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कुरुक्षेत्रः विवादों से न डर कर डटे रहने वाले जन संघर्षों के अप्रतिम योद्धा थे स्वामी अग्निवेश

सार

1977 में जब स्वामी अग्निवेश और स्वामी इंद्रवेश हरियाणा के राजनीतिक आकाश पर उभरे थे तो मैने विधानसभा चुनावों में उनकी जीत की खबर रेडियो पर सुनी और अखबारों में पढ़ी थी। तभी मेरे मन में उनसे मिलने की उत्कट इच्छा प्रकट हुई और आखिर 1980 के आसपास मेरी उनकी भेंट एक सम्मेलन में हुई...
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Swami agnivesh - फोटो : Amar Ujala (File)
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विस्तार
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स्वामी अग्निवेश नहीं रहे। यह खबर सुनकर सहसा विश्वास नहीं होता। उनका हंसमुख चेहरा और हमेशा आशा और ऊर्जा से भरा व्यक्तित्व मिलने वाले को भी उत्साह से भर देता था। अस्सी वर्ष की उम्र पार करने के बावजूद अगर पिछले करीब एक साल से उनकी बीमारी की अवस्था को अपवाद माने तों कभी भी उम्र का तकाजा उनके चेहरे पर दिखाई नहीं दिया। मेरी उनकी मुलाकात करीब चालीस साल पुरानी है और उनके व्यक्तित्व में मैंने हमेशा वही ताजगी और सरलता पाई जो पहली मुलाकात में पाई थी। अगर एक वाक्य में कहा जाए तो स्वामी अग्निवेश जन संघर्षों के एसे अप्रतिम योद्धा थे जो कभी विवादों से डरे नहीं औऱ अपने विचारों पर डटे रहे।

स्वामी विवेकानंद जैसी झलक

1977 में जब स्वामी अग्निवेश और स्वामी इंद्रवेश हरियाणा के राजनीतिक आकाश पर उभरे थे तो मैंने विधानसभा चुनावों में उनकी जीत की खबर रेडियो पर सुनी और अखबारों में पढ़ी थी। तभी मेरे मन में उनसे मिलने की उत्कट इच्छा प्रकट हुई और आखिर 1980 के आसपास मेरी उनकी भेंट एक सम्मेलन में हुई। युवा आर्यसमाजी सन्यासी के वेश में स्वामी अग्निवेश तब स्वामी विवेकानंद जैसी झलक दे रहे थे। मैं उनके ओजस्वी भाषण और क्रांतिकारी अध्यात्म से बेहद प्रभावित हुआ। आगे चलकर जब मैं जेएनयू में एमफिल करने आया तो स्वामी अग्निवेश से निकटता बढ़ गई और सात जंतर-मंतर में स्थित उनके बंधुआ मुक्ति मोर्चे के कार्यालय और आवास पर मेरा अकसर आना जाना होने लगा।

देशभर के जन आंदोलनों के नेताओं का शिविर था उनका आवास

यहीं मेरा परिचय उनके प्रिय सहयोगी कैलाश सत्यार्थी से हुआ, जो तब स्वामी जी के साथ कंधे से कंधा मिलाकर बंधुआ मुक्ति और बाल बंधुआ मुक्ति के लिए काम कर रहे थे। जेएनयू से निकलकर मैं पत्रकारिता में आया तो स्वामी अग्निवेश और कैलाश सत्यार्थी से मेरी निकटता बहुत हो गई और उन दिनों मानवाधिकार और मजदूरों के अधिकारों की लड़ाई से जुड़ी तमाम खबरें मैंने इन दोनों के सहयोग से की। अस्सी के दशक में जब देश में जन आंदोलनों की बाढ़ थी, तब स्वामी अग्निवेश का जंतर-मंतर स्थित कार्यालय देशभर के जन आंदोलनों के नेताओं का एक तरह दिल्ली का शिविर कार्यालय बन गया था। मजदूर नेता शंकर गुहा नियोगी तो अकसर वहीं आकर रुकते थे और शायद ही कोई तत्कालीन ऐसा जनआंदोलन का नेता होगा जो स्वामी अग्निवेश से मिलने उनके कार्यालय न आता हो।

बड़े-बड़े जन आंदोलनों के नेताओं से मुलाकात

यहीं मेरी मुलाकात नियोगी, शेतकारी किसान नेता शरद जोशी, विजय जावंधिया, अनिल गोटे,नर्मदा आंदोलन की नेता मेधा पाटकर, केरल के मछुआरों के नेता टॉम कोचरी, कर्नाटक के किसान नेता नंजदुम्मा स्वामी, राजस्थान की मानवाधिकारवादी श्रीलता, झारखंड मुक्ति मोर्चे के नेता शिबू सोरेन, धनबाद कोयला खदान मजदूरों के नेता ए.के. राय, आजादी बचाओ आंदोलन के नेता डा. बनवारी लाल शर्मा, आदिवासियों के अधिकारों की लड़ाई लड़ने वाले डा. बीडी शर्मा, चिपको आंदोलन के नेता सुंदरलाल बहुगुणा, उत्तराखंड संघर्ष वाहिनी के नेता शमशेर सिंह बिष्ट जैसे उस दौर के तमाम नेताओं से मेरा परिचय और मुलाकात स्वामी अग्निवेश के यहां ही हुआ। मानवाधिकारों, मजदूरों किसानों, आदिवासियों, दलितों, महिलाओं और वंचित वर्गों के अधिकारों के प्रति अपनी वैचारिक निष्ठा के कारण मेरा इन सभी से उस दौर में गहरा परिचय हो गया था। लेकिन ये सब आने जाने वाले लोग थे, जबकि स्वामी अग्निवेश दिल्ली में रहते थे, इसलिए उनके साथ हर दूसरे-तीसरे दिन मिलना होता था।

स्वामी अग्निवेश की एतिहासिक पदयात्राएं

मानवाधिकारों के साथ साथ स्वामी अग्निवेश की धर्मनिरपेक्षता, महिला अधिकारों और सामाजिक धार्मिक पाखंड के विरोध के प्रति जो प्रतिबद्धता थी, वह हमें भी उत्साहित करती थी। इसी दौर में मेरठ के साथी प्रभात पंत, निशांत नाट्यमंच के संस्थापक शमसुल इस्लाम, जाने माने जनवादी पत्रकार आनंद स्वरूप वर्मा, पत्रकार हरि त्यागी, राजीव भारद्वाज जैसे कई लोग स्वामी अग्निवेश के साथ जुड़े और इसी दौर में स्वामी अग्निवेश ने सती प्रथा के खिलाफ राजस्थान के दिवराला की एतिहासिक पदयात्रा, नाथद्वारा के श्रीनाथ मंदिर में दलितों के प्रवेश को लेकर पदयात्रा, सती प्रथा पर पुरी के शंकराचार्य जगदगुरु स्वामी निरंजन देव तीर्थ को शास्त्रार्थ की चुनौती देने वाली दिल्ली से बागपत के निकट पुरकाजी तक की पदयात्रा और मेरठ में हुए भीषण दंगों से पैदा हुए सांप्रदायिक तनाव के खिलाफ दिल्ली से मेरठ तक की एतिहासिक पदयात्रा भी हुई, जिसमें मशहूर फिल्म अभिनेत्री शबाना आजमी सहित मजूदर नेता शंकर गुहा नियोगी, पंजाब के किसान नेता जीवन सिंह उमरानांगल समेत अनेक बुद्धिजीवी रंगकर्मी और सामाजिक कार्यकर्ता शामिल हुए।

आर्यसमाज के सिद्धांतों के प्रति उनकी पूरी निष्ठा

इसी दौर में पश्चिमी उत्तर प्रदेश में भारतीय किसान यूनियन ने चौधरी महेंद्र सिंह टिकैत के नेतृत्व में किसान आंदोलन शुरू हुआ और स्वामी अग्निवेश उसमें सक्रिय हो गए। इसके बाद उन्होंने देशभर के किसान संगठनों और नेताओं को एक मंच पर लाने की कवायद शुरू की और दिल्ली के बोट क्लब पर टिकैत, शरद जोशी, भूपेंद्र सिंह मान, प्रेम सिंह दहिया, अजमेर सिंह लाखोंवाल, घासीराम नैन, विपिन भाई मेहता, विजय जावंधिया, नंजदुम्मा स्वामी जैसे जनाधार वाले किसान नेता अपने हजारों समर्थकों के साथ बोट क्लब पहुंचे थे। स्वामी अग्निवेश एक तरफ तो बंधुआ मजदूरों की मुक्ति की वैधानिक और सामाजिक लड़ाई लड़ते रहे तो दूसरी तरफ देश में कहीं भी किसी पर भी होने वाले दमन, उत्पीड़न और शोषण के खिलाफ संघर्ष में शामिल होने पहुंच जाते थे। आर्यसमाज के सिद्धांतों के प्रति उनकी पूरी निष्ठा थी। लेकिन वह आर्यसमाज को हिंदू धर्म की तरह कर्मकांडी बनाने के खिलाफ थे। उनका मानना था कि स्वामी दयानंद सरस्वती ने आर्यसमाज को एक क्रांतिकारी आंदोलन के रूप में प्रतिपादित किया था जो सामाजिक बदलाव का वाहक बने।

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स्वामी अग्निवेश इसमें आर्थिक और राजनीतिक बदलाव का दर्शन भी जोड़ते थे और उनकी यह सोच उन्हें जनवादियों, समाजवादियों और वामपंथियों की तरफ ले जाती थी। इस वजह संस्थागत आर्यसमाजी और सनातन धर्मी उनका विरोध करते थे और उन्हें धर्म विरोधी तक कहते थे। स्वामी अग्निवेश की धर्मनिरपेक्षता सर्वधर्म समभाव वाली थी और वह मुस्लिम धर्मगुरुओं, ईसाई पादरियों, जैन मुनियों और सनातन धर्म के साधुओं के साथ मिलकर एक एसा मंच बनाना चाहते थे, जो धर्म के नाम पर होने वाली सांप्रदायिक राजनीति का मुकाबला कर सके। इस मुद्दे पर मेरी उनकी बहुत चर्चा होती थी।

आंध्र प्रदेश की सीमा के निकट तेलुगू भाषी परिवार में जन्म

स्वामी अग्निवेश के सन्यासी पूर्व जीवन में मेरी कोई विशेष रुचि नहीं थी, फिर भी उन्होंने मुझे बताया था कि वह छत्तीसगढ़ में आंध्र प्रदेश की सीमा के निकट तेलुगू भाषी परिवार में जन्मे थे और कोलकाता के सेंट जैवियर्स कालेज में उन्होंने शिक्षा पाई भी थी और कुछ दिन पढ़ाया भी था। इसके बाद वह कब आर्यसमाजी सन्यासी हुए और कब हरियाणा आए इस पर मैंने कभी उनसे विस्तृत बातचीत नहीं की। उनके साथ मेरा रिश्ता सिर्फ पत्रकार और सामाजिक कार्यकर्ता का ही नहीं बल्कि बेहद व्यक्तिगत हो गया था। मैं कई बार उनसे उनकी आलोचना उनके सामने कर देता था, जिसे वह हंसकर स्वीकार करते थे। स्वामी अग्निवेश और नोबेल पुरस्कार से सम्मानित कैलाश सत्यार्थी के बीच जब मतभेद और विवाद बढ़ा तब अपने स्तर से मैंने दोनों के साथ समानांतर रिश्त रखे औऱ हमेशा कोशिश की उनके बीच की खाई पट जाए।

कैलाश सत्यार्थी को मिला शांति का नोबेल पुरस्कार

स्वामी अग्निवेश को मुझसे शिकायत थी कि मैं उनके साथ पूर्णकालिक रूप से जुड़कर सामाजिक परिवर्तन के काम में क्यों नहीं शामिल होता हूं और मैं उन्हें अपनी पारिवारिक और आर्थिक मजबूरी का हवाला देता था, जिसे वह खारिज करते थे। मुझे उनसे शिकायत थी कि वह किसी एक मुद्दे पर टिकने की बजाय हर मुद्दे और आंदोलन में खुद को जोड़कर अपनी ऊर्जा और समय दोनों नष्ट करते हैं। मैं मजाक में उनसे कहता था कि आप अतिथि कलाकार वाली भूमिका कब छोड़ेंगे। वह कभी बंधुआ मुक्ति के साथ खुद को जोड़ते थे, तो कभी शराबबंदी आंदोलन शुरू कर देते थे। कभी गौ रक्षा तो कभी किसान आंदोलन तो कभी मजदूर संघर्ष, तो कभी आदिवासियों की लड़ाई, कभी विस्थापितों की समस्या और कभी सांप्रदायिकता विरोधी मुहिम तो कभी सती प्रथा के खिलाफ आंदोलन, हर जगह अपनी उपस्थिति दर्ज कराते रहते थे। इस वजह से वह कभी एक मुद्दे पर टिक नहीं सके। जबकि उनके सहयोगी कैलाश सत्यार्थी ने उनसे अलग होने के बाद बाल बंधुआ मजदूरों की मुक्ति को अपना एकमात्र मुद्दा बनाकर उसे अंतर्राष्ट्रीय स्तर तक ले गए और शांति के नोबेल पुरस्कार से सम्मानित हुए।

दो बार लड़े लोकसभा चुनाव

स्वामी अग्निवेश का निजी जीवन पूरी तरह सादगी और संयम का जीवन था। बेहद सादा भोजन, सादा जीवन और सरल स्वभाव उनकी विशेषता था। लेकिन उनकी एक बड़ी कमजोरी प्रचार माध्यमों में बने रहना और किसी भी तरह संसद में पहुंचने की तीव्र इच्छा थी। इसके लिए वह दो बार लोकसभा चुनाव भी लड़े। एक बार शंकर गुहा नियोगी के समर्थन से वह छत्तीसगढ़ की कांकेर लोकसभा सीट से निर्दलीय लड़े जबकि दूसरी बार वह 1991 में भोपाल से चुनाव लड़े और दोनों बार हारे। 2014 में वह वाराणसी से नरेंद्र मोदी के खिलाफ चुनाव में उतरने का मन भी बना रहे थे, बशर्ते उन्हें कांग्रेस अपना टिकट दे देती। लेकिन बाद में तमाम मित्रों के समझाने पर वह मान गए। यूपीए शासन काल में वह कांग्रेस के काफी करीब भी हो गए थे और हमें उम्मीद थी कि उन्हें सामाजिक कार्यकर्ता के रूप में राज्यसभा में मनोनीत किया जाएगा। लेकिन कांग्रेस और यूपीए की प्राथमिकताओं में स्वामी अग्निवेश जैसे सामाजिक संघर्षों वाले लोग नहीं थे।

माओवादियों के साथ बातचीत की पेशकश

स्वभाव से वह किसी के भी व्यक्तिगत विरोधी नहीं थे। संघ परिवार और भाजपा वैचारिक विरोध के बावजूद अटल बिहारी वाजपेयी और मुरली मनोहर जोशी जैसे नेताओं से उनके अच्छे रिश्ते थे। 2014 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र लिखकर उन्होंने गोवध पर रोक लगाने की बेहद सकारात्मक उम्मीद लगाई थी, जिसे लेकर उनके तमाम वामपंथी और धर्मनिरपेक्ष मित्रों ने उन्हे खासा बुरा भला कहा था।
स्वामी अग्निवेश छत्तीसगढ़ और आंध्र प्रदेश के भूमिगत माओवादियों को भी राजनीति की मुख्यधारा में लाना चाहते थे। वह एक तरफ तो पुलिस और सुरक्षा बलों द्वारा नक्सलियों के नाम पर निर्दोष आदिवासियों की हत्याओं के खिलाफ पुरजोर आवाज उठाते थे, जिसकी वजह से माओवादियों के बीच उनकी साख बन गई थी। यूपीए सरकार में तत्कालीन गृह मंत्री पी. चिदंबरम से उन्होंने माओवादियों के साथ बातचीत की पेशकश की और हरी झंडी मिलने के बाद उन्होंने भूमिगत माओवादी नेताओं के साथ संवाद शुरू किया। लेकिन इसी बीच माओवादियों के नेता राजकुमार आजाद की पुलिस मुठभेड़ में हुई हत्या ने सारी रणनीति बिगाड़ दी।

सरकार से मिला धोखा

स्वामी अग्निवेश ने इसे अपने साथ धोखा माना जबकि माओवादियों ने स्वामी को भी सरकारी आदमी मानकर उनसे संवाद खत्म कर दिया। स्वामी को इसका बेहद मलाल था कि उन्हें सरकार ने इस्तेमाल किया। स्वामी अग्निवेश हमेशा कट्टरपंथियों के निशाने पर रहे और 2018 में झारखंड में एक कार्यक्रम में शामिल होते वक्त उन पर कुछ कट्टरपंथियों ने जानलेवा हमला किया। इस हमले में उन्हे खासी अंदरूनी चोट आई और उनका लिवर क्षतिग्रस्त हो गया। इसके बाद से स्वामी अग्निवेश की सेहत लगातार खराब होती चली गई। अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान में उनका कई दिनों तक इलाज  चला। डाक्टरों ने उन्हें पूरी तरह आराम करने की सलाह दी, लेकिन जैसे ही उन्हें थोड़ी राहत मिली वह फिर दौरे करने लगे।

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इसका नतीजा ये हुआ कि उनकी सुधरती सेहत फिर खराब हो गई और इस उम्र में लिवर प्रत्यारोपण से भी डाक्टरों ने मना किया। धीरे-धीरे उनकी सेहत गिरती गई और आखिरकार उन्हें इलाज के लिए
दिल्ली के वसंत कुंज स्थित लिवर अस्पताल में दाखिल कराया गया जहां कुछ दिनों के इलाज के बाद उन्होंने दुनिया से विदा ले ली। स्वामी अग्निवेश ने अनेक संस्थाओं और आश्रमों की भी स्थापना की थी लेकिन वह अपने पीछे कोई ऐसा संस्थागत तंत्र नहीं बना सके, जो उनके बाद उनके काम को आगे बढ़ाए। स्वामी अग्निवेश के जाने के बाद जन संघर्षों का एक और योद्धा देश से चला गया और उनकी यह कमी आसानी से पूरी होने वाली नहीं है।
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विनम्र श्रद्धांजलि।

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