मेरी दिल की डायरी में ऐसे सबक बहुत शुरू से दर्ज हैं। बच्चे के अभिभावक के तौर पर आपकी जिम्मेदारी पहले दिन से शुरू हो जाती है। अगर मैं अपनी बेटी सायरा की बात करूं तो मैं उसे पूरे दिन में सिर्फ 30 मिनट का स्क्रीन टाइम देती हूं। वह कुछ भी देखे। उसे आईपैड पसंद हो, लैपटॉप पसंद हो या टीवी देखना पसंद हो, लेकिन समय मैं उसे सिर्फ 30 मिनट ही देती हूं। और, इस बात का खास ध्यान रखती हूं कि खाना खाते समय उसके सामने किसी तरह का कोई स्क्रीन न होता।
मेरा ये भी मानना है कि बच्चों में खाने की अच्छी आदतें डालने के लिए आपको अपने बच्चों को शुरू से रसोईघर में साथ ले जाना चाहिए। हमारे घर में मेरी दोनों बहनों तक ये रिवाज रहा भी। लेकिन मैं जब किचन में जाती थी तो मुझे डांट पड़ती थी। इसका असर मुझ पर ये हुआ कि सही खाने को लेकर मेरी दिक्कतें बहुत दिनों तक बनी रहीं। मैं 16 साल की थी, जब मुंबई आ गई। और, जब सायरा हुई तो मुझे तमाम सारी दिक्कतों का सामना करना पड़ा। ऐसा नहीं है कि घर पर जो हो रहा है, बच्चों पर सिर्फ उसी का असर होता है, स्कूल में, दोस्तों के घरों पर होने वाली बातों का भी बच्चों के मानसिक विकास पर सीधा असर होता है।
सायरा के लिए मैं बच्चों के साथ प्ले डेट्स (खेलने का दिन) आयोजित करती रही हूं, उसकी उम्र के बच्चे आते हैं तो उनका माएं मुझे तमाम तरह की हिदायतें भेजती हैं कि उनके बच्चे को इस चीज से एलर्जी है, उनका बच्चा ये नहीं खाता। आजकल के बच्चे सोया नहीं खा सकते, फलियां नहीं खा सकते, अखरोट, काजू, बादाम नहीं खा सकते, दूध नहीं पीते हैं वो, तो मैं अक्सर उनसे पूछती कि फिर ये खाएंगे क्या? दाल, रोटी, सब्जी तो चलेगा ना?
मेरा मानना है कि बच्चों को शुरू से खाना बनाने का प्रक्रिया में साथ रखना चाहिए। ये मैंने अपनी बेटी के साथ सीखा। तो जब मैं सायरा को भिंडी खिलाने की कोशिश करती हूं तो पहले उसे अपने साथ रसोईघर ले जाती हूं। हम साथ मिलकर भिंडिंयां धोते हैं, काटते हैं और साथ ही उसे पकाते हैं।
इस दौरान उसे ये भी समझाने की कोशिश करती हूं कि ये सब्जी कैसे बन रही है, क्या-क्या मसाले इसमें डाले जा रहे हैं। अब जब खाना तैयार होता है और वह खाने की टेबल पर आती है तो उसे इस बात की खुशी होती है कि उसने मां के साथ मिलकर जो बनाया, अब उसे खाने की बारी है। जाहिर है बच्चों में खाने को लेकर दिलचस्पी तभी पैदा होगी, जब आप उन्हें अपने साथ खाना बनाने देंगे।
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