आरजी कर कांड में अदालती फैसले के बाद भी नहीं मिल पाए कई सवालों के जवाब
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अदालत में पीड़िता के माता-पिता के अलावा सीबीआई ने इसे 'रेयरेस्ट ऑफ द रेयर' मामला बताते हुए अभियुक्त के लिए मौत की सजा की मांग की थी। लेकिन बचाव पक्ष के वकील ने अदालत से संजय को सुधरने का एक मौका देने की अपील करते हुए कहा था कि उसको मौत की सजा नहीं दी जाए। इस मामले की सुनवाई बीते 11 नवंबर को शुरू हुई थी। यानी नौ महीने बाद फैसला आया है, लेकिन अब भी इससे जुड़े कई सवालों के जवाब अंधेरे में हैं।
वेस्ट बंगाल डॉक्टर्स फ्रंट से जुड़े डाॅ. किंजल नंद बताते हैं कि शुरू से ही इस मामले की जांच में भारी लापरवाही बरती गई और कई अहम सबूतों को या नष्ट होने दिया गया या फिर उसे नष्ट करने वालों से ठीक से पूछताछ नहीं की गई। उनका सवाल था कि पूर्व प्रिंसिपल संदीप घोष और स्थानीय थाने के ऑफिसर इंचार्ज अभिजीत मंडल को सबूत मिटाने के आरोप में गिरफ्तार किया गया था। लेकिन सीबीआई तय समय सीमा में उनके खिलाफ आरोपपत्र दायर नहीं कर सकी। नतीजतन उनको जमानत मिल गई।
आखिर सीबीआई ने ऐसा क्यों किया? उनका सवाल है कि पीड़िता का शव सुबह बरामद होने के बाद उसका पोस्टमार्टम शाम को किया गया और प्राथमिकी रात को पौने 12 बजे दर्ज की गई थी। इसमें पहले अस्वाभाविक मौत का मामला दर्ज किया गया था जबकि शव की स्थिति ही अपनी कहानी बता रही थी। आखिर इतनी देरी क्यों हुई और अस्वाभाविक मौत का मामला क्यों दर्ज किया गया था?
उनका सवाल है कि अस्पताल से पीड़िता के घर फोन पर यह क्यों बताया गया था कि आपकी बेटी बीमार है और उसने शायद आत्महत्या कर ली है? अब तक यह पता नहीं चल सका है कि किसने और किसके कहने पर वह फोन किया था।
डाॅ. किंजल सवाल करते हैं कि घटना के अगले दिन ही मौके पर एक कमरे की दीवार क्या सबूत मिटाने के लिए तोड़ी गई थी? 14 अगस्त की आधी रात के समय जुलूस की शक्ल में आने वाले लोगों ने क्या मौके से सबूत मिटाने के लिए ही अस्पताल पर हमला किया था? वहां सुरक्षा का पर्याप्त इंतजाम क्यों नहीं किया गया था? जूनियर डॉक्टरों का कहना है कि इन सवालों का जवाब नहीं मिलने तक पूरी तस्वीर साफ नहीं होगी।
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