क्या मानव को प्रकृति में बाधक बना चाहिए? क्या वन्य जीवों के जीवन में व्यवधान पैदा करना चाहिए? संभवतः सभी का उत्तर नहीं होगा, लेकिन मानव वन्य जीवों के जीवन में निरंतर व्यवधान पैदा कर रहे हैं। ताजा उदाहरण मध्य प्रदेश के श्योपुर में कूनो नेशनल पार्क का है, जहां ग्रामीणों ने मादा चीता ज्वाला को दो बार शिकार करने से रोका। मादा चीता अपने चार शावकों को लेकर निकली थी हालांकि कुछ लोग यह बेतुका तर्क दे सकते हैं कि ग्रामीणों ने दो पालतू जानवरों की जान बचाई, लेकिन यदि शिकार न मिलने के कारण भूख से मादा चीता और उसके शावक मर जाएं तो उसका दोषी कौन होगा? वैसे भी चीता के लिए शिकार पकड़ना आसान नहीं होता है।
कुछ साल पहले उत्तर प्रदेश के सहारनपुर में एक सड़क पर अजगर ने एक हिरण को जकड़ लिया था। एक युवा ने झाड़ी मार-मारकर अजगर को हिरण छोड़ने के लिए विवश कर दिया था। तब भी एक बहस चली थी कि क्या हमें प्रकृति और वन्यजीवों के साथ छेड़छाड़ करनी चाहिए? अजगर भी उन प्राणियों में शामिल है, जिसे बेहद मुश्किल से शिकार मिलता है, लेकिन अक्सर सोशल मीडिया पर हम ऐसे वीडियो देखते हैं, जहां अजगर को पकड़ कर उसके शिकार को पेट से बाहर तक निकाल दिया जाता है।
कूनो नेशनल पार्क में भारत सरकार का एक बहुत ही महत्वाकांक्षी प्रोजेक्ट चीता चल रहा है। अफ्रीका से लाकर यहां पर चीते छोड़े गए हैं। भारत सरकार की कोशिश है कि देश में साल 1948 में ही विलुप्त हो चुके इस दुर्लभ जीव को पुनर्स्थापित किया जाए, लेकिन क्या हम ऐसा होने देने के इच्छुक हैं?
श्योपुर की घटना को ही लें। मादा चीता ज्वाला अपने चार शावकों के साथ कूनो नेशनल पार्क से निकलकर 30 किलोमीटर दूर वीरपुर क्षेत्र में पहुंच गई थी। वहां पर उसने एक बार बछड़े को दबोचा तो दूसरी बार भैंस के पाड़े को पकड़ने का प्रयास किया। दोनों बार ग्रामीणों ने लाठियों के बल पर मादा चीता ज्वाला को विवश किया कि वो शिकार को छोड़कर भाग जाए।
ग्रामीणों ने इतना शोर मचाया कि मादा चीता और शावकों को लेकर जंगल में भागना पड़ा। हद तो यह थी कि कुछ ग्रामीणों ने वन्यजीवों पर पथराव तक कर दिया। कूनो नेशनल पार्क से जुड़े वन्य अधिकारियों का स्पष्ट कहना है कि चीता कभी मानव पर हमला नहीं करता है। फिर भी श्योपुर में लोग न जाने क्यों घबराए हुए हैं? लगता है, उन्हें यह तथ्य पता नहीं है। वो तो गनीमत रही कि मादा चीता और शावकों को ग्रामीण ने लाठी-डंडों से मार नहीं डाला।
मानव और वन्यजीवों का द्वंद्व नया नहीं है। यह आदिकाल से चला रहा है। अब तो स्थिति यह हो गई है कि हमने जंगल खत्म कर डाले हैं। वन्यजीवों को बचाने के लिए सरकार को जंगल बनाने पड़ रहे हैं। इन जंगलों में भी मानव का हस्तक्षेप खत्म नहीं हो रहा है। जंगल में वन्यजीवों को शिकार नहीं मिलता तो वो मानव बस्तियों में आ जाते हैं।
हम भले वन्यजीवों से किसी शिकार को छुड़ाकर स्वयं को गौरवान्वित महसूस करें, लेकिन उस वन्यजीव का भी सोचिए, जिसको भोजन से वंचित किया गया है। विशेष कर यदि वन्यजीव मांसाहारी है तो उसे भोजन कहां से मिलेगा? वन्यजीव से शिकार को छुड़ाकर मानव कोई उपकार या पुण्य का कार्य तो कर नहीं रहा है, बल्कि वो प्रकृति के नियम को तोड़ रहा है।
देश में वन्यजीवों की सुरक्षा को लेकर कानून बने हुए हैं, जिनमें सजा का प्रावधान है, लेकिन वन्यजीवों से शिकार छुड़ाने का जिक्र अभी कानून में नहीं है। सरकार को कानून में संशोधन कर इस विषय को भी जोड़ना चाहिए। साथ ही, सरकार को जन-जागरूकता निरंतर लाने की आवश्यकता है। पाठ्यक्रम में शुरुआत से वन्यजीवों को लेकर पढ़ाया जाए और बच्चों को यह सिखाया जाए कि प्रकृति वन्यजीवों के बिना अधूरी है।
फिर चीता तो एक दुर्लभ वन्यजीव है। पूरी दुनिया में इनकी संख्या 7000 के करीब ही बची है। भारत में तो यह 77 साल पहले ही समाप्त हो गए थे। एक बार पुनः इन्हें भारत में स्थापित करने के प्रयास हो रहे हैं, लेकिन जो घटना श्योपुर में हुई है, वो चिंताजनक है। सरकार को ऐसी घटनाओं को लेकर सख्त कदम उठाने चाहिए, ताकि मानव वन्य जीवों के लिए जीवन में व्यवधान पैदा कर सके।
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