नेपाल ने अपने रवैये में आक्रमकता लाई है।
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ताज़ी सूचनाओं पर भरोसा करें तो पाकिस्तान चीन को गिलगित का एक बड़ा भू भाग मुफ़्त देना चाहता है। इसकी वजह यह है कि पाकिस्तान चीन आर्थिक गलियारा परियोजना के लिए चीन ने पाकिस्तान को क़रीब 22 अरब डॉलर क़र्ज़ दिया है। इसे वापस लौटाना पाकिस्तान के लिए अगले सौ बरस तक भी मुमकिन नहीं होगा। इसीलिए वह क्षेत्र का बड़ा हिस्सा चीन को तोहफे के तौर पर देना चाहता है। पाकिस्तान के सुप्रीमकोर्ट का निर्णय इसीलिए भारत को नाग़वार है।
वास्तव में गिलगित - बाल्टिस्तान पाकिस्तान में होते हुए भी वहाँ के अन्य राज्यों की तरह नहीं है। उसे अधिक स्वायत्तता हासिल रही है। लेकिन दो बरस से पाकिस्तान वहांं के लोगों को हासिल हक़ चालाकी से छीनता जा रहा है। भारत इस चीन -पाक आर्थिक परियोजना का विरोध इसलिए कर रहा है क्योंकि गिलगित -बाल्टिस्तान का बड़ा क्षेत्र इसमें शामिल है।
भारत का कहना है कि यह कश्मीर का हिस्सा है और समूचे कश्मीर का विलय भारत में हो चुका है, इसलिए भारत का गिलगित इलाक़े को लेकर उठाया गया नया क़दम और बयान चीन को चिंता में डालने वाला है। सतही तौर पर कारण जो भी नज़र आए , नेपाल का बदला रुख़ चीन के दबाव का नतीजा है और सिक्किम सीमा पर तनाव पैदा करके वह भारत को एक रणनीतिक सन्देश देना चाहता है। भारत के लिए यह बेहद संवेदनशील समय है। वह कुछ भी कर ले ,चीन पाकिस्तान को संरक्षण देना बंद नहीं करेगा।
इसके पीछे एक कारण और है। चीन को पता है कि इस महाद्वीप में अगर वह पाकिस्तान को लेकर तनिक भी उदासीन हुआ तो अमेरिका पाकिस्तान में अपनी जड़ें जमाने के लिए तैयार बैठा है। दशकों से वह पाकिस्तान में अमेरिकी सैनिक अड्डा बनाने के प्रयास कर रहा है। इस तरह पाकिस्तान चीन और अमेरिका के बीच सेंडविच भी है।
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