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उनका खाना भी अपनी तरह ही बनता है

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लेबनान और हमारे बीच भले ही हजारों मील की दूरी हो, लेकिन वहां का खानपान भी हमारे यहां की तरह ही है। जैसे मसाले हमारे यहां प्रयोग होते हैं, वैसे ही मसाले वहां के भोजन में इस्तेमाल किए जाते हैं। वहां शासन भले ही तुर्कों का रहा हो या फ्रांस की हवा चली हो। लेकिन लेवेंटाइन खानपान कुछ-कुछ हमारे जैसा ही है।

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लेबनान का खाना संसार की प्राचीनतम भोजन परंपराओं में शुमार किया जाता है। इतिहासकारों का मानना है कि लेबनान उसी भौगोलिक क्षेत्र का भाग है, जिसे सुनहरे अर्द्ध चंद्र का नाम दिया जाता है, क्योंकि जो कुछ आज हम खाते हैं, उनमें बहुतेरी फसलें मनुष्य ने पहले-पहल यहीं उगाई थीं। लेबनान का खाना ‘लेवेंटाइन खाना’ भी कहलाता है और भूमध्य सागरीय देशों के खाने का सहोदर है। 1560 से लगभग पौने चार सौ बरस तक लेबनान पर तुर्की का शासन चला, इसलिए तुर्कों के खाने का प्रभाव लेबनान के भोजन पर पड़ना स्वाभाविक है। महायुद्ध में तुर्की की हार हुई और फ्रांस का आधिपत्य स्थापित हुआ। इसी कारण नजाकत-नफासत का अंदाज यहां के खाने में भी अधिक नजर आता है। यहां पेस्ट्रियों और टार्ट का प्रसार फ्रांसीसी दौर में तेजी से हुआ था। 

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हिंदुस्तानियों को लेबनान का खाना अपना-सा लगता है, क्योंकि हमारी तरह लेबनान भी अनाज, सब्जियों, काबुली चने, तिल आदि को मांस से ज्यादा तवज्जो देता है। वहीं, मांस में बकरा सबसे लोकप्रिय है फिर मुर्गे का नंबर आता है। सब्जियां कच्ची सलाद के रूप में ज्यादा और बहुत कम पकाकर खाई जाती हैं। ‘बाबा गनुश’ ठंडा बैंगन का रायता सरीखा भर्ता होता है। वहीं, ‘हुम्मुस’ उबले काबुली चने की चटनी होती है, जिसे कई व्यंजनों का साथ निभाना पड़ता है। जैतून का तेल सर्वश्रेष्ठ समझा जाता है, जो अक्सर कच्चा ही इस्तेमाल होता है। पिसे चने का तला कोफ्ता ‘फलाफल’ नाश्ते या अल्पाहार के काम आता है, तो ‘शवर्मा’ की तुलना आप काठी कबाब जैसे रोल से कर सकते हैं। ‘ताहिनी’ सॉस सफेद तिल, नींबू के रस और जैतून के तेल से तैयार किया जाता है। मिठाई के नाम पर ‘बकलावा’ और अन्य हलवे अरबों की सौगात है। अंगूर की बेल के पत्तों में भरे ‘दोलमांतिस’ यूनान से आए हैं। लेबनान के निवासी ‘पीटा रोटी’ के अलावा ‘रूमाली रोटी’ जैसी बड़ी-सी चपटी रोटी बहुत चाव से खाते हैं। 

‘कूसकूस’ को सलाद की शक्ल वाले पुलाव की तरह पेश करते हैं। ‘फतूश’ को आप मुफलिस किसान की खुराक कह सकते हैं। इसमें रोटी के साथ हरी सब्जियां और पुदीना देते हैं। ‘तबूलेह’ मांस और सब्जियों का मिला-जुला व्यंजन है, तो चावल मांस और मेवों से पुलाव जैसा एक व्यंजन भी यहां प्रचलित है। दाल, चावल या गेहूं का मिश्रण खिचड़ी ही लगती है। ‘दाउद बचा’ का नामकरण पता नहीं कैसे हुआ? यह टमाटर के गाढ़े शोरबे में कोफ्ते होते हैं। ‘बटाटा हरा’ चटपटे आलू हैं, तो शाकाहारियों को भरवां लौकी, तोरी और बैंगन तथा लौकी के भांजे ललचाते हैं। तटवर्ती देश होने के कारण मछली और झींगे भी लेबनानी खाने का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। इनमें भी वैसे ही मसाले पड़ते हैं, जिनके हम लोग आदी हैं जैसे जीरा, काली मिर्च आदि। 

लेबनान के विभिन्न प्रांतों में खाना मौसम के साथ बदलता है, पर लगभग बारह महीने पनीर और दही अवश्य हर मेन्यू का हिस्सा रहते हैं। हां, यह दही योगर्ट के अधिक करीब लगता है- पानी निथारे गाढ़े दही जैसा। लेबनान में फलों के रस के अलावा शरबत और लस्सी से मिलते-जुलते पेय लोकप्रिय हैं, जिनके साथ हमेशा चबेना नुमा व्यंजन खाए जाते हैं। विडंबना यह है कि इजराइल और लेबनानी फिलहाल एक-दूसरे के जानी दुश्मन बने हैं, पर इनके खानपान में बहुत समानता है। हाल कुछ-कुछ विभाजन के बाद भारत और पाकिस्तान जैसा है।
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