मप्र के सीहोर जिले में भोपाल-इंदौर हाईवे पर स्थित कुबेरेश्वर धाम में इस बार भी मुफ्त रूद्राक्ष पाने की अफरातफरी में 5 लोगों ने जानें गंवां दीं। यह स्थिति तब है कि जब कथावाचक पं. प्रदीप मिश्रा किसी दूसरी जगह सावन में कांवड़ यात्रा निकलवा रहे हैं, भक्तों की भीड़ देखकर नाच रहे हैं। भगदड़ में मरने वालों का उन्हें रत्ती भर भी मलाल नहीं। जीवन का क्या, वो नश्वर है। और गरीब भक्तों की तो इतनी भी हैसियत नहीं कि कोई उनकी मौत पर दो आंसू बहाकर इस महोत्सव पर कोई दाग लगाए।
पंडितजी से इन असमय मौतों के बारे में पूछा गया तो वही रटा रटाया जवाब मिला-‘क्या करें, उम्मीद से ज्यादा भीड़ आ गई। पिछले साल 3 लाख आए थे, इस दफा और ज्यादा आए होंगे। घंटों हाईवे जाम हुआ सो अलग। यात्री परेशान हुए, ट्रैफिक संभालते प्रशासन का दम निकल गया। लेकिन इससे क्या फर्क पड़ता है, आस्था की राह में सब सहना पड़ता है। भौतिक कष्टों से मुक्ति ही सच्चा मोक्ष है। वो इस बार पांच लोगों को मिला। जिनके स्वजन रूद्राक्ष लूटने की आस में मारे गए, उनका कोई नाम लेवा भी नहीं है, क्योंकि उनको यहां पूर्व में भी मचे भगदड़ की कहानी किसी ने सुनाई नहीं होगी और सुनाई भी होगी तो उन्होंने इसे झुठलाया होगा। क्योंकि पंडितजी की महिमा अपरंपार है। ऐहिक लीलाओं से परे हैं।
वैसे भी कुबरेश्वेर धाम में बीते चार वर्षों में 8 श्रद्धालु अकारण अपनी जान गंवा चुके हैं। इसका शायद ही किसी को मलाल हो। धार्मिक आस्था अपनी जगह है, मानव जीवन में उसका महत्व भी है, लेकिन जब आस्था अपना विवेक गिरवी रख दे तो वह शुद्ध अंधभक्ति में तब्दील हो जाती है। तब व्यक्ति अपने मोक्ष, सांसारिक कष्टों से मुक्ति और कथित रूप से आध्यात्मिक जगत में रममाण हो जाने के लोभ में उचित-अनुचित, तार्किक-अतार्किक का भेद भी भुला बैठता है और खुद एक अंधी भीड़ का हिस्सा बन जाता है।
वह यह भी बिसरा देता है कि ईश्वर ने यह अनमोल जनम महज रूद्राक्ष की राह में गंवाने के लिए नहीं दिया है। हालांकि, इस बार फर्क यह दिखा कि पं.प्रदीप मिश्रा और उनकी भक्त मंडली द्वारा हर साल रूद्राक्ष बांटने के नाम पर जुटाई जाने वाली बेतहाशा भीड़ और अफरातफरी को रोकने राजनीतिक हल्कों से रूद्राक्ष वितरण पर रोक लगाने तथा बाबा के जांच कराने की मांग उठने लगी है। वोटों का भोग लगाने की जगह मानवीय त्रासदी की चुभन महसूस की जाने लगी है।
राज्य के मंत्री करणसिंह वर्मा ने आम जनता के दबाव में घटना की न्यायिक जांच का एलान कर जरूरी कार्रवाई से पल्ला झाड़ लिया है। यानी कब जांच होगी और कब कोई दोषी पाया जाएगा। जिम्मेदारों पर तत्काल और सीधी कार्रवाई से बचने का कानूनी बहाना है। जो मौतें सबके सामने हुईं, जो मौतें सबके कारण हुईं, जिनका पूरी दुनिया को पता है, उस प्रकरण में लंबी जांच किस बात की?
इस साल भगदड़ में जिन पांच लोगों ने अपनी जानें गंवाई हैं, क्या उनके प्राणों की कीमत एक रूद्राक्ष के मोल से भी कम है? न्यायिक जांच बरसों चलेगी। नतीजा एक रूद्राक्ष के बराबर भी नहीं निकलेगा। पंडितजी बेखौफ भीड़ जुटाते रहेंगे। हाई वे पर जाम लगता रहेगा। और प्रशासन बेबस होकर यह सब देखता रहेगा, क्योंकि आस्था की चादर पर सियासी सलमे की झालर टंगी है।
वैसे सीहोर के कुबेरेश्वर धाम में यह कोई नया नजारा नहीं है। बताया जाता है कि पंडित प्रदीप मिश्रा वहां भक्तों को प्रसाद की तरह हजारों रूद्राक्ष बांटते हैं। भक्तों की मान्यता है कि इस रूद्राक्ष को रात में पानी में भिगोकर वो पानी पीने से सभी तरह के रोग आदि से मुक्ति मिल जाती है। काश, ऐसा होता! तो देश में इतने डॉक्टरों, दवाखानों पर ताले पड़ चुके होते।
मेडिकल कॉलेजों में केवल रूद्राक्ष ट्रीटमेंट पढ़ाकर मुक्ति पाई जाती। देश में सिर्फ रूद्राक्ष की खेती और वितरण होता। इस हकीकत को जानते हुए भी अगर लोग रूद्राक्ष अथवा पंडितजी का आशीर्वाद पाने के लिए टूटे पड़ रहे हैं तो इसका अर्थ यही है कि अब अपने दिमाग से कोई सोचना नहीं चाहता। आस्था की चाशनी में मंद हो चुकी बुद्धि को सोशल मीडिया के सुनियोजित प्रचार ने पूरी तरह कुंद कर दिया है।