यही वजह है कि अकेले मई महीने में ही चार बार पेट्रोल-डीजल की कीमत में करीब 7.50 रुपये की वृद्धि हो चुकी है और सीएनजी प्रति किलो 6 रुपये तक महंगी हो गई । इस महंगाई का असर बाकी सभी जरूरी चीजों पर अप्रत्यक्ष तौर पर पड़ा । ईंधन की कीमत में यह वृद्धि अभी महंगाई की अंगड़ाई मानी जा रही है। आंकड़े, वैश्विक हालात और प्राकृतिक परिस्थितियां संकेत हैं कि आने वाले समय में महंगाई की मार और झेलनी पड़ेगी।
वैश्विक चुनौतियों का बोझ
अमेरिका और ईरान के बीच जंग की ज्वाला थम नहीं रही है । सीजफायर और डील के बीच हर दौर में बात बनते-बनते बिगड़ जाती है । होर्मुज संकट से अंतर्राष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमत 100 डॉलर प्रति बैरल के आसपास है । सरकार दावा कर रही है कि मई महीने में चार बार में करीब साढ़े सात रुपये पेट्रोल-डीजल की मूल्य वृद्धि के बावजूद अब भी तेल कंपनियां पेट्रोल मद में 11 रुपये और डीजल मद में 33 रुपये प्रति लीटर के घाटे में है । रसोई गैस
सिलिंडर मद में प्रति सिलिंडर करीब 703 रुपये का घाटा कंपनियों पर है।
इसकी भरपाई के लिए सरकार की ओर से 12 किस्तों में 30 हजार करोड़ का मुआवजा तेल कंपनियों को आवंटित किया जा चुका है । फिर भी कीमतें नियंत्रित नहीं हो पा रही हैं। सरकार यह भी दावा कर रही है कि दुनिया के कई देशों के मुकाबले भारत में दरें कम हैं। पेट्रोल-डीजल की कीमतों में वृद्धि का असर सामान ढुलाई से लेकर यात्रा, किराया के साथ-साथ करीब-करीब हर जरूरी चीजों की कीमतों पर पड़ा है। विमान किराये को भी नियंत्रित करने के मकसद से सरकार की ओर से 10 हजार करोड़ रुपये की व्यवस्था की गई। विमान यात्रा फिर भी महंगी ही हुई है। तमाम सरकारी प्रयासों के बावजूद ईंधन की महंगाई ने दूसरी हर जरूरी चीजों का भाव इस कदर बढ़ाया कि महंगाई का ग्राफ 4.6 फीसदी से उछलकर 5.1 फीसदी पर पहुंच गया। यह ग्राफ अभी और ऊपर की ओर जाएगा, ऐसा माना जा रहा है। सरकार की ओर जीएसटी मद में जो राहत मिली थी, वह भी अब कम पड़ गई है।
महंगाई की प्राकृतिक वजह भी
मानसून दस्तक दे चुका है। शुरुआत में ही कमजोर मानसून और अलनीनो के कॉकटेल ने वैश्विक हालात की तरह अर्थव्यवस्था का मिजाज बिगाड़ दिया । 6 जून तक 19 मिमि बारिश के अनुमान के बीच अब तक केवल 15 मिमि बारिश ही हो पाई है । यह मौसम विभाग के अनुमान से करीब 20 फीसदी कम है। अलनीनो का असर भी है। 2015-16 और करीब ढ़ाई- तीन दशक पहले (1997-98) की तुलना में तीन डिग्री ज्यादा गर्म है।
रिजर्व बैंक ने भी मौद्रिक नीति में बार-बार राहत देने के बाद वैश्विक हालात और प्राकृतिक परिस्थितियों के मद्देनजर इस बार मौद्रिक नीति में बगैर किसी बदलाव के रेपो रेट को 5.25 फीसदी पर ही स्थिर रखा। और तो और आरबीआई ने वित्त वर्ष 2027 के लिए आर्थिक विकास दर के अनुमान को 6.9 से घटाकर 6.6 फीसदी पर नीचे खिसका दिया । तमाम हालात के बीच भले भारत की अर्थव्यवस्था का बेहतर प्रदर्शन (2025-26) जीडीपी 7.7 फीसदी रहा, लेकिन चुनौतियां बनी हुई हैं । इन्हीं चुनौतियों से निपटने के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने फौरन आर्थिक सलाहकार परिषद की बैठक बुलाकर अर्थव्यवस्था की मजबूती के लिए फिर से मंथन किया। विदेशी निवेश की संभावनाओं को खंगाला। अब उम्मीद की जा रही है कि सरकार आने वाले समय में राहत की कुछ बूंदों का अहसास शायद करा दे।
अगली तिमाही चुनौतीपूर्ण
वैश्विक हालात ऐसे ही रहें तो त्योहारी सीजन के बीच महंगाई को लेकर चुनौतियां और बढ़ने वाली हैं। अर्थशास्त्र के आंकड़े चाहें जो बताएं, यह सच है कि आम आदमी की जेब पर दूध से लेकर रोजमर्रा की बेहद जरूरी चीजों खासकर गैस, खानपान, रसोई के उत्पाद, रहन-सहन के सामान तक महंगाई की मार पड़ी है। महंगे ईंधन ने आर्थिक विकास की रफ्तार को टॉप गियर से एक गियर नीचे लाने पर मजबूर कर दिया है, वहीं अब रसोई में गैस जुटाने से लेकर उसकी खपत तक की चिंता ने गृहणियों को परेशानी में डाल दिया है।
जिन घरों में पाइप लाइन से आपूर्ति नहीं होती, उन्हें रसोई गैस के लिए नंबर लगाने से लेकर किफायती इस्तेमाल तक के गणित ने महंगाई से इतर भी संकट में डाल रखा है। सरकार के सामने अर्थव्यवस्था को पंख देने की चुनौती है, तो आम लोगों को अपनी जिंदगी की गाड़ी पटरी में चलाए रखने की। आम आदमी के मन में महंगाई डायन का डर सता रहा है। ऐसे में अनायास ही होंठ बुदबुदा रहे हैं.... बाकी जो कुछ बचा सो महंगाई मार गई... हाय महंगाई.. हाय महंगाई।
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