फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

अब बलूचिस्तान में ये क्या करने लगा पाकिस्तान? आखिर क्या हो रहा है वहां के पुरुषों के साथ?

Sat, 19 Jan 2019 03:48 PM IST
Vishwakarma Vishwakarma हरगोविंद विश्वकर्मा
विज्ञापन
राष्ट्रवादी बलूच नेता नवाब अकबर बुगती की अगस्त 2006 में हत्या के बाद से सेना का अत्याचार चरम पर है। - फोटो : file photo
विज्ञापन

पाकिस्तान जम्मू-कश्मीर में मानवाधिकार हनन का मुद्दा अंतरराष्ट्रीय मंच पर चाहे जितना उठाया जाए, लेकिन यह सच है कि पाकिस्तानी सेना बलूचिस्तान राज्य में जुल्म करने का हर रिकॉर्ड तोड़ रही है। इस प्रांत में आज़ादी के बाद से ही पाकिस्तान कहर ढा रहा है। राष्ट्रवादी बलूच नेता नवाब अकबर बुगती की अगस्त 2006 में हत्या के बाद से सेना का अत्याचार चरम पर है। आतंकवादी समूहों के साथ सांठगांठ करके सेना और अन्य एजेंसियां हजारों बलूच राजनेताओं, सामाजिक कार्यकर्ताओं, छात्रों, वकीलों, पत्रकारों, इंजीनियरों, डॉक्टरों और शिक्षकों को ग़ायब कर चुकी है। अगवा करके ग़ायब करने का सिलसिला अभी थमा नहीं है।

विज्ञापन


पिछले पांच महीने के दौरान क़रीब सवा तीन सौ लोग ग़ायब कर दिए गए। फ़िलहाल, पिछले 10 साल से 40,000 से अधिक बलूच नागरिक लापता हैं। इनमें से 10,000 से अधिक लोगों की "हत्या" कर दी गई और गोली से छलनी शव को बीहड़ क्षेत्रों में फेंक दिया गया। बाकी बलूच नागरिक अब भी सेना की अवैध हिरासत में हैं। इन मासूमों को न तो रिहा किया जा रहा है और न ही इन्हें कोर्ट में पेश किया जा रहा है।

आखिर क्यों हो रहा है ऐसा?
दरअसल, किसी अपने का अचानक ग़ायब हो जाना, बहुत ही त्रासदीपूर्ण होता है। यह किसी की मौत से होने वाले दर्द से भी ज़्यादा पीड़ा देने वाली अवस्था होती है। अगर कोई मर जाता है, तो मन को संतोष करना पड़ता है कि क्या करें, उसे तो ऊपर वाले ने ही उठा लिया। लेकिन जब कोई ग़ायब होता है तो मन हर पल कटोचता सा रहता है, वह कहां होगा?किस हाल में होगा? उसके साथ क्या हो रहा होगा? क्या उसे बहुत भयानक यातना दी जा रही होगी? यह सोचकर ग़ुमशुदा व्यक्ति के परिजनों की नींद हराम हो जाती है। इसी तरह की त्रासदी से देश के सबसे अशांत सूबा बलूचिस्तान का कमोबेश हर परिवार गुज़र रहा है। क़रीब-क़रीब हर घर के पुरुष सदस्य कई साल से ग़ायब हैं। इनमें से ज़्यादातर को सेना ने मार डाला है, लेकिन उनकी बॉडी न मिलने से मृत्यु की पुष्टि नहीं हो पाई है।
विज्ञापन


हैरान करती है बलूचिस्तान की कहानी 
सबसे हैरान करने वाली बात यह है कि इन दिनों बलूचिस्तान में कई-कई परिवारों में पुरुष ही नहीं हैं। पुरुष की ग़ैरमौजूदगी में आमतौर पर महिलाएं ही परिवार देखती हैं। जिन ग़ायब पुरुषों की लाशें परिजन को मिल गईं, उनकी बीवी ने अपने आपको विधवा मान लिया। इस तरह इस राज्य में विधवाओं की संख्या बहुत ज़्यादा है। बड़ी संख्या में ऐसी महिलाएं भी हैं, जिनके पति ग़ायब कर दिए गए हैं, वे उनके लौटने का इंतज़ार करती हैं। इसी तरह बड़ी संख्या में महिलाओं के या भाई या फिर पिता लापता हैं।

सामान्य रूप से ऐसा माना जाता है कि ग़ायब लोगों को सेना ने देश के ख़िलाफ़ विद्रोह करने के मामले में उनकी कथित भागीदारी के लिए हिरासत में ले रखा है। हालांकि, पाकिस्तान की सुरक्षा एजेंसियां आरोप का सिरे से खंडन करती हैं। ग़ुमशुदा लोगों के मुद्दे को सेंसर करने की वजह से इनकी खबरें मीडिया में नहीं आ पाती। बलूचिस्तान में सक्रिय मानवाधिकार संगठन द वॉयस फॉर बलूच मिसिंग पर्सन्स (वीबीएमपी) के उपाध्यक्ष मामा कादिर ने 2013 में ग़ुमशुदा बलूचों के मामले पर दुनिया का ध्यान खींचने के लिए क्वैटा से कराची होकर इस्लामाबाद तक 3,000 किलोमीटर लंबा ऐतिहासिक मार्च का नेतृत्व किया था।

बलूचिस्तान में जो भी ग़ुमशुदा लोगों का मसला उठाता है, उसे हमेशा के लिए ख़ामोश कर दिया जाता है। - फोटो : SELF
गुमशुदा लोगों का मसला क्यों नहीं उठाया जा रहा 
सबसे दुर्भाग्यपूर्ण बात यह है कि बलूचिस्तान में जो भी ग़ुमशुदा लोगों का मसला उठाता है, उसे हमेशा के लिए ख़ामोश कर दिया जाता है। पांच साल पहले सबीन महमूद का यही हश्र हुआ था। सबीन ग़ुमशुदा बलूच लोगों के हक में आवाज़ उठा रही थीं और एक दिन कुछ हमलावरों ने उनकी सरेआम हत्या कर दी। सबीन का अचानक चले जाना एक रोशनी के अंधेरे में ग़ुम हो जाने की तरह था। इस तरह अनेक घटनाएं इस बेहद पिछड़े राज्य में आए दिन होती रहती हैं।

स्थानीय लोगों का मानना है कि सेना और आईएसआई अपना प्रभुत्व बनाए रखने के लिए न्याय की बात करने वालों की भाड़े के हत्यारों से हत्या करवा देती है। इस मामले में अब्दुल वाहिद बलूच अब तक इकलौते भाग्यशाली हैं, जो 2016 में अगवा किए जाने के बावजूद अंतरराष्ट्रीय दबाव के चलते रिहा कर दिए गए। वामपंथी विचारों वाले अब्दुल की बेटी हनी ने उन्हें जो पत्र लिखा था, वह दुनिया भर की सुर्खियां बनी थी। हनी ने पत्र में अपने पिता के ग़ुमशुदगी के ज़रिए सेना पर कई सवाल उठाए थे।

मीडियिा में छाया है मुद्दा, डॉन भी दे चुका है रिपोर्ट 
ग़ुमशुदा बलूच के मुद्दे पर हाल ही में पाकिस्तान का सबसे ज़्यादा पढ़ा जाने वाले सर्वाधिक प्रतिष्ठित अख़बार 'द डॉन' ने सरकार और सेना की जमकर ख़बर ली। अख़बार ने संपादकीय में लिखा है, "लोगों का अपने ही देश में ग़ुमशुदा हो जाना देश पर एक कलंक है। बहुत लंबे समय से बलूचिस्तान में ग़ुमशुदा लोगों के मामले में कोई प्रगति नहीं हुई है। जबरन ग़ुमशुदा जांच कमीशन की रिपोर्ट से पता चला कि अगस्त 2018 से राज्य में 318 और लोग लापता हो गए।

लापता लोगों की बढ़ती संख्या परेशान करने वाली है और यह दर्शाती है कि सेना के अंदर कुछ ऐसे अफसरान ज़रूर हैं, जो लगातार अपनी शक्ति और अधिकार पद का दुरुपयोग करते हुए लोगों को प्रताड़ित कर रहे हैं।" बहरहाल, 'द डॉन' की ख़बर का संज्ञान लेते हुए राष्ट्रपति आरिफ़ अल्वी ने कहा कि प्रधानमंत्री, सेना प्रमुख और न्यायपालिका के बीच बलूचिस्तान के गुमशुदा लोगों के मामले को हल करने के लिए चर्चा हो रही है।

वॉयस ऑफ बलूच मिसिंग पर्सन्स की अगुवाई में बलूच समुदाय के लोग पिछले 10 साल (3384 दिन से ज़्यादा) से क्वेटा में शांतिपूर्ण धरना और प्रदर्शन कर रहे हैं और मिसिंग बलूच नागरिकों के साथ न्याय करने की मांग कर रहे हैं। संभवतः यह दुनिया का सबसे लंबा धरना-प्रदर्शन है। वीबीएमपी 2009 से लापता बलूच के मामले को आगे बढ़ा रहा है। धरने में शामिल सीमा बलूच 'द बलूच पोस्ट' के पत्रकार के साथ बातचीत में कहती हैं, "मेरा भाई शाबिर बलूच गोरकोप में सैन्य कार्रवाई में 4 अक्टूबर 2016 को अगवा कर लिया गया था। उसी दिन सेना ने 36 और लोगों को उठा लिया था। उनमें से कुछ लोगों को एक दो दिन में छोड़ दिया गया, लेकिन मेरा भाई अभी तक नहीं लौटा है। हमारे पास पक्का सबूत है कि हमारे भाई को पैरा मिलिटरी फोर्स फ्रंटियर कोर (एफसी) ने अगवा किया है। साबिर की पत्नी और दूसरे स्थानीय लोग इस घटना के चश्मदीद हैं।" सीमा पिछले दो साल से अपने भाई को मुक्त कराने के लिए संघर्ष कर रही हैं।
विज्ञापन

बलूचिस्तान पाकिस्तान का सबसे बड़ा राज्य है जो लगभग 44 फ़ीसदी हिस्से को कवर करता है । - फोटो : file photo
क्या है पृथक बलूचिस्तान आंदोलन
पृथक बलूचिस्तान आंदोलन का लंबा इतिहास रहा है। दरअसल, बलूचिस्तान पाकिस्तान का सबसे बड़ा राज्य है जो लगभग 44 फ़ीसदी हिस्से को कवर करता है । इस इलाके की आबादी तकरीबन 1.3 करोड़ है, जो पाक की आबादी का महज 7 फ़ीसदी है। यहां रहने वाले लोगों को बलूच कहा जाता है। यह सबसे ग़रीब और उपेक्षित इलाक़ा भी है। कई इलाके के लोगों का आज भी बाहरी दुनिया से ताल्लुकात नहीं है। पाकिस्तान ने हाल के दिनों में अपनी परियोजनाओं के लिए बाहर से लोगों को लाकर यहां बसाने की नीति शुरू की है। उनकी दलील है कि बलूच आबादी में साक्षरता दर बेहद कम होने और हुनरमंद लोगों की कमी की वजह से ऐसा करना जरूरी है।मगर बलूच राष्ट्रवादियों को शंका है कि उन्हें कई इलाकों में अल्पसंख्यक बना देने और प्राकृतिक संसाधनों के दोहन के लिए पाकिस्तानी सरकार यह खेल खेल रही है। 

बलूचिस्तान को ‘ब्लैक पर्ल’ या ‘काला मोती’ भी कहा जाता है। 
बलूचिस्तान को ‘ब्लैक पर्ल’ या ‘काला मोती’ भी कहा जाता है। तेल, गैस, तांबे और सोने जैसी प्राकृतिक संपदाओं की यहां भरमार है। इसी पर चीन की नज़र है, जिसका स्थानीय लोग पुरज़ोर विरोध कर रहे हैं। विरोध का स्वर तेज़ करने के लिए बलूच राष्ट्रवादियों के संगठन बलूचिस्तान लिबरेशन आर्मी ने कराची में चीनी वाणिज्य दूतावास पर पिछले साल 23 नवंबर को हमला किया था। हमले के बाद पाक सेना का बलूचिस्तान में "मिशन टॉर्चर" का मुद्दा विश्व स्तर पर सुर्खियों में आ गया।

हमले की जिम्मेदारी लेते हुए बलूचिस्तान लिबरेशन आर्मी ने दावा किया कि चीन-पाकिस्तान इकोनॉमिक कॉरीडोर के जरिए फैलते "चीनी कब्जे" के खिलाफ उनका संगठन ऐसी कार्रवाई करता रहेगा। संगठन मानता है कि चीन "बलूचिस्तान की खनिज संपदा का दोहन करते हुए बलूच क्षेत्र पर कब्ज़ा" करना चाहता है।

वस्तुतः आज़ादी के बाद से ही बलूच जनता राज्य के धन और प्राकृतिक संसाधनों में अपने हिस्से से वंचित कर रही है। जिया-उल-हक शासन के बाद पाकिस्तान में लोकतंत्र की बहाली की प्रक्रिया होने पर बलूच अलग-थलग रखे गए। अब बलूच लोग, ख़ास कर नई पीढ़ी समझ गई है कि इस्लामाबाद झूठा वादा और विश्वासघात कर रहा है। असंतोष के चलते बलूचिस्तान का मसला अचानक सुषुप्तावस्था से जाग गया है और बलूच राष्ट्र की मांग तेज़ हो गई है।

भारत से है बलूच नेताओं को आस 
बहरहाल, विदेशों में पनाह लेने वाले बलूच नेता भारत की ओर हसरत भरी नजर से देखते हैं, कि यह मुल्क उनके लिए कुछ करेगा। दरअसल, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जब लाल किले से दिए गए अपने भाषण में बलूचिस्तान में पाकिस्तान सेना के अत्याचार का जिक्र किया तो बलूच लोगों को उम्मीद बंधी थी कि भारत अंतरराष्ट्रीय मंच पर पाकिस्तानी सेना के अत्याचार और मानवाधिकार के उल्लंघन का मामला उठाएगा क्योंकि बलूचिस्तान इंटरनेशनल सपोर्ट हासिल करने के लिए लंबे समय से कोशिश कर रहा है।

मोदी दुनिया में अकेले ऐसे प्रधानमंत्री हैं जिन्होंने बलूचिस्तान और वहां के संघर्ष पर बात की है, लेकिन भारत ने अभी तक ऐसा कुछ नहीं किया। भारत ने बलूचिस्तान के मुद्दे को आधिकारिक नीति के रूप में कभी उठाया ही नहीं। मोदी का बलूचिस्तान का जिक्र करना सिर्फ पाकिस्तान को परेशान करने का एक तरीका था। इसलिए भारत आगे कुछ करेगा, इस बात की संभावना बहुत कम ही नज़र आ रही है।
 
डिस्क्लेमर (अस्वीकरण) : यह लेखक के निजी विचार हैं. आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है. आप भी अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं. लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें.
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें