दुर्गापूजा बंगाल की आस्था, संस्कृति और सामूहिक उल्लास का प्रतीक है। कोलकाता में भव्य पंडाल देखने के लिए हर साल बड़ी संख्या में लोग उमड़ते हैं। लेकिन जब इसी उत्सव में जान चली जाए, तो सवाल केवल हादसे पर दुख जताने का नहीं, बल्कि उस व्यवस्था की पड़ताल का है, जो लोगों की सुरक्षा के लिए बनाई गई थी।
चोरबागान सार्वजनिक दुर्गापूजा पंडाल में हुए हादसे ने भीड़ नियंत्रण, प्रवेश-निकास और सुरक्षा इंतजामों पर सवाल खड़े किए हैं। बारिश के बीच अफरातफरी और कथित भ्रामक घोषणाओं की भूमिका की भी जांच हो रही है।
लेकिन क्या बारिश और भीड़ को हादसे का बहाना बनाया जा सकता है? बड़े आयोजन में भीड़ उमड़ना अप्रत्याशित नहीं है। बारिश की आशंका भी सुरक्षा योजना का हिस्सा होनी चाहिए। फिर खतरे का आकलन पहले क्यों नहीं हुआ? क्या लोगों की संख्या के मुकाबले इंतजाम कम थे? क्या आपात स्थिति में भीड़ को सुरक्षित निकालने की योजना थी?
पहली जिम्मेदारी आयोजकों की नहीं?
किसी सार्वजनिक आयोजन में लोगों की सुरक्षा की प्राथमिक जिम्मेदारी आयोजकों की होती है। पंडाल की संरचना, रास्तों की चौड़ाई, प्रवेश और निकास, स्वयंसेवकों की तैनाती तथा आपातकालीन योजना-इन सभी की पड़ताल जरूरी है।
क्या पंडाल में भीड़ की क्षमता का आकलन किया गया था? क्या प्रवेश और निकास के रास्ते पर्याप्त थे? क्या भीड़ बढ़ने पर प्रवेश रोकने की व्यवस्था थी? यदि सुरक्षा में कमियां थीं, तो उन्हें दूर किए बिना आयोजन कैसे चलता रहा?
हादसे के बाद आयोजक समिति और सुरक्षा व्यवस्था से जुड़े लोगों के खिलाफ कार्रवाई की खबरें सामने आई हैं। लेकिन गिरफ्तारी ही दोष साबित नहीं करती। जांच को यह स्पष्ट करना होगा कि किसकी क्या भूमिका थी, किसने कौन-सी जिम्मेदारी निभाई और कहां चूक हुई।
सवाल यह भी है कि क्या जिम्मेदारी केवल उन लोगों पर तय होगी, जो मौके पर मौजूद थे, या उन पर भी जो सुरक्षा व्यवस्था की योजना और निगरानी के लिए जिम्मेदार थे?
पुलिस-प्रशासन की जवाबदेही कहां है?
बड़े सार्वजनिक आयोजनों में पुलिस और प्रशासन की भूमिका भी अहम होती है। भीड़ का अनुमान, पुलिस बल की तैनाती, यातायात नियंत्रण और आपातकालीन सेवाओं की तैयारी केवल आयोजकों के भरोसे नहीं छोड़ी जा सकती।
क्या पुलिस ने आयोजन से पहले सुरक्षा व्यवस्था का निरीक्षण किया था? क्या संभावित खतरों को लेकर आयोजकों को चेतावनी दी गई थी? भीड़ बेकाबू होने लगी, तो उसे नियंत्रित करने के लिए क्या कदम उठाए गए? क्या जरूरत के मुताबिक पुलिसकर्मी तैनात थे?
इन सवालों के जवाब जांच से सामने आने चाहिए। यदि आयोजकों ने नियमों की अनदेखी की, तो उनकी जिम्मेदारी तय हो। लेकिन अगर निगरानी में प्रशासनिक चूक हुई, तो क्या संबंधित अधिकारियों को जवाबदेह नहीं बनाया जाना चाहिए?
हादसे के बाद कार्रवाई करना जरूरी है, लेकिन उससे बड़ा सवाल यह है कि हादसे को रोकने के लिए पहले क्या किया गया था। क्या व्यवस्था की खामियों की जांच भी उसी गंभीरता से होगी, जिस गंभीरता से गिरफ्तारियां की जा रही हैं?
एक घोषणा से भगदड़ या व्यवस्था की नाकामी?
रिपोर्टों में बारिश, भीड़ के दबाव और कथित भ्रामक घोषणाओं को हादसे के संभावित कारणों के रूप में देखा जा रहा है। लेकिन किसी एक वजह को अंतिम मान लेना जल्दबाजी होगी।
जांच में सीसीटीवी फुटेज, प्रत्यक्षदर्शियों के बयान, सुरक्षा कर्मियों की भूमिका और पंडाल की बनावट की पड़ताल होनी चाहिए। यह पता लगाना भी जरूरी है कि भगदड़ कैसे शुरू हुई और लोगों को सुरक्षित निकालने के लिए तत्काल क्या कदम उठाए गए।
यदि किसी घोषणा ने अफरातफरी बढ़ाई, तो वह किसने की और क्यों? यदि रास्ते बाधित थे, तो उन्हें पहले दुरुस्त क्यों नहीं किया गया? और यदि भीड़ का दबाव लगातार बढ़ रहा था, तो प्रवेश रोकने का फैसला समय पर क्यों नहीं लिया गया?
हादसे की वजह जानना केवल जांच का तकनीकी पहलू नहीं है। इन्हीं जवाबों से तय होगा कि जिम्मेदारी किसकी थी और भविष्य में ऐसी त्रासदी रोकने के लिए क्या बदलना होगा।
सरकार की जवाबदेही कौन तय करेगा?
राज्य सरकार की जिम्मेदारी है कि वह निष्पक्ष जांच कराए और दोषियों के खिलाफ कार्रवाई सुनिश्चित करे। लेकिन क्या सरकार की भूमिका केवल जांच की घोषणा करने तक सीमित रह सकती है?
पुलिस और प्रशासन किसके निर्देश पर काम कर रहे थे? सुरक्षा व्यवस्था की निगरानी किसकी जिम्मेदारी थी? क्या निर्धारित मानकों का पालन हुआ? यदि व्यवस्था में खामियां थीं, तो क्या उनकी जिम्मेदारी तय करने के लिए स्वतंत्र और पारदर्शी जांच होगी?
मृतकों के परिवारों को मुआवजा देना और घायलों का इलाज कराना जरूरी है। लेकिन क्या इतना ही पर्याप्त है? पीड़ित परिवारों को यह जानने का अधिकार है कि उनके अपनों की जान किन परिस्थितियों में गई और जिन पर सुरक्षा की जिम्मेदारी थी, उन्होंने अपना कर्तव्य निभाया या नहीं।
राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप से इन सवालों का जवाब नहीं मिलेगा। जवाब तथ्यों, दस्तावेजों और निष्पक्ष जांच से ही सामने आएगा।
अगली दुर्गापूजा तक सब भूल जाएंगे?
बड़े आयोजनों में हादसों के बाद जांच और कार्रवाई के वादे होते हैं। कुछ समय तक सुरक्षा पर चर्चा भी होती है, लेकिन क्या व्यवस्था में स्थायी सुधार हो पाता है?
दुर्गापूजा जैसे आयोजनों में भीड़ की अधिकतम सीमा, सुरक्षित रास्ते, प्रशिक्षित स्वयंसेवक, आपातकालीन चिकित्सा और पुलिस-प्रशासन के बीच समन्वय अनिवार्य होना चाहिए। बारिश या दूसरी आपात परिस्थितियों के लिए भी स्पष्ट योजना होनी चाहिए।
पंडाल की भव्यता और सजावट पर खूब चर्चा होती है। लेकिन क्या आयोजनों की सफलता का पैमाना केवल उनकी लोकप्रियता और दर्शकों की संख्या होना चाहिए? सुरक्षा में चूक के बाद उत्सव की भव्यता किस काम की?
सवाल गिरफ्तारी का नहीं, जवाबदेही का है
कोलकाता दुर्गापूजा हादसे में आयोजकों की भूमिका की जांच जरूरी है। पुलिस और प्रशासन की संभावित चूक की पड़ताल भी उतनी ही जरूरी है। किसी को बिना जांच दोषी ठहराना उचित नहीं, लेकिन जिम्मेदारी तय करने से बचना भी स्वीकार्य नहीं हो सकता।
आखिर लोगों की जान बचाने की जिम्मेदारी किसकी थी? खतरे का अंदाजा क्यों नहीं लगा? सुरक्षा व्यवस्था में कमी थी, तो उसे दूर क्यों नहीं किया गया? और यदि लापरवाही हुई, तो जवाबदेही केवल निचले स्तर पर तय होगी या पूरी व्यवस्था की जांच होगी?
मृतकों के परिवारों के लिए कोई मुआवजा अपनों की कमी पूरी नहीं कर सकता। उन्हें न्याय तभी मिलेगा, जब जांच निष्पक्ष हो, दोषियों को कानून के अनुसार सजा मिले और ऐसी घटना दोबारा न हो, इसके लिए ठोस कदम उठाए जाएं।
दुर्गापूजा आस्था और उल्लास का उत्सव है, मौत का मंजर नहीं। अब सवाल यह नहीं कि हादसे के बाद कौन गिरफ्तार हुआ, बल्कि यह है कि हादसा होने से पहले किसने अपनी जिम्मेदारी नहीं निभाई-और उस चूक का जवाब कौन देगा?
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