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लक्ष्मी भंडार बनाम अन्नपूर्णा योजना: आधी आबादी की नाराजगी कहीं महंगी न पड़े!

सार

पश्चिम बंगाल की सियासत में आधी आबादी को साधने वाली योजनाएं हमेशा से बेहद अहम रही हैं। ममता बनर्जी सरकार की ‘लक्ष्मी भंडार’ योजना ने महिलाओं के बीच अपनी मजबूत मौजूदगी बनाई, लेकिन सत्ता बदलने के बाद अब ‘अन्नपूर्णा’ योजना के सामने वही भरोसा कायम करने की चुनौती है। चुनौती इसलिए भी बड़ी है क्योंकि योजना को लेकर भुगतान में देरी, लाभार्थियों के नाम और दूसरी प्रशासनिक दिक्कतों की शिकायतें सामने आ रही हैं। कई जगह महिलाओं के विरोध और धरना-प्रदर्शन ने सरकार के सामने सवाल खड़े कर दिए हैं। ऐसे में सवाल सिर्फ योजना का नहीं, बल्कि सरकार और आधी आबादी के बीच भरोसे का है।
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अन्नपूर्णा योजना पश्चिम बंगाल - फोटो : AdobeStock
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विस्तार
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Lakshmi Bhandar vs Annapurna Yojana: महिलाओं को सीधे आर्थिक सहायता देने वाली योजनाओं ने पश्चिम बंगाल की राजनीति में एक अलग जगह बनाई है। लक्ष्मी भंडार इसी वजह से चर्चा में रहा। योजना का उद्देश्य महिलाओं को आर्थिक मदद देना था और इसका सीधा संबंध उनके घरेलू बजट से था। अब सत्ता परिवर्तन के बाद अन्नपूर्णा योजना के सामने भी महिलाओं तक आर्थिक सहायता पहुंचाने की जिम्मेदारी है।
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लेकिन सवाल यह है कि क्या सिर्फ योजना का नाम बदलने से लाभार्थियों का अनुभव भी बदल गया? क्या अन्नपूर्णा योजना उस आसानी से महिलाओं तक पहुंच रही है, जिसकी सरकार ने उम्मीद की थी? और क्या जमीन पर सामने आ रही शिकायतें सिर्फ शुरुआती प्रशासनिक दिक्कतें हैं या इनके पीछे कोई बड़ी व्यवस्था संबंधी समस्या है?

अन्नपूर्णा को लेकर महिलाएं सड़क पर क्यों?
किसी भी कल्याणकारी योजना की असली परीक्षा सरकारी घोषणा में नहीं, बल्कि लाभार्थी के खाते तक पहुंचने वाले पैसे में होती है। अगर किसी महिला को भुगतान में देरी हो रही है, उसका नाम सूची में नहीं है या आवेदन की स्थिति स्पष्ट नहीं है, तो उसके सामने सवाल खड़ा होना स्वाभाविक है।लेकिन सवाल इससे आगे का है। जिस महिला के लिए योजना बनाई गई, उसी महिला को अपना हक पाने के लिए धरना या प्रदर्शन क्यों करना पड़ रहा है?
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सरकार के सामने यह तर्क हो सकता है कि नई योजना लागू करने में सत्यापन, दस्तावेज और तकनीकी प्रक्रिया के कारण शुरुआती परेशानी हो सकती है। लेकिन लाभार्थी के लिए समस्या का कारण उतना महत्वपूर्ण नहीं जितना उसका समाधान है। अगर भुगतान रुकता है, तो उसे कब तक मिलेगा? अगर नाम नहीं है, तो उसे क्यों नहीं जोड़ा गया? और अगर कोई तकनीकी समस्या है, तो उसे दूर करने की समयसीमा क्या है?

क्या भुगतान में देरी सबसे बड़ी कमजोरी है?
आर्थिक सहायता योजना में सबसे महत्वपूर्ण बात उसकी नियमितता है। लाभार्थी यह जानना चाहता है कि सरकार ने जो सहायता घोषित की है, वह उसके खाते में कब पहुंचेगी। अगर भुगतान में देरी होती है तो सवाल सिर्फ प्रशासनिक व्यवस्था पर नहीं उठता, बल्कि योजना की विश्वसनीयता पर भी उठता है। सरकार को यह स्पष्ट करना होगा कि कितने लाभार्थियों को भुगतान किया जा चुका है और कितने मामले लंबित हैं।

क्या भुगतान में देरी तकनीकी समस्या है? क्या बैंकिंग प्रक्रिया में अड़चन है? क्या लाभार्थियों के सत्यापन में समय लग रहा है? या फिर स्थानीय प्रशासन के स्तर पर कोई कमी है? इन सवालों का जवाब जितना जल्दी मिलेगा, अन्नपूर्णा को लेकर उठ रहे सवाल उतनी जल्दी शांत हो सकते हैं।

लाभार्थियों का नाम सूची से बाहर क्यों?
अन्नपूर्णा योजना से जुड़ा एक और अहम सवाल लाभार्थियों की सूची को लेकर है। अगर किसी महिला का नाम सूची में नहीं है, तो उसे यह जानने का अधिकार है कि ऐसा क्यों हुआ। क्या वह पात्रता के दायरे में नहीं आती? क्या उसके दस्तावेज में कोई कमी है? क्या सत्यापन लंबित है? या फिर तकनीकी गलती हुई है?

समस्या तब और गंभीर हो जाती है जब लाभार्थी को यह पता ही न चले कि उसका नाम क्यों नहीं है। इसलिए सरकार को ऐसी व्यवस्था बनानी होगी जिसमें महिला अपने आवेदन की स्थिति देख सके और नाम शामिल नहीं होने का कारण जान सके।सिर्फ सूची जारी कर देना पर्याप्त नहीं है। पारदर्शिता का मतलब यह भी है कि जिस महिला का नाम नहीं है, उसे उसके कारण की जानकारी मिले और सुधार का रास्ता भी बताया जाए।

लक्ष्मी भंडार के मुकाबले अन्नपूर्णा पिछड़ी क्यों?

यही इस पूरे विवाद का सबसे अहम सवाल है। लक्ष्मी भंडार की तुलना में अन्नपूर्णा के सामने शुरुआती दौर में ही भुगतान, नाम और प्रशासनिक शिकायतों की चर्चा क्यों हो रही है? क्या अन्नपूर्णा की प्रक्रिया ज्यादा जटिल है? क्या लाभार्थियों के सत्यापन में ज्यादा समय लग रहा है? क्या स्थानीय प्रशासन को योजना की पूरी जानकारी नहीं है? या फिर सरकार और लाभार्थियों के बीच संवाद की कमी है?

इन सवालों का जवाब जरूरी है, क्योंकि किसी योजना की सफलता केवल इस बात से तय नहीं होती कि उसे कितने लोगों के लिए घोषित किया गया। असली पैमाना यह है कि पात्र महिला को लाभ पाने में कितनी परेशानी हुई।

क्या यह विरोध सरकार के लिए चेतावनी है?

महिलाओं का धरना-प्रदर्शन अपने आप में यह साबित नहीं करता कि पूरी योजना विफल है। लेकिन ऐसी शिकायतों को नजरअंदाज करना भी सरकार के लिए सही रणनीति नहीं हो सकती।अगर शिकायतें अलग-अलग इलाकों से लगातार सामने आती हैं, तो प्रशासन को यह पता लगाना होगा कि समस्या स्थानीय है या व्यवस्था से जुड़ी हुई।

सरकार को यह बताना चाहिए कि कितनी शिकायतें मिलीं, कितने मामलों का समाधान हुआ, कितने भुगतान लंबित हैं और कितने लाभार्थियों के नाम जोड़े या सुधारे गए। आंकड़े सामने होंगे तो बहस भी साफ होगी और सरकार के पास अपने पक्ष में जवाब देने का आधार भी होगा।

आधी आबादी की नाराजगी महंगी न पड़ जाए?

महिलाओं से जुड़ी योजनाओं का महत्व सिर्फ इसलिए नहीं है कि उनमें आर्थिक सहायता दी जाती है। इन योजनाओं का सीधा संबंध परिवार की आर्थिक जरूरतों से होता है। इसलिए लाभ मिलने या न मिलने का असर लाभार्थी के अनुभव पर पड़ता है। यही वजह है कि अगर अन्नपूर्णा को लेकर शिकायतें लगातार बढ़ती हैं, तो सरकार के लिए इसे केवल प्रशासनिक मामला मानना मुश्किल होगा।

हालांकि अभी यह निष्कर्ष निकालना जल्दबाजी होगी कि योजना को लेकर व्यापक राजनीतिक नाराजगी पैदा हो गई है। लेकिन महिलाओं की शिकायतों का समाधान नहीं हुआ तो विपक्ष को सरकार पर सवाल उठाने का मौका जरूर मिलेगा।

शुभेंदु सरकार के सामने चुनौती क्या है?

अन्नपूर्णा योजना को लेकर सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती भरोसा कायम करने की है। इसके लिए उसे तीन स्तरों पर काम करना होगा—समय पर भुगतान, पारदर्शी लाभार्थी सूची और आसान शिकायत निवारण व्यवस्था। आसरकार अगर यह स्पष्ट कर दे कि कितने लाभार्थियों को भुगतान मिल चुका है, कितने मामलों में देरी है और लंबित मामलों का समाधान कब तक होगा, तो काफी हद तक भ्रम दूर किया जा सकता है।

इसी तरह जिन महिलाओं के नाम सूची में नहीं हैं, उनके लिए स्पष्ट अपील या शिकायत की व्यवस्था जरूरी है। इससे महिलाओं को बार-बार प्रदर्शन करने के बजाय संस्थागत तरीके से अपनी समस्या रखने का रास्ता मिलेगा।

असली मुकाबला नाम का नहीं, डिलीवरी का

लक्ष्मी भंडार और अन्नपूर्णा की तुलना राजनीतिक रूप से होती रहेगी, लेकिन लाभार्थी महिला के लिए शायद सबसे महत्वपूर्ण सवाल योजना का नाम नहीं है। उसके लिए सवाल है—पैसा कितना मिलेगा? कब मिलेगा? नियमित मिलेगा या नहीं? और परेशानी होने पर उसकी सुनवाई होगी या नहीं?

यही वह कसौटी है जिस पर अन्नपूर्णा योजना को भी परखा जाएगा। लक्ष्मी भंडार के मुकाबले अन्नपूर्णा की राह इसलिए कठिन दिखाई दे रही है क्योंकि नई सरकार के सामने सिर्फ नई योजना लागू करने की चुनौती नहीं है, बल्कि महिलाओं के बीच उस भरोसे को कायम करने की चुनौती भी है जो किसी भी कल्याणकारी योजना की सबसे बड़ी पूंजी होती है।

अब सवाल शुभेंदु सरकार से

अन्नपूर्णा योजना को लेकर उठ रहे सवालों का जवाब राजनीतिक बयानबाजी से ज्यादा पारदर्शी आंकड़ों से दिया जा सकता है। सरकार को बताना होगा कि कितनी महिलाएं पात्र हैं, कितनों को भुगतान मिला, कितने मामले लंबित हैं और कितनी शिकायतों का समाधान किया गया। क्योंकि आखिर में सवाल सिर्फ यह नहीं है कि अन्नपूर्णा योजना शुरू हो गई या नहीं।

सवाल यह है कि क्या अन्नपूर्णा उस महिला तक पहुंच रही है, जिसके लिए इसे बनाया गया है?अगर सरकार समय रहते शिकायतों का समाधान करती है, भुगतान की व्यवस्था दुरुस्त करती है और लाभार्थियों को स्पष्ट जानकारी देती है, तो शुरुआती विवाद पीछे छूट सकते हैं। लेकिन अगर विरोध बढ़ता गया, भुगतान अटकता रहा और महिलाओं की शिकायतों का समाधान नहीं हुआ, तो यह सिर्फ एक योजना की समस्या नहीं रहेगी।तब सवाल सरकार की जवाबदेही का होगा।

लक्ष्मी भंडार ने जहां महिला कल्याण की राजनीति में अपनी जगह बनाई, वहीं अन्नपूर्णा के सामने अब अपनी विश्वसनीयता साबित करने की चुनौती है। सवाल यही है—क्या सरकार समय रहते यह चुनौती समझेगी, या आधी आबादी की नाराजगी कहीं महंगी न पड़ जाए?

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डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।
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