बलूचिस्तान में जो भी ग़ुमशुदा लोगों का मसला उठाता है, उसे हमेशा के लिए ख़ामोश कर दिया जाता है।
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गुमशुदा लोगों का मसला क्यों नहीं उठाया जा रहा
सबसे दुर्भाग्यपूर्ण बात यह है कि बलूचिस्तान में जो भी ग़ुमशुदा लोगों का मसला उठाता है, उसे हमेशा के लिए ख़ामोश कर दिया जाता है। पांच साल पहले सबीन महमूद का यही हश्र हुआ था। सबीन ग़ुमशुदा बलूच लोगों के हक में आवाज़ उठा रही थीं और एक दिन कुछ हमलावरों ने उनकी सरेआम हत्या कर दी। सबीन का अचानक चले जाना एक रोशनी के अंधेरे में ग़ुम हो जाने की तरह था। इस तरह अनेक घटनाएं इस बेहद पिछड़े राज्य में आए दिन होती रहती हैं।
स्थानीय लोगों का मानना है कि सेना और आईएसआई अपना प्रभुत्व बनाए रखने के लिए न्याय की बात करने वालों की भाड़े के हत्यारों से हत्या करवा देती है। इस मामले में अब्दुल वाहिद बलूच अब तक इकलौते भाग्यशाली हैं, जो 2016 में अगवा किए जाने के बावजूद अंतरराष्ट्रीय दबाव के चलते रिहा कर दिए गए। वामपंथी विचारों वाले अब्दुल की बेटी हनी ने उन्हें जो पत्र लिखा था, वह दुनिया भर की सुर्खियां बनी थी। हनी ने पत्र में अपने पिता के ग़ुमशुदगी के ज़रिए सेना पर कई सवाल उठाए थे।
मीडियिा में छाया है मुद्दा, डॉन भी दे चुका है रिपोर्ट
ग़ुमशुदा बलूच के मुद्दे पर हाल ही में पाकिस्तान का सबसे ज़्यादा पढ़ा जाने वाले सर्वाधिक प्रतिष्ठित अख़बार 'द डॉन' ने सरकार और सेना की जमकर ख़बर ली। अख़बार ने संपादकीय में लिखा है, "लोगों का अपने ही देश में ग़ुमशुदा हो जाना देश पर एक कलंक है। बहुत लंबे समय से बलूचिस्तान में ग़ुमशुदा लोगों के मामले में कोई प्रगति नहीं हुई है। जबरन ग़ुमशुदा जांच कमीशन की रिपोर्ट से पता चला कि अगस्त 2018 से राज्य में 318 और लोग लापता हो गए।
लापता लोगों की बढ़ती संख्या परेशान करने वाली है और यह दर्शाती है कि सेना के अंदर कुछ ऐसे अफसरान ज़रूर हैं, जो लगातार अपनी शक्ति और अधिकार पद का दुरुपयोग करते हुए लोगों को प्रताड़ित कर रहे हैं।" बहरहाल, 'द डॉन' की ख़बर का संज्ञान लेते हुए राष्ट्रपति आरिफ़ अल्वी ने कहा कि प्रधानमंत्री, सेना प्रमुख और न्यायपालिका के बीच बलूचिस्तान के गुमशुदा लोगों के मामले को हल करने के लिए चर्चा हो रही है।
वॉयस ऑफ बलूच मिसिंग पर्सन्स की अगुवाई में बलूच समुदाय के लोग पिछले 10 साल (3384 दिन से ज़्यादा) से क्वेटा में शांतिपूर्ण धरना और प्रदर्शन कर रहे हैं और मिसिंग बलूच नागरिकों के साथ न्याय करने की मांग कर रहे हैं। संभवतः यह दुनिया का सबसे लंबा धरना-प्रदर्शन है। वीबीएमपी 2009 से लापता बलूच के मामले को आगे बढ़ा रहा है। धरने में शामिल सीमा बलूच 'द बलूच पोस्ट' के पत्रकार के साथ बातचीत में कहती हैं, "मेरा भाई शाबिर बलूच गोरकोप में सैन्य कार्रवाई में 4 अक्टूबर 2016 को अगवा कर लिया गया था। उसी दिन सेना ने 36 और लोगों को उठा लिया था। उनमें से कुछ लोगों को एक दो दिन में छोड़ दिया गया, लेकिन मेरा भाई अभी तक नहीं लौटा है। हमारे पास पक्का सबूत है कि हमारे भाई को पैरा मिलिटरी फोर्स फ्रंटियर कोर (एफसी) ने अगवा किया है। साबिर की पत्नी और दूसरे स्थानीय लोग इस घटना के चश्मदीद हैं।" सीमा पिछले दो साल से अपने भाई को मुक्त कराने के लिए संघर्ष कर रही हैं।
बलूचिस्तान पाकिस्तान का सबसे बड़ा राज्य है जो लगभग 44 फ़ीसदी हिस्से को कवर करता है ।
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क्या है पृथक बलूचिस्तान आंदोलन
पृथक बलूचिस्तान आंदोलन का लंबा इतिहास रहा है। दरअसल, बलूचिस्तान पाकिस्तान का सबसे बड़ा राज्य है जो लगभग 44 फ़ीसदी हिस्से को कवर करता है । इस इलाके की आबादी तकरीबन 1.3 करोड़ है, जो पाक की आबादी का महज 7 फ़ीसदी है। यहां रहने वाले लोगों को बलूच कहा जाता है। यह सबसे ग़रीब और उपेक्षित इलाक़ा भी है। कई इलाके के लोगों का आज भी बाहरी दुनिया से ताल्लुकात नहीं है। पाकिस्तान ने हाल के दिनों में अपनी परियोजनाओं के लिए बाहर से लोगों को लाकर यहां बसाने की नीति शुरू की है। उनकी दलील है कि बलूच आबादी में साक्षरता दर बेहद कम होने और हुनरमंद लोगों की कमी की वजह से ऐसा करना जरूरी है।मगर बलूच राष्ट्रवादियों को शंका है कि उन्हें कई इलाकों में अल्पसंख्यक बना देने और प्राकृतिक संसाधनों के दोहन के लिए पाकिस्तानी सरकार यह खेल खेल रही है।
बलूचिस्तान को ‘ब्लैक पर्ल’ या ‘काला मोती’ भी कहा जाता है।
बलूचिस्तान को ‘ब्लैक पर्ल’ या ‘काला मोती’ भी कहा जाता है। तेल, गैस, तांबे और सोने जैसी प्राकृतिक संपदाओं की यहां भरमार है। इसी पर चीन की नज़र है, जिसका स्थानीय लोग पुरज़ोर विरोध कर रहे हैं। विरोध का स्वर तेज़ करने के लिए बलूच राष्ट्रवादियों के संगठन बलूचिस्तान लिबरेशन आर्मी ने कराची में चीनी वाणिज्य दूतावास पर पिछले साल 23 नवंबर को हमला किया था। हमले के बाद पाक सेना का बलूचिस्तान में "मिशन टॉर्चर" का मुद्दा विश्व स्तर पर सुर्खियों में आ गया।
हमले की जिम्मेदारी लेते हुए बलूचिस्तान लिबरेशन आर्मी ने दावा किया कि चीन-पाकिस्तान इकोनॉमिक कॉरीडोर के जरिए फैलते "चीनी कब्जे" के खिलाफ उनका संगठन ऐसी कार्रवाई करता रहेगा। संगठन मानता है कि चीन "बलूचिस्तान की खनिज संपदा का दोहन करते हुए बलूच क्षेत्र पर कब्ज़ा" करना चाहता है।
वस्तुतः आज़ादी के बाद से ही बलूच जनता राज्य के धन और प्राकृतिक संसाधनों में अपने हिस्से से वंचित कर रही है। जिया-उल-हक शासन के बाद पाकिस्तान में लोकतंत्र की बहाली की प्रक्रिया होने पर बलूच अलग-थलग रखे गए। अब बलूच लोग, ख़ास कर नई पीढ़ी समझ गई है कि इस्लामाबाद झूठा वादा और विश्वासघात कर रहा है। असंतोष के चलते बलूचिस्तान का मसला अचानक सुषुप्तावस्था से जाग गया है और बलूच राष्ट्र की मांग तेज़ हो गई है।
भारत से है बलूच नेताओं को आस
बहरहाल, विदेशों में पनाह लेने वाले बलूच नेता भारत की ओर हसरत भरी नजर से देखते हैं, कि यह मुल्क उनके लिए कुछ करेगा। दरअसल, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जब लाल किले से दिए गए अपने भाषण में बलूचिस्तान में पाकिस्तान सेना के अत्याचार का जिक्र किया तो बलूच लोगों को उम्मीद बंधी थी कि भारत अंतरराष्ट्रीय मंच पर पाकिस्तानी सेना के अत्याचार और मानवाधिकार के उल्लंघन का मामला उठाएगा क्योंकि बलूचिस्तान इंटरनेशनल सपोर्ट हासिल करने के लिए लंबे समय से कोशिश कर रहा है।
मोदी दुनिया में अकेले ऐसे प्रधानमंत्री हैं जिन्होंने बलूचिस्तान और वहां के संघर्ष पर बात की है, लेकिन भारत ने अभी तक ऐसा कुछ नहीं किया। भारत ने बलूचिस्तान के मुद्दे को आधिकारिक नीति के रूप में कभी उठाया ही नहीं। मोदी का बलूचिस्तान का जिक्र करना सिर्फ पाकिस्तान को परेशान करने का एक तरीका था। इसलिए भारत आगे कुछ करेगा, इस बात की संभावना बहुत कम ही नज़र आ रही है।
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