पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के नतीजों में तृणमूल कांग्रेस की तूफानी जीत और भाजपा की सीटें सौ तो क्या अस्सी तक भी न पहुंच पाने के बावजूद चुनावी रणनीतिकार पीके ने अपने मौजूदा काम से संन्यास लेने की घोषणा कर दी है। पीके ने संकेत दिए हैं कि वह सीधे सक्रिय राजनीति में भी आ सकते हैं। यानी पीके अब प्रशांत किशोर बनने की राह पर हैं। क्योंकि राजनीति में पीके नहीं प्रशांत किशोर ज्यादा प्रभावशाली होगा। चुनावी प्रबंधन और रणनीति में तो पीके ने अपना सिक्का जमा लिया है, क्या सक्रिय राजनीति में प्रशांत किशोर का सिक्का जम सकेगा।
लेकिन पीके ने यह साफ नहीं किया है कि वह प्रशांत किशोर के रूप में राजनीति में क्या भूमिका निभाएंगे। बिहार या किसी अन्य राज्य की राजनीति में उतरेंगे या किसी दल में शामिल होकर राज्यसभा में जाएंगे या कुछ और तरीके की राजनीति करेंगे। लेकिन इतना तय है कि जो होगा रोचक ही होगा।
पिछले सात साल में पीके ने सक्रिय राजनीति में न रहते हुए अपनी अलग जगह बनाई है। बहुत कम लोगों को पता है कि अपनी अंतरराष्ट्रीय भूमिका छोड़ने के बाद पीके सबसे पहले राहुल गांधी के साथ जुड़े थे और उनके संसदीय क्षेत्र अमेठी में होने वाले सामाजिक और आर्थिक विकास कार्यक्रमों की निगरानी और संचालन उनके जिम्मे था। लेकिन पीके महज इतने सीमित काम के लिए भारत नहीं आए थे।
उनकी योग्यता और तेजी ने राहुल गांधी के दफ्तर के कुछ मठाधीशों को असहज कर दिया। दरबारी राजनीति से ऊबकर पीके ने टीम राहुल को नमस्ते कह दिया। इसके बाद वह गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी की टीम में चले गए। उन दिनों मोदी ने भाजपा से इतर अपनी अलग टीम बनानी शुरू कर दी थी, जिसमें हर क्षेत्र के प्रतिभाशाली मेहनती युवाओं को वह जोड़ रहे थे। पीके क्योंकि संयुक्त राष्ट्र के खाद्य कार्यक्रम से जुड़े रहे थे, इसलिए उन्होंने मोदी के साथ गुजरात में कुपोषण दूर करने की योजना पर चर्चा की। मोदी उनसे प्रभावित हुए और उन्होंने पीके को अपनी योजना पर अमल करने की मंजूरी दे दी। पीके ने गुजरात में कुपोषण दूर करने के उपायों पर काम किया। जब भाजपा की तरफ से नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बनाया गया तो पीके ने मोदी की चुनावी रणनीति और प्रचार अभियान की कमान संभाल ली।
दिलचस्प है कि पीके को भाजपा ने नहीं मोदी ने अपने साथ जोड़ा था। 2014 के चुनाव नतीजों ने नरेंद्र मोदी भाजपा के साथ साथ पीके की सफलता का परचम भी फहराया। पीके इसके बाद तब नीतीश कुमार के साथ जुड़े जब नरेंद्र मोदी की 2014 की लोकप्रियता चरम पर थी और लोकसभा चुनावों के बाद भाजपा ने झारखंड, हरियाणा और जम्मू कश्मीर जैसे राज्यों में जबरदस्त चुनावी कामयाबी हासिल की थी। जबकि नीतीश कुमार राजग से अलग होकर चुनाव लड़े और बुरी तरह उनकी हार हुई। जिसके फलस्वरूप उन्हें मुख्यमंत्री पद छोड़कर जीतनराम मांझी को मुख्यमंत्री बनाना पड़ा और लालू यादव से हाथ मिलाना पड़ा था। जबकि लोकसभा चुनावों की अपार सफलता से उत्साहित भाजपा बिहार में अपनी सरकार बनाने के लिए पूरा जोर लगा रही थी। पीके ने कठिन चुनौती स्वीकारी और नीतीश कुमार के चुनावी रणनीतिकार बने।
उनकी चुनावी रणनीति ने भाजपा को उस दौर में मात दी जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और तत्कालीन भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने बिहार में पूरी ताकत झोंक दी थी।
मुझे अच्छी तरह याद है बिहार चुनावों के दौरान नतीजों से पहले दिल्ली में मैने पीके से पूछा था कि आपने नीतीश कुमार का चुनाव अभियान संभालकर इतनी बड़ी चुनौती क्यों स्वीकार की। पीके का जवाब था कि दरअसल मैं यह परखना चाहता हूं कि 2014 में जो मोदी की आंधी चली थी वो मैंने बनाई थी या मैं आंधी के साथ था। पीके का यह आत्मविश्वास मुझे भा गया था और मैंने अपने पत्रकारीय अनुभव से समझ लिया था कि नतीजा कुछ भी हो, लेकिन इस युवा रणनीतिकार में धारा के विपरीत जाकर उसे मोड़ने का साहस है। 2015 के बिहार चुनावों में जब भाजपा और दिल्ली में तमाम मीडिया के लोग यह कहते थे कि नीतीश और लालू भले हाथ मिला लें, लेकिन दोनों के समर्थक कभी एक साथ नहीं आ सकते। जब नतीजे आए तो वो सभी आलोचक भौंचक्के थे।
बिहार चुनाव के बाद पीके की सेवाएं कांग्रेस ने उत्तर प्रदेश के लिए लीं। इसके पहले 2016 में असम में विधानसभा में चुनाव हुए और पीके ने कांग्रेस के नेतृत्व में जनता दल(यू), बदरुद्दीन अजमल की एआईयूडीएफ, अगप, बोडो पीपुल्स फ्रंट और अन्य क्षेत्रीय दलों के गठबंधन का सुझाव कांग्रेस को दिया। लेकिन तत्कालीन मुख्यमंत्री तरुण गोगोई पर अतिशय भरोसा करके कांग्रेस नेतृत्व ने इसे नकारकर अकेले लड़ने का फैसला किया। तब पीके ने मुझसे कहा था कि देखिएगा असम में भाजपा की सरकार बनेगी। मुझे लगा शायद उनके सुझाव को नकार दिया गया इसलिए वह ऐसा कह रहे हैं जब मैं चुनाव की रिपोर्टिंग के लिए असम गया था। हालांकि उस दौरान मुझे तब अनुमान लग गया कि पीके सही कह रहे हैं और वही हुआ भी। इसके बाद पीके ने कांग्रेस के लिए उत्तर प्रदेश में काम संभाला। उत्तर प्रदेश को लेकर वह अक्सर चर्चा करते थे और उनकी मूल कार्ययोजना पर अगर कांग्रेस ने अमल किया होता तो शायद 2017 में उसकी वापसी हो गई होती।
पीके की मूल योजना थी कि अप्रैल 2016 में प्रियंका गांधी को उत्तर प्रदेश में सक्रिय कर दिया जाए और दो-तीन महीने तक वह पूरा प्रदेश घूम लें। इसके बाद सितंबर-अक्तूबर में उन्हें कांग्रेस की तरफ से मुख्यमंत्री पद का चेहरा घोषित कर दिया जाए और कांग्रेस आक्रामक तरीके से चुनाव लड़े। गणित सीधा था कि 1990 के बाद से उत्तर प्रदेश के लोग सपा-बसपा और भाजपा की कई सरकारें और मुख्यमंत्री देख चुके हैं। केंद्र में सरकार बनने के बावजूद भाजपा के प्रति कोई आकर्षण नहीं है, मायावती का करिश्मा उतार पर है और अखिलेश सरकार के खिलाफ सत्ता विरोधी रुझान है। ऐसे में अगर प्रियंका को आगे करके कांग्रेस मैदान में उतरेगी तो सबसे पहले उसके कार्यकर्ताओं का मनोबल बढ़ेगा। दूसरे प्रियंका के करिश्मे ( जो तब तक था) से युवा और सवर्ण मतदाता भी कांग्रेस की तरफ आ सकते हैं। विशेषकर ब्राह्मण जिनकी प्रदेश में खासी तादाद है वो विकल्प की तलाश में हैं।
ऐसे में मुस्लिम भी कांग्रेस के साथ वैसे ही जुड़ेंगे जैसे 2009 के लोकसभा चुनाव में जुड़े थे। इसके साथ ही गैर जाटव दलितों का भी एक बड़ा हिस्सा कांग्रेस के साथ आ सकता है। इसी हिसाब से यदि शहरी मतदाता भी जुड़े तो कांग्रेस का वोट प्रतिशत तीस से 35 फीसदी से ज्यादा तक पहुंच सकता है। पीके ने यह विस्तृत योजना कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी और तत्कालीन महासचिव राहुल गांधी को दी। योजना पर मंथन हुआ और इस बीच अखबारों में इस आशय की खबरें भी आईं कि प्रियंका उत्तर प्रदेश में कांग्रेस का चेहरा हो सकती हैं। लेकिन वही हुआ न परिवार राजी हुआ न पार्टी और आखिरकार शीला दीक्षित को मुख्यमंत्री का चेहरा बनाकर उतारना पड़ा।
उत्तर प्रदेश में पीके ने 27 साल यूपी बेहाल के नारे के साथ अपना चुनाव अभियान शुरू किया। लखनऊ में राहुल गांधी की सफल जनसभा, वाराणसी में सोनिया गांधी के जबरदस्त रोड शो ने उत्तर प्रदेश में हलचल मचा दी। गांव-गांव कांग्रेसी कार्यकर्ता खड़े हो गए। फिर शुरू हुआ राहुल गांधी की किसान यात्रा और खाट सभाओं का दौर जिनकी सफलता ने माहौल को और गरमा दिया। हालांकि मीडिया के लिए खाट सभाओं की सफलता से ज्यादा बड़ा मुद्दा उन सभाओं में खाट की लूट थी। कांग्रेस का तीन मांगों वाला किसानों की कर्ज माफी, बिजली के बिल आधे करना और कानून का राज शपथ पत्र जिस पर करीब दो करोड़ लोगों के हस्ताक्षर कराए गए थे, भी खासी चर्चा का विषय बन गया। पीके की इस रणनीति ने वर्षों से निर्जीव पड़ी कांग्रेस में जान डाल दी। अनौपचारिक रूप से लखनऊ, कानपुर, दिल्ली में ब्राह्मणों में प्रतिष्ठित हस्तियों की बैठकें और सम्मेलन हुए।
यह सब परवान चढ़ रहा था कि अचानक भारतीय सेना ने उरी की सर्जिकल स्ट्राइक कर दी। भाजपा ने इसे राष्ट्रवाद का मुद्दा बनाकर माहौल बदल दिया। राहुल गांधी ने खून की दलाली वाला अपरिपक्व बयान देकर कांग्रेस को बचाव की मुद्रा में ला दिया। उधर, समाजवादी पार्टी में मुलायम परिवार में घमासान चरम पर था। मीडिया में अखिलेश यादव की खासी चमकदार छवि थी और वही चर्चा में थे। कांग्रेसी नेताओं के हाथ-पांव फूल गए। आनन-फानन में शीला दीक्षित को वापस बुलाकर पीके पर दबाव बनाया गया कि कांग्रेस सपा का गठबंधन होना चाहिए। पीके इसके लिए तैयार नहीं थे, लेकिन कांग्रेस नेतृत्व के दबाव के झुकना पड़ा और उसके बाद की कहानी सबको मालूम है कि क्या चुनावी दुर्दशा हुई। हांलाकि सामाजिक समीकरण और जातीय गणित के आधार पर पीके सपा-कांग्रेस गठबंधन की दो सौ या उससे कुछ कम सीटें जीतने को लेकर मुतमईन थे, लेकिन नतीजों ने उन्हें और दूसरों को भी गलत साबित किया।
इसके बाद सोशल मीडिया और मुख्य धारा मीडिया में पीके पर काफी मजाक किया गया और उनके विरोधियों व आलोचकों ने घोषणा कर दी कि पीके की रणनीति का करिश्मा अब खत्म हो गया। जबकि 2017 में उत्तर प्रदेश के समानांतर पीके की रणनीति ने पंजाब में कांग्रेस को अच्छे बहुमत से जितवाया था, लेकिन वहां की सफलता पूरी तरह कैप्टन अमरिंदर सिंह के खाते में चली गई। क्योंकि उत्तराखंड में भी कांग्रेस बुरी तरह हारी थी, इसलिए पंजाब में पीके की कामयाबी उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड की विफलता के शोर में दब गई। पीके को झटका तो लगा लेकिन मनोबल नहीं टूटा। इस दौरान मेरी पीके से कई बार बात हुई। पीके के साथ कांग्रेस में जो हुआ था वह कोई बहुत अच्छा अनुभव नहीं था, लेकिन फिर भी उन्होंने कभी उसे लेकर कोई शिकायत नहीं की। वह चुपचाप अपने काम में लगे रहे।
इसी दौरान पीके सीधे राजनीति में उतरे और 16 सितंबर 2018 को जनता दल (यू) में शामिल हो गए। नीतीश कुमार ने उन्हें हाथोंहाथ लिया और पार्टी का उपाध्यक्ष बनाने के साथ उन्हें अपना उत्तराधिकारी घोषित करने के संकेत भी दे दिए। लोकसभा चुनावों में एनडीए में भाजपा के साथ सीटों के बंटवारे में जनता दल (यू) को बड़ी हिस्सेदारी दिलाने में पीके की अहम भूमिका थी। इसके साथ ही पीके आंध्र प्रदेश में जगन मोहन रेड्डी का चुनाव प्रचार अभियान भी संभाले रहे थे और उन्हें शानदार जीत दिलाकर फिर चमके।
पीके को सीमाओं में बांधा जा सकता है लेकिन प्रशांत किशोर को किसी सीमित दायरे में बांधना मुमकिन नहीं था। जनता दल (यू) के कुछ नेता जो नीतीश कुमार की कोटरी में थे, प्रशांत किशोर के बढ़ते प्रभाव से असहज हो गए। उन्होंने नीतीश के कान भरने शुरू कर दिए। इधर, प्रशांत भी जद (यू) की तमाम नीतियों और कामकाज से असहज थे। सबसे पहले उनका नागरिकता कानून (सीएए) के मुद्दे पर नीतीश कुमार से टकराव हुआ। प्रशांत किशोर ने जद (यू) द्वारा सीएए के समर्थन की आलोचना की जिससे नाराज नीतीश कुमार ने उन्हें जनता दल (यू) से निकाल दिया। इसके बाद प्रशांत किशोर ने बिहार में बेरोजगारी को लेकर आवाज उठानी शुरू की।
सोशल मीडिया के जरिए अपने पेज पर बिहार के पांच लाख से ज्यादा नौजवानों को जोड़ा। उनकी तैयारी अक्तूबर 2020 में बिहार विधानसभा चुनावों में जद (यू) और राजद की जगह बिहार की जनता को एक नया और साफ-सुथरा विकल्प देने की थी। पटना में प्रेस कॉन्फ्रेंस करके उन्होंने नौजवानों से नया बिहार बनाने का आह्वान भी किया। मार्च-अप्रैल 2020 में कोरोना संक्रमण और लॉकडाउन के दौरान बिहार के प्रवासी मजदूरों की दुर्दशा को लेकर प्रशांत किशोर ने नीतीश कुमार और उनकी सरकार को कठघरे में खड़ा कर दिया। सोशल मीडिया पर जमकर वॉर हुआ और पीके फिर नीतीश कुमार के बीच न पटने वाली दूरी बन गई।
नीतीश कुमार से अलग होते ही प्रशांत किशोर फिर अपने मूल काम में वापस आकर पीके बन गए थे और पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी और दिल्ली विधानसभा चुनावों में उन्होंने अरविंद केजरीवाल के लिए काम करना शुरू कर दिया। फरवरी 2020 में दिल्ली में सीएए विरोधी आंदोलन को मुद्दा बनाकर भाजपा ने जमकर ध्रुवीकरण का कार्ड खेला, लेकिन कोई लाभ नहीं हुआ। भाजपा को महज आठ सीटें मिलीं। दिल्ली चुनावों के दौरान पीके ने मुझसे कहा था कि मुकाबला आसान नहीं है लेकिन भाजपा दस सीटों तक नहीं पहुंच पाएगी। जबकि जिस तरह भाजपा ने मुकाबले को टक्कर का बनाया था उससे लगता था कि वो भी कम से कम 25 से 30 सीटें जीतेगी। लेकिन पीके सही साबित हुए बाकी विश्लेषक गलत। पीके का सिक्का फिर जम गया। हालांकि उनके आलोचकों ने फिर कहा कि ये तो अरविंद के करिश्मे की जीत है।
दिल्ली के बाद पश्चिम बंगाल की बारी आई। यहां भाजपा 2016 से ही ममता बनर्जी के खिलाफ पूरा जोर लगाए हुए थी। सिर्फ भाजपा ही नहीं बल्कि पूरा संघ परिवार और उसका सांगठनिक तंत्र एक दशक से यहां सक्रिय था। 2014 के लोकसभा चुनावों के बाद भाजपा ने 2016 का विधानसभा चुनाव भी लगभग इतनी ही आक्रामकता और संसाधनों से लड़ा था लेकिन तब भाजपा महज 10 फीसदी वोट और तीन सीटें ही पा सकी थी। लेकिन भाजपा ने हौसला नहीं छोड़ा और उसने बंगाल में ममता बनर्जी और उनकी सरकार के खिलाफ अपनी आक्रामकता सड़क से लेकर संसद तक बनाए रखी और ध्रुवीकरण का कार्ड लगातार खेला। नतीजा 2019 के लोकसभा चुनावों में अप्रत्याशित रूप से 18 सीटें जीतकर न सिर्फ सबको चौंकाया, बल्कि अपने कार्यकर्ताओं और समर्थक वर्ग का मनोबल भी ऊंचा कर दिया।
ये नतीजे ममता बनर्जी के लिए सबक थे और इसके बाद ही बंगाल में टीएमसी के चुनाव और राजनीतिक प्रबंधन की कमान पीके को मिली। पीके ने बंगाल के साथ-साथ तमिलनाडु में डीएमके का भी जिम्मा संभाला और दोनों जगह कामयाब रहे। पीके ने कैसे ये सब किया इसके विस्तार की यहां जरूरत नहीं है क्योंकि सब कुछ सामने है। लेकिन दोनों राज्यों के नतीजों विशेषकर बंगाल ने पीके का सिक्का फिर जमा दिया और साबित कर दिया कि पीके से सहमत या असहमत हो सकते हैं, पसंद या नापसंद कर सकते हैं लेकिन पीके खारिज नहीं कर सकते। इसीलिए पीके ने अपने आलोचकों का मुंह बंद करते हुए अपने राजनीतिक प्रबंधन के काम से तब संन्यास लिया जब वह सफलता के शीर्ष पर हैं। इसलिए उनके इस फैसले को बेहद सोचा-समझा और समझदारी वाला फैसला माना जाना चाहिए।
पीके की संन्यास की घोषणा के बावजूद कुछ राज्यों जहां अगले साल चुनाव होने हैं, के क्षत्रप उन्हें अपने साथ जोड़ना चाहते हैं। लेकिन पीके अब व्यावसायिक तौर पर ये काम करने के इच्छुक नहीं हैं। दूसरी बात ये भी है कि हर दल और नेता उनकी कार्यशैली से तालमेल नहीं बिठा पाता है। नरेंद्र मोदी, नीतीश कुमार, अमरिंदर सिंह, जगन रेड्डी, अरविंद केजरीवाल, ममता बनर्जी और एमके स्टालिन ने उन्हें काम करने और फैसले लेने की पूरी आजादी दी। साथ ही उनकी कार्यशैली से तालमेल भी बिठाया। यहां तक कि पीके के सुझावों पर दल के भीतर भी कई बदलाव किए। जबकि उत्तर प्रदेश में कांग्रेस नेतृत्व ने उन्हें अपने हिसाब से चलाना चाहा और जिस योजना के साथ पीके को राहुल गांधी अपनी टीम में लेकर आए थे, कांग्रेस के कथित दिग्गजों ने समय से पहले ही उसकी भ्रूण हत्या कर दी।
आगे क्या करेंगे प्रशांत किशोर
अब सवाल है कि प्रशांत किशोर आगे क्या करेंगे। इसका जवाब तो सिर्फ वही दे सकते हैं। लेकिन उनके सामने क्या विकल्प हैं हम इसकी चर्चा कर सकते हैं। पहला विकल्प है कि प्रशांत अपने मूल राज्य बिहार में जाकर अपनी पुरानी योजना जद (यू)-भाजपा गठबंधन और राजद-कांग्रेस गठबंधन के अलावा एक तीसरा विकल्प तैयार करें। लेकिन यह आसान नहीं है। मुझे लगता है कि प्रशांत किशोर अब खुद को महज बिहार की राजनीति तक सीमित करेंगे या राष्ट्रीय राजनीति में कोई भूमिका निभाएंगे। अब अगर वह राष्ट्रीय राजनीति में आते हैं तो क्या करेंगे। एक संभावना है कि वह भाजपा और मोदी सरकार के खिलाफ विपक्षी दलों की एकता के लिए काम करें। क्योंकि इस समय करीब-करीब गैर भाजपा दलों के सभी शीर्ष नेताओं से उनका सीधा संवाद और संपर्क है।
कांग्रेस में राहुल गांधी, प्रियंका गांधी, कैप्टन अमरिंदर सिंह, सपा में अखिलेश यादव, राजद में लालू यादव, तेजस्वी यादव, तृणमूल में ममता बनर्जी, शिवसेना मे उद्धव ठाकरे, द्रमुक में एमके स्टालिन, आप में अरविंद केजरीवाल, झामुमो में हेमंत सोरेन आदि से पीके सीधे बात कर सकते हैं, चर्चा कर सकते हैं। लेकिन इन नेताओं के आपसी अहम और टकराव को क्या पीके पाट सकेंगे। तीसरा विकल्प यह है कि भले ही पीके ने राजनीतिक प्रबंधन का व्यावसायिक काम छोड़ दिया हो, लेकिन वह किसी एक नेता को 2024 में मोदी के मुकाबले के लिए तैयार करें और उसके साथ राजनीतिक रूप से जुड़ें। आज की तारीख में ममता बनर्जी से ज्यादा बेहतर कोई दूसरा नाम नहीं है। अब पीके से प्रशांत किशोर का रूपातंरण किस तरह होगा, यह तो आने वाला समय ही बताएगा।