क्या है खरपतवार और महिला की कहानी
अट्ठारह साल पहले अपनी पीएच डी के दौरान मैं नीलगिरी जीवमंडल रिजर्व में विभिन्न वनों की देशी वनस्पतियों और पारिस्थितिकी पर बाहरी खरपतवारों के प्रभाव पर शोध कर रही थी। दक्षिण अमेरिकी खरपतवार लैन्टाना के बारे में मैंने तभी जाना। कोयंबटूर के सिरुवनी इलाके समेत कई जगहों की मूल वनस्पतियों के लिए लैन्टाना बड़ा खतरा थी। अपने अध्ययन में मुझे पता चला कि किसी रसायन के प्रयोग से इस खरपतवार को खत्म कर पाना बहुत मुश्किल होता है, क्योंकि इससे दूसरी जरूरी वनस्पतियों पर बहुत प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। तत्काल तो नहीं, पर कुछ वक्त बीतने के बाद मैंने इस समस्या के बारे में सोचना शुरू कर दिया।
स्थानीय समुदाय का सहयोग
मैं चाहती थी कि किसी तरह स्थानीय समुदाय को इस खतरनाक खरपतवार से मुक्ति मिले। लैन्टाना की प्रवृत्ति बांस की तरह होती है, लेकिन यह बांस से कहीं ज्यादा टिकाऊ होती है। यह देखते हुए मेरे दिमाग में इसको खत्म करने के बजाय प्रयोग करने का विचार आया। और सोचा कि क्यों न इससे फर्नीचर बनाया जाए।
जब लैन्टाना पर रिपोर्ट हुई तैयार
कोयंबटूर के अमृता विश्वविद्यालय में एसोसिएट प्रोफेसर बनने के बाद मैंने लैन्टाना को लेकर एक प्रोजेक्ट रिपोर्ट तैयार की कि कैसे इससे फर्नीचर बनाकर स्थानीय आदिवासी समुदाय के लिए अतिरिक्त आय मुहैया की जा सकती है। यह विचार बिल्कुल एक पंथ दो काज सरीखा था। जरूरत बस यही थी कि इस विचार को जमीन पर कैसे उतारा जाए। मेरे विचार को फंडिंग एजेंसी से अनुमोदित होने में चार साल लग गए। आखिरकार 2015 में मैंने आदिवासियों के बीच काम शुरू कर दिया। लेकिन यह काम इतना आसान नहीं था।
लैंन्टाना से हुआ चमत्कार
जंगल के उन इलाकों से लैन्टाना लेकर आना खतरे का काम था, जहां हाथियों के आक्रमण की आशंका हमेशा बनी रहती हो। फिर भी मैंने कुछ लोगों को इस काम के लिए तैयार कर लिया। इसके बाद मैंने बंगलूरू स्थित एक संस्था के माध्यम से तीन गांवों के चालीस ग्रामीणों के लिए प्रशिक्षण की व्यवस्था की। इसमें ग्रामीणों को लैन्टाना को काटने से लेकर उससे फर्नीचर, हस्तशिल्प, खिलौने और दूसरी उपयोगी वस्तुएं बनाना सिखाया गया। लैन्टाना से फर्नीचर बनाना थोड़ा अलग किस्म का काम है। इसे काटने-छीलने के बाद पानी में खौलाना पड़ता है, ताकि यह लचीला बन सके। इससे बने फर्नीचर बिल्कुल बांस या बेंत सरीखे दिखते हैं, लेकिन ये उनसे ज्यादा मजबूत होते हैं और इनकी लागत भी अपेक्षाकृत कम होती है।
मैं प्रशिक्षण के दायरे को लगातार बढ़ाती रही। नए लोगों को भी इसकी ट्रेनिंग दी जा रही है। इस पहल से आदिवासियों के साथ अन्य ग्रामीण युवाओं को भी रोजगार के लिए बाहर नहीं जाना पड़ रहा है और महिलाओं को भी आर्थिक मदद मिल रही है, जिससे वे सशक्त बन रही हैं। ट्राइबल कोऑपरेटिव मार्केटिंग डेवलपमेंट फेडरेशन ऑफ इंडिया के जरिये मैं इनके द्वारा बनाए गए उत्पादों को देश के विभिन्न बाजारों तक पहुंचाने में भी मदद करती हूं।
मैं इन उत्पादों को ई-कॉमर्स वेबसाइट्स के माध्यम से बड़े पैमाने पर लॉन्च करने की योजना बना रही हूं। इस प्रोजेक्ट को पर्यावरण मंत्रालय द्वारा सहायता प्रदान की जा रही है। इसके साथ ही कई सोशल मीडिया अभियानों से लैन्टाना से बने इन फर्नीचर को काफी बढ़ावा मिल रहा है। खुशी है कि मुझे इस काम के लिए इंटरनेशनल वुमन अचीवर अवॉर्ड से सम्मानित भी किया जा चुका है।
डिस्क्लेमर (अस्वीकरण) : यह लेखक के निजी विचार हैं. आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है. आप भी अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं. लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें.