कृष्ण कभी धूमिल न होने वाली उजास हैं। कृष्ण का एक अर्थ है जिसका स्वभाव आकृष्ट करने का हो। यही कारण है कि इतिहास की चादर समय के पथ पर बिछती चली जाती है, युग बीतते जाते हैं लेकिन कृष्ण कभी अतीत नहीं होते। उनका आकर्षण न केवल अक्षुण्य बना रहता है बल्कि प्रत्येक समय की सर्जनात्मकता इस आकर्षण को विस्तार देती रहती है। जाने कितने शिल्प, कितने चित्र और कितने काव्य कृष्ण को नित्य रचते हैं उनकी गिनती नहीं की जा सकती।
कृष्ण विरोधों के समन्वय हैं। वे द्वन्द्वात्मक भी हैं, निर्द्वन्द्व भी, मोह के प्रतिरूप भी हैं तो विरक्ति के साकार स्वरूप भी, वे गीता के आख्याता ईश्वर हैं तो प्रभास में मामूली बहेलिए के तीर से प्राण त्याग देने वाले साधारण मनुष्य भी।
उनके जैसा कोई उजला प्रतीक नहीं जिसकी पूजा ‘श्याम’ कहकर की जाती हो। वे ऐसे श्याम हैं जिनके कारण उजाले की पहचान बनती है।
कृष्ण इतिहास के इकलौते अपवाद चरित्र हैं। वे तुलनीय हैं ही नहीं। विलक्षण है उनका कृतित्व जो जोड़ने और तोड़ने दोनों का जीवन्त उदाहरण है। वे ज़मीन से, यमुना के तट, तमाल के तरुवर, गांवों, ग्वालों, गोपियों तथा गायों से जुड़े, बड़ियारी आँखों वाली वृषभानु सुता राधा से जुड़े जिसके ग्रामीण भोलेपन को क़ायदे से लजाना भी नहीं आता था और जो ब्रज की वीथियों में पलाश के फूलों के रंग से इस सांवरे को नहलाकर होलियों को अपने नाम कर लिया करती थी।
कृष्ण की जीवन यात्रा हमारे जीवन के पड़ावों की परिभाषा है, गोकुल का बचपन, मथुरा का यौवन, द्वारिका का वार्धक्य और प्रभास का महाप्रयाण।
कृष्ण का जन्म भादों की उस अंधियारी रात में हुआ था जब मेघ अपने पूरे पौरुष को जग को जतलाने के लिए भरपूर बरस रहे थे। यमुना में सागर की सुनामी का उफान था तब उस अंधेरे की, बरसती मेघों की चुनौती स्वीकार कर एक उजास पुरुष अंधकार की कोख से जन्म गया था। मथुरा के कारागार के कपाट फिर बंद हो गए थे लेकिन नन्द के आंगन में दुंदुभियाँ बज उठी थीं।
यह एक कभी न धूमिल होने वाला उजाला था जिसे हम कृष्ण कहते हैं।
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