तने और पत्ते ही नहीं पूरी फसलों को भी चट कर जाता है।
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टिड्डों के इसी समूह और दल को 'टिड्डी दल' कहा गया हैं। इस वक्त मानवता के लिए खतरा बन चुके कोरोना वायरस से पूरा विश्व एकजुट हो कर निपट रहा है।

एक अकेले कोरोना से निपटने के लिए हर कोई विशेषज्ञ बन चुका है, लेकिन इसी दौर में टिड्डी दल से निपटने के लिए कोई संगठित नजर नहीं आ रहा शायद समाज के अन्य वर्ग यह सोच रखते हैं कि टिड्डी दल से तो किसानों को ही नुकसान होगा उन्हें क्या? लेकिन वे भूल जाते हैं कि किसान द्वारा उत्पादित किया हुआ तब ही खाएंगे जब टिड्डी दल से कुछ बचा पाएंगे और बचेगा सभी के संयुक्त प्रयासों से ही।

एक अकेले टिड्डे को तो पक्षी भी अपनी खुराक बना लेते हैं...

टिड्डी दल को दुनिया का सबसे विनाशकारी प्रवासी कीट माना गया है - फोटो : Social media
एक अकेले टिड्डे को तो पक्षी भी अपनी खुराक बना लेते हैं, लेकिन इनके दल में इतना बल है कि ये टिड्डी दल एक दिन में लगभग 90 मील तक की दूरी तय कर सकता है, औसत रूप से एक छोटा टिड्डी का झुंड एक दिन में इतना खाना खा जाता है जितना 10 हाथी, 25 ऊंट या 2500 व्यक्ति खा सकते हैं।

टिड्डियां पत्ते, फूल, फल, बीज, तने और उगते हुए पौधों को खाकर नुकसान ही नहीं पहुंचाती हैं बल्कि जब ये समूह में पेड़ों पर बैठती हैं तो इनके भार से पेड़ तक भी टूट जाते हैं। इसी टिड्डी दल को दुनिया का सबसे विनाशकारी प्रवासी कीट माना गया है, जिसमें लगभग 4 करोड़ टिड्डों का एक झुंड होता है।

आज फसल-विनाशक टिड्डी दल के दोहरे खतरे ने सभी के चेहरों पर चिंताओं की लकीरों को उकेर दिया है। राजस्थान, मध्यप्रदेश, गुजरात व अन्य राज्यों में टिड्डों ने खेतों को तबाह करना शुरू कर दिया है।

विश्व में टिड्डियों की निम्नलिखित 10 प्रमुख प्रजातियां पाई जाती हैं रेगिस्तानी टिड्डी, बोम्बे टिड्डी, प्रवासी टिड्डी , इटेलियन टिड्डी, मोरक्को टिड्डी, लाल टिड्डी, भूरी टिड्डी, दक्षिणी अमेरिकन टिड्डी, आस्ट्रे्लियन टिड्डी, वृक्ष टिड्डी, आदि।

भारत में केवल चार प्रजातियां अर्थात रेगिस्तानी टिड्डी (शिस्टोिसरका ग्रेगेरिया), प्रवासी टिड्डी (लोकस्टा माइग्रेटोरिया), बोम्बेे टिड्डी (नोमेडेक्रिस सुसिंक्टा) और वृक्ष टिड्डी (ऐनेक्रिडियम प्रजाति) पाई जाती हैं। रेगिस्तानी टिड्डी भारत में और इसके साथ-साथ अन्य महाद्वीपों के बीच सबसे प्रमुख नाशीजीव प्रजाति है।

भारत में टिड्डी दल के हमलों से बचाव के लिए टिड्डी चेतावनी संगठन की स्थापना (एलडब्ल्यूओ) 1939 में की गई थी। संगठन की रिपोर्ट बताती है कि 1964 में 4, 1968 में 167, 1970 में 2, 1973 में 6, 1974 में 6, 1975 में 19, 1976 में 2, 1978 में 20, 1983 में 26, 1986 में 3, 1989 में 15, 1993 में 172, 1997 में 4 टिड्डी झुंडों के आक्रमणों की संख्या थी।
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ग्रामीणों को टिड्डी पकड़ने के बदले नगद पैसे दिए जा रहे हैं...

टिड्डियों की रोकथाम के लिए बहुत से तरीके अपनाए जा रहे हैं - फोटो : पीटीआई
संगठन का अनुमान है कि 1926 से 1931 के बीच टिड्डियों के हमले से लगभग 10 करोड़ का नुकसान हुआ, जो 100 साल के दौरान सबसे अधिक है। इसी तरह 1940-46 और 1949-55 के दौरान दो बार टिड्डियों का हमला हुआ और दोनों बार लगभग दो-दो करोड़ रुपए का नुकसान हुआ।

1959-1962 के चक्र में केवल 50 लाख रुपए का नुकसान हुआ, हालांकि 1962 के बाद कोई टिड्डी प्लेग चक्र नहीं देखा गया। इसके बाद 1978 और 1993 में टिड्डियों का हमला हुआ जिसमें 1978 में 2 लाख और 1993 में लगभग 7.18 लाख रुपए के नुकसान का आकलन किया गया। 

कोरोना काल में देश के नागरिकों ने जिस तरह अति चिंता जाहिर कर कोरोना चिंता को और बढ़ाने का काम किया उसने भी टिड्डी दल के हमलों को भी अप्रत्यक्ष रूप से बढ़ावा दिया है। जिन प्रवासी मजदूरों के कंधों पर विभिन्न राज्यों की फसलों की रखवाली का जिम्मा था, उनका एक काम प्रवासी टिड्डी दलों के हमलों से फसलों का बचाव करना भी था, लेकिन प्रवासी मजदूरों पर टिड्डी दल नहीं बल्कि राजनीतिक दल भारी पड़ गए।

मजदूर तो लौट चले अपने-अपने प्रदेश परंतु पीछे रह गए अकेले किसान जिन्हें शायद ही कोई दल गंभीरता से ले क्योंकि सभी के लिए कोरोना का रोना ही इस दौर में प्राथमिकता है, भविष्य में इस बात की क्या गांरटी है कि जो कोरोना से बच जाएगा वह खाद्यान्न की कमी के चलते भूख से न मरे।
 
टिड्डियों की रोकथाम के लिए बहुत से तरीके अपनाए जा रहे हैं जैसे दवाएं स्प्रे करना जिनमें टिड्डी दल को इकट्ठे होने पर फ्लेमथ्रोअर से जलाना, इसी तरह थालियां, ढोल, नगाड़़े, लाउडस्पीकर, डीजे आदि दूसरे देसी तरीकों के माध्यम से शोरगुल मचाकर भी टिड्डी दल को भगाने आदि के तरीकों की सहायता ली जा रही है।

हाल ही में पाकिस्तान ने टिड्डियों के हमले से निपटने के लिए एक अनूठी पहल की है जिससे न केवल टिड्डियों से छुटकारा ही मिलेगा बल्कि इन टिड्डियों के टुकड़ों से मुर्गियों के चारे में मिलाकर भोजन के रूप में इस्तेमाल किया जाएगा।

ग्रामीणों को टिड्डी पकड़ने के बदले नगद पैसे दिए जा रहे हैं, बात मुर्गियों तक ही सीमित नहीं टिड्डी प्रोटीन से भरपूर होती है और इतिहास बताता है कि यमन में अकाल के दौरान प्रशासन ने लोगों को टिड्डी खाने के लिए प्रोत्साहित किया था।

देश में लोगों को जरूरी नहीं प्रोटीन टिड्डियों से ही उपलब्ध हो यदि हम अपनी फसल को इन टिड्डी दलों से बचा लें तो हमारी प्रोटीन उस खाद्यान्न से भी पूरी हो सकती है, किसानों को प्रशिक्षित करके टिड्डी दलों को जालों या अन्य साधनों से पकड़ कर मुर्गी पालन उद्योग के लिए भरपूर खुराक उपलब्ध करवाई जा सकती है और इस प्रकिया से किसानों की आजीविका में भी वृद्धि होगी एक तरफ उनके लिए टिड्डी दल आफत की बजाए आय का एक साधन बन सकता है तो दूसरी तरफ़ मुर्गीपालन के लिए भोजन का स्त्रोत बन जाएगा, परंतु इसके लिए टिड्डी दल नहीं अन्य दलों को अपने इच्छा-बल से पहल करनी होगी। 


डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।
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