कर्नाटक में दस साल पहले वर्ष 2015 में जाति जनगणना कराई गई थी। लेकिन इसमें लंबा समय लगा और उसके नतीजे सत्तारूढ़ पार्टी की उम्मीदों के अनुरूप नहीं रहे थे। इसी वजह से लंबे समय बाद बीते साल इसकी रिपोर्ट सरकार को पेश की गई थी। लेकिन इस साल की शुरुआत में रिपोर्ट के कुछ हिस्से लीक होने के बाद राज्य में राजनीतिक और सामाजिक संतुलन गड़बड़ाने लगा था। पहले की रिपोर्ट पर परदा डालने और सत्ता संतुलन साधने के लिए सिद्धारमैया सरकार ने नए सिरे से जाति जनगणना का फैसला किया है।
यह कवायद 22 सितंबर से सात अक्तूबर तक चलेगी। राज्य की सात करोड़ आबादी के लिए इस काम में 1.60 लाख सरकारी कर्मचारियों को लगाया जाएगा। इसकी रिपोर्ट नवंबर के पहले सप्ताह के दौरान आ जाएगी।
इससे पहले सिद्धारमैया के पहले कार्यकाल में वर्ष 2015 में हुई जनगणना रिपोर्ट पिछड़ा आयोग के अध्यक्ष एच।के।कंथराज के नेतृत्व में तैयार की गई थी। लेकिन उसके बाद यह ठंढे बस्ते में पड़ी रही। सिद्धारमैया के दूसरी बार सत्ता में आने के बाद आयोग के तत्कालीन अध्यक्ष के। जयप्रकाश हेगड़े की अध्यक्षता वाली एक समिति ने उस रिपोर्ट में संशोधन कर बीते साल अप्रैल में सरकार को सौंपा था। लेकिन वह रिपोर्ट शुरू से ही विवादों में घिर गई थी।
लेकिन सरकार ने पहले की रिपोर्ट के बावजूद आखिर नए सिरे से इस कवायद का फैसला क्यों किया?
मुख्यमंत्री सिद्धारमैया की दलील है कि विभिन्न जातियों के साथ होने वाले भेदभाव और असमानता को दूर करना ही ताजा कवायद का प्रमुख मकसद है। राज्य का अगला बजट भी इसी जनगणना रिपोर्ट के आधार पर तैयार किया जाएगा। ने बैठक के बाद कहा कि जातियों के साथ होने वाले भेदभाव को दूर करना सर्वेक्षण का मुख्य उद्देश्य है। उन्होंने यह भी कहा कि यह सर्वेक्षण पूरे देश के लिए एक उदाहरण होना चाहिए। अगला बजट इसी सर्वेक्षण के आधार पर बनेगा।
लेकिन परदे के पीछे की हकीकत कुछ और है। आमतौर पर माना जाता है कि राज्य में लिंगायत और वोक्कालिगा समुदाय की आबादी ज्यादा है और राजनीति में भी यह दोनों निर्णायक स्थिति में हैं। लेकिन पहली रिपोर्ट में इन समुदायों की आबादी कम बताई गई थी। इसलिए इन समुदायों के विधायकों मने रिपोर्ट के खिलाफ बगावत कर दी थी। इन दोनों के अलावा ब्राह्मण समुदाय में इस रिपोर्ट से काफी नाराजगी थी।
इसके लिए पहले राजनीतिक समीकरणों और इसमें दोनों तबकों यानी लिंगायत और वोक्कालिगा की भागीदारी को समझना जरूरी है। राज्य की 224 सदस्यीय विधानसभा में लिंगायत और वोक्कालिगा समुदाय से इस समय 99 विधायक हैं। इनमें सत्तारुढ़ पार्टी यानी कांग्रेस के क्रमशः 34 (लिंगायत) और 23 (वोक्कालिगा) यानी 58 विधायक हैं।
विधानसभा में कांग्रेस के कुल 138 विधायक हैं। ऐसे में इन विधायकों उनकी नाराजगी सरकार के लिए भारी पड़ सकती है। पिछली रिपोर्ट में वोक्कालिगा समुदाय राज्य में चौथे नंबर पर आ गया था। मौजूदा उपमुख्यमंत्री डी।के।शिवकुमार, जिनको मुख्यमंत्री पद का दावेदार माना जाता है, इसी समुदाय के हैं।
उस रिपोर्ट में कर्नाटक की कुल आबादी में 70 फीसदी अन्य पिछड़ी जातियों के शामिल होने के कारण उनके लिए 51 फीसदी आरक्षण की सिफारिश की गई थी। इसके अलावा वोक्कालिगा और लिंगायत समुदायों की आबादी 10 से 11 फीसदी के बीच बताया गया था। इससे दोनों तबकों में नाराजगी भड़क उठी थी। उन्होंने नए सिरे से सर्वेक्षण या जनगणना कराने की मांग उठाई।