तेजस्वी को भले ही राजनीति विरासत में मिली, परंतु राह बहुत मुश्किल थी
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अब बात समानताओं की। तेजस्वी को भले ही राजनीति विरासत में मिली, परंतु राह बहुत मुश्किल थी। वे राजनीति में तब सक्रिय हुए जब उनके पिता लालू प्रसाद को चारा घोटाला मामले में सजायाफ्ता करार दे दिया गया। एक समय लगा था जैसे राजद अब अस्तित्वहीन हो जाएगी। लेकिन तेजस्वी ने पार्टी की कमान संभाली और न केवल पार्टी को टूटने से बचाया बल्कि 2015 में इस लायक बनाया कि वह सत्ता में शामिल हो सके।
तेजस्वी की मुश्किलें सत्ता में आने के बावजूद खत्म नहीं हुईं। पिता के जेल में रहने के कारण उन्हें एक तरफ नीतीश कुमार की राजनीति का सामना भी करना पड़ रहा था और दूसरी तरफ खुद को साबित करने की चुनौती भी थी। फिर वह समय भी आया जब तेजस्वी एक परिपक्व राजनेता के रूप में उभरने लगे। लेकिन इससे पहले ही नीतीश कुमार ने उन्हें सत्ता से बेदखल कर दिया।
कन्हैया की बात करें तो उनके सामने भी चुनौतियां कम नहीं हैं। केंद्र सरकार से सीधे टकराने से लेकर संसदीय राजनीति में अपने लिए जगह बनाना आसान काम नहीं है। उनके पास वामपंथ जो कि बिहार में लगभग असरहीन साबित हो चुका है, उसे न सिर्फ जिंदा करने की चुनौती है बल्कि उसे अपने पैरों पर खड़ा भी करना है।
दोनों में एक समानता यह भी है कि दोनों कहीं न कहीं अपनी जातिगत पृष्ठभूमि को अपना आधार मानते हैं। तेजस्वी यादव ने तो खुलकर ओबीसी कार्ड खेला है। वहीं कन्हैया भूमिहार कार्ड खेल रहे हैं। वे बेगूसराय से चुनाव लड़ रहे हैं। तेजस्वी ने उनके खिलाफ अपने अनुभवी तनवीर हसन को मैदान में खड़ा किया है।
बहरहाल, कन्हैया और तेजस्वी में कौन बेहतर राजनेता साबित होंगे, यह तो आने वाला वक्त ही बताएगा। दोनों अभी युवा हैं और दोनों के सामने लंबा जीवन शेष है।
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