यूं राजनीति में आजकल इस्तीफे अमूमन कम ही होते हैं और किसी ढोंगी बाबा से संदिग्ध रिश्तों के कारण किसी महिला नेत्री के त्यागपत्र का संभवत: यह पहला मामला है। ऐसे में महाराष्ट्र में वहां की राज्य महिला आयोग की अध्यक्ष रूपाली चाकणकर के इस्तीफे का स्वागत इसलिए किया जाना चाहिए, क्योंकि यह इस्तीफा जिस कारण से इस्तीफा लिया गया है, वह हमारे समाज की संड़ाध का आईना है।
रूपाली चाकणकर पर आरोप है कि उनके महाराष्ट्र के एक ढोंगी बाबा ‘कैप्टन अशोक खरात’ के साथ संदिग्ध रिश्ते रहे हैं। खुद को ‘गॉडमैन’ और न्यूमरोलॉजिस्ट बताने वाले इस कथित बाबा को हाल में महाराष्ट्र पुलिस ने एक महिला को तीन साल तक नशीली दवाएं पिलाकर रेप करने तथा उसके पास से 58 अश्लील वीडियो बरामद होने के आरोप में गिरफ्तार किया है।
पुलिस को दी शिकायत में पीड़िता ने कहा कि उसकी शादी के बाद 2022 में खरात ने उसे अपने कार्यालय में बुलाया और कहा कि महिला की ज्योतिषीय गणना उसके पति के जीवन को खतरे की ओर इशारा करती हैं। इससे बचने के लिए कुछ अनुष्ठान करने की आवश्यकता है।
महिला के अनुसार खरात ने उसे बेहोशी की दवा मिला पेय पिला कर दुष्कर्म किया। वह तीन साल तक उसका यौन उत्पीड़न करता रहा। इसी बीच खुलासा हुआ कि इस फर्जी के बाबा के समर्पित भक्तों में रूपाली चाकणकर भी हैं। कहा जाता है कि रूपाली और उनके कारोबारी पति ने हाल में बाबा के कहने पर एक तांत्रिक अनुष्ठान भी किया, जिसके लिए जरूरी रक्त रूपाली ने अपनी अनामिका को काट कर दिया।
रूपाली एक पढ़ी-लिखी महिला हैं और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी की महिला राज्य इकाई की भी अध्यक्ष भी हैं। वो राजनीतिक परिवार से हैं। उनकी सास भी पूर्व में राकांपा से पार्षद रहीं हैं। लेकिन रूपाली ने भी राजनीति में आगे बढ़ने के लिए ढोंगी बाबा का सहारा लिया।
फर्जी साधुओं और ढोंगी बाबा का फैला जाल
रूपाली तो एक उदाहरण हैं। इस देश में कई राजनेता फर्जी साधुओं और ढोंगी बाबा के जाल में बुरी तरह उलझे हैं। गहराई से पड़ताल करें तो तकरीबन हर पार्टी में दस-बीस चेहरे आप को मिल जाएंगे, जो अपने राजनीतिक, व्यावसायिक अथवा सत्ता स्वार्थों को पूरा करने के लिए ऐसे ढोंगी बाबाओं की शरण में हैं और उन पर पैसा लुटाते हैं।
कुछ यह काम खुलेआम करते हैं तो कई चोरी छिपे। ऐसे में सवाल यह उठता है कि यह देश आगे जा रहा है या पीछे? वैसे भी इस मुल्क में आजादी के बाद जो धंधा सबसे ज्यादा फला-फूला है, वो बाबाओं और साधुओं का है।
इनमें से ज्यादातर तो वो हैं, जिनकी न कोई धार्मिक वैधता है और न ही जिनके पास कोई गहरा धार्मिक ज्ञान है, लेकिन वो लोगों की भावनाओं और मजबूरियों का शोषण करने में पीएचडी से भी ज्यादा योग्यता रखते हैं। खास बात ये कि इस धंधे में कभी मंदी नहीं आती, क्योंकि यहां लाखों लोग आस्था के नाम पर मूर्ख बनने और अपना सब कुछ गंवाने के लिए उधार बैठे हैं।
यूं भी आजकल ढोंगी (और कई असली भी!) बाबाओं का धंधा चमकाने और राजनेताओं को अपनी दुकान चलाते रहने के लिए ऐसे बाबाओं का आश्रय लेना जरूरी लगता है। ये रिश्ता परस्परपूरक है। राजनेताओं की दिलचस्पी बाबा की सिद्धी और साधना से ज्यादा उसके भीड़ जुटाने के कौशल में रहती है तो बाबा राजनेताओं से इसलिए वैधता चाहते हैं कि इससे उनके धंधे को सुरक्षा कवच और विस्तार मिल जाता है।
राजनेता किसी सत्तारूढ़ पार्टी से जुड़ा हो तो और अच्छा तथा ऐसे किसी बाबा का किसी धर्मस्थल पर कब्जा हो तो सोने में सुहागा। क्योंकि इससे आम श्रद्धालु के मन की रही सही शंका भी दफन हो जाती है और बाबा के हर कृत्य को वह ‘गौमाता के पवित्र’ भाव से देखता है, भले ही उसकी भीतरी तस्वीर कितनी ही गंदी क्यों न हो।