दुनिया के सभी कामगारों, श्रमिकों को समर्पित एक मई को मनाए जाने वाला मजदूर दिवस इस बार भी मनाया जाएगा। लेकिन इस बार का मजदूर दिवस अन्य वर्षो की अपेक्षा अलग ढंग से तंग दिली में मनेगा।
देश में आगामी तीन मई तक चल रहे देशव्यापी लॅाकडाउन के कारण देश के सभी कल कारखाने, हाट-बाजार व अन्य व्यवसायिक संस्थान जहां मजदूर काम करते हैं सभी बंद पड़े हैं। लॅाकडाउन के चलते काम बंद होने के कारण देशभर के मजदूर अपने अपने घरों में बेरोजगार बैठे हुए हैं।
काफी संख्या में ऐसे मजदूर जो कमाने के लिए देश के दूसरे प्रांतों में गए हुए थे। मगर अचानक से लाकडाउन होने के चलते अपने घर नहीं लौट पाए वो सब अलग-अलग प्रदेशों में बनाए गए राहत शिविरों में फंसे हुए हैं।
घर लौटने का साधन नहीं मिलने के कारण बड़ी संख्या में मजदूर पैदल ही अपने घरों की तरफ निकल पड़े हैं। जिनका ना कोई खाने का ठिकाना है ना रहने का ठिकाना। ऐसी स्थिति में फंसे हुए लोगों के लिए इस बार का मजदूर दिवस मजबूर दिवस बन कर रह गया है।
ऐसी परिस्थिति में मजदूर दिवस मनाने की बात सोचना भी मुनासिब नहीं लगता है। भारत सहित दुनिया के सभी देशों में मजदूर दिवस मनाया जाता है। जिसका मुख्य उद्देश्य उस दिन मजदूरों की भलाई के लिए काम करने व मजदूरों में उनके अधिकारों के प्रति जागृति लाना होता है।
मगर आज तक तो कहीं ऐसा हो नहीं पाया है। हमारे देश का मजदूर वर्ग आज भी अत्यंत ही दयनीय स्थिति में रह रहा है। उनको न तो मालिकों द्वारा किए गए कार्य की पूरी मजदूरी दी जाती है और ना ही अन्य वांछित सुविधाएं उपलब्ध करवाई जाती है।
गांव में खेती के प्रति लोगों का रुझान कम हो रहा है। इस कारण बड़ी संख्या में लोग मजदूरी करने के लिए शहरों की तरफ पलायन कर जाते हैं। जहां ना उनके रहने की कोई सही व्यवस्था होती है ही उनको कोई ढ़ग का काम मिल पाता है।
मगर आर्थिक विपन्नता के चलते शहरों में रहने वाले मजदूर वर्ग जैसे तैसे कर वहां अपना गुजर-बसर करते हैं। बड़े शहरों में झोंपड़ पट्टी बस्तियों की संख्या तेजी से बढ़ती जा रही है। जिन में रहने वाला लोग किन विपरीत परिस्थितियों का सामना करता है।
इसको देखने की न तो सरकार को फुर्सत है ना हीं किसी राजनीतिक दलों के नेताओं को। झुग्गी झोपड़ी में रहने वाले मजदूरों को शौचालय जाने के लिए भी घंटों लाइनों में खड़ा रहना पड़ता है। झोपड़ पट्टी बस्तियों में ना रोशनी की सुविधा रहती है ना पीने को साफ पानी मिलता है और ना ही स्वच्छ वातावरण।
शहर के किसी गंदे नाले के आसपास बसने वाली झोपड़ पट्टियों में रहने वाले गरीब तबके के मजदूर कैसा नारकीय जीवन गुजारते हैं उसकी कोई कल्पना भी नहीं कर सकता है। मगर इसको अपनी नियति मान कर पूरी मेहनत से अपने मालिकों के यहां काम करने वाले मजदूरों के प्रति मालिकों के मन में जरा भी सहानुभूति के भाव नहीं रहते हैं।
उनसे 12-12 घंटे लगातार काम करवाया जाता है। घंटो धूप में खडे़ रहकर बड़ी बड़ी कोठियां बनाने वाले मजदूरों को एक छप्पर तक नसीब नही हो पाता है। देशव्यापी लॅाकडाउन के चलते आज सब से ज्यादा परेशान देश के करोड़ों मजदूर हो रहे हैं।
लाकडाउन के कारण उनका काम धंधा एकदम चौपट हो गया है। उनके परिवार के समक्ष गुजर-बसर करने की समस्या पैदा हो रही है। हालांकि सरकार ने देश के गरीब लोगों को कुछ राहत देने की घोषणा की है।
मगर सरकार द्वारा प्रदान की जा रही सहायता भी मजदूरों तक सही ढंग से नहीं पहुंच पा रही है। इस कारण बहुत से लोगों के समक्ष रोजी रोटी का संकट व्याप्त हो रहा है। उद्योगपतियों व ठेकेदारों के यहां अस्थाई रूप से काम करने वाले श्रमिको को ना तो उनका मालिक कुछ दे रहा है ना ही ठेकेदार। इस विकट परिस्थिति में श्रमिक अन्य कहीं काम भी नहीं कर सकते हैं। उनकी आय के सभी रास्ते बंद पड़े हैं।