भारत के उपग्रह प्रक्षेपण पैड के रूप में श्रीहरिकोटा का चयन करते समय कई कारकों को ध्यान में रखा गया है। दरअसल, ये एक द्वीप है, जो आंध्र प्रदेश में है। इसकी भौगोलिक स्थिति ही इसकी ताकत है। भूमध्य रेखा यानि इक्वेटर से करीबी यहां की खासियत है। ये जगह पूर्व दिशा की ओर जाने वाली लॉन्चिंग के लिए बेहतरीन मानी जाती है।
पूर्वी तट पर स्थित होने से इसे अतिरिक्त 0.4 km/s की गति (वेलोसिटी) मिलती है। ज्यादातर सैटेलाइट पूर्व की तरफ ही लॉन्च किए जाते हैं। इस जगह आबादी भी नहीं है। यहां इसरो के कर्मचारी और स्थानीय मछुआरे रहते हैं।
एक बार जब एक रॉकेट लॉन्च होता है तो वह निर्धारित पथ से भटक भी सकता है। ऐसी स्थिति आने पर उसे नष्ट करने का आदेश दिया जाता है। यह कमांड यानि आदेश रॉकेट को नष्ट या पूरी तरह से विघटित कर देता है और इसे समुद्र में गिरा देता है। यही वजह है कि समुद्र या रेगिस्तान के पास, बिना निवास वाले स्थानों को अंतरिक्ष बंदरगाहों के रूप में चुना जाता है। यही वजह है कि बंगाल की खाड़ी और पुलिकट झील से घिरा श्रीहरिकोटा एक आदर्श लॉन्च पैड है।
1969 में इस जगह को सैटेलाइट लॉन्चिंग स्टेशन के रूप में चुना गया। फिर 1971 में RH-125 साउंडिंग रॉकेट लॉन्च किया गया। पहला ऑर्बिट सैटेलाइट रोहिणी 1A था, जो 10 अगस्त 1979 को लॉन्च किया गया लेकिन खामी की वजह से 19 अगस्त को नष्ट हो गया। इन वर्षों में, इसरो ने 60 तकनीकी विकास प्रक्षेपण, 87 भारतीय अंतरिक्ष शिल्प प्रक्षेपण, 8 छात्र उपग्रह प्रक्षेपण, 2 पुन: प्रवेश मिशन और 180 विदेशी उपग्रह 23 देशों से श्रीहरिकोटा से लिफ्ट-ऑफ किए हैं।
कुछ रिपोर्ट में कहा गया है कि संयुक्त राज्य अमेरिका में कैनेडी स्पेस सेंटर के बाद, श्रीहरिकोटा दुनिया में दूसरा सबसे अच्छा स्पेसपोर्ट है। श्रीहरिकोटा स्पेस सेंटर नेशनल हाइवे पर है। सबसे नजदीक का रेलवे स्टेशन 20 किलोमीटर दूर है। इसका नजदीकी शहर सुल्लुर्पेता है, इसके पास रेलवे स्टेशन भी है। चेन्नई के इंटरनेशनल एयरपोर्ट से ये जगह 70 किलोमीटर दूर पड़ती है।