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स्मृति शेष: आशा ताई की आवाज में थी विद्रोह की अभिव्यक्ति

सार

आशा ताई की गायकी में जो चुलबुलापन, खुलापन और जीवन्तता थी, वह दरअसल उनके भीतर के उसी विद्रोह की अभिव्यक्ति थी। उनका जाना केवल एक महान गायिका का निधन नहीं, अपितु उस जीवंत, प्रयोगधर्मी और बेबाक संगीत परंपरा का विराम है, जिसे उन्होंने अपने स्वर से आकार दिया था।
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आशा भोसले का निधन - फोटो : एक्स
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विस्तार
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भारतीय फिल्म संगीत का एक पूरा युग आज स्मृतियों में सिमट गया है। आशा भोसले, जिन्हें प्यार से आशा ताई भी कहते थे, अब हमारे बीच नहीं रहीं, लेकिन उनकी आवाज, उनका अंदाज और उनका साहसिक व्यक्तित्व आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा बना रहेगा।

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उनका जाना केवल एक महान गायिका का निधन नहीं, अपितु उस जीवंत, प्रयोगधर्मी और बेबाक संगीत परंपरा का विराम है, जिसे उन्होंने अपने स्वर से आकार दिया था।

आशा भोसले ने अपने समय में जो राह चुनी, वह आसान नहीं थी। जब संगीत की दुनिया एक तयशुदा ढांचे में बंधी हुई थी और उनकी बड़ी बहन लता मंगेशकर की स्वर-सत्ता अपने शिखर पर थी, तब उनके लिए उसी मार्ग पर चलना सबसे सुरक्षित विकल्प हो सकता था, लेकिन उन्होंने सुरक्षित राह के बजाय अपनी अलग पहचान बनाने का निर्णय लिया। यह निर्णय ही उनके व्यक्तित्व का सबसे सशक्त परिचायक था। एक ऐसा कलाकार, जो परंपराओं का सम्मान करते हुए भी उनसे बंधकर नहीं रहना चाहता।

आशा ताई की गायकी में जो चुलबुलापन, खुलापन और जीवन्तता थी, वह दरअसल उनके भीतर के उसी विद्रोह की अभिव्यक्ति थी। उन्होंने उन गीतों को भी पूरे आत्मविश्वास और रचनात्मकता के साथ गाया, जिन्हें उस दौर में अक्सर हल्के या सीमांत माना जाता था, लेकिन उन्होंने यह साबित किया कि कोई भी शैली छोटी या बड़ी नहीं होती। उसे उसका दृष्टिकोण और प्रस्तुति बड़ा कलाकार बनाती है।
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आर.डी. बर्मन और आशा जी की जोड़ी

आर.डी. बर्मन के साथ उनका रचनात्मक संबंध भारतीय संगीत के इतिहास में एक निर्णायक मोड़ की तरह रहा। इस जोड़ी ने मिलकर संगीत को नई ध्वनियों, नए प्रयोगों और एक वैश्विक पहचान से जोड़ा। यह केवल गीतों की सफलता नहीं थी, बल्कि एक सोच का विस्तार था, जहां भारतीयता और आधुनिकता का संतुलन दिखाई देता है।

आज जो विविधता और प्रयोग हमें संगीत में सहज रूप से दिखाई देते हैं, उसकी नींव कहीं न कहीं उसी दौर में रखी गई थी।

उनका सफर संघर्षों से अछूता नहीं रहा। शुरुआती दौर में उन्हें सीमित अवसर मिले। अक्सर उन्हें स्थापित ढांचे के बाहर रखा गया, लेकिन उन्होंने कभी शिकायत को अपनी पहचान नहीं बनने दिया। उन्होंने हर छोटे अवसर को अपनी कला के जरिए बड़ा बनाया और धीरे-धीरे वही आवाज मुख्यधारा की सबसे प्रभावशाली आवाजों में शामिल हो गई।


संगीत की स्मृतियों में हमेशा गूंजती रहेगी ताई की आवाज

आज, जब हम उन्हें याद करते हैं तो यह केवल उनके गीतों को याद करना नहीं है, बल्कि उस सोच को याद करना है, जो उन्होंने हमें दी। उन्होंने यह सिखाया कि कलाकार की असली पहचान उसकी अलग होने की क्षमता में है। उन्होंने यह दिखाया कि परंपरा को आगे बढ़ाने के लिए कभी-कभी उससे अलग रास्ता चुनना भी जरूरी होता है।

आशा ताई की आवाज अब भले ही नए गीतों में न सुनाई दे, लेकिन वह भारतीय संगीत की स्मृतियों में हमेशा गूंजती रहेगी। एक ऐसी गूंज, जो हमें यह याद दिलाती है कि सच्ची कला समय से परे होती है। उनका विद्रोह, उनकी चुलबुलाहट और उनका साहस अब इतिहास का हिस्सा है, लेकिन यही इतिहास आने वाले समय को दिशा देता रहेगा।


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डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

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