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लोकसभा चुनाव में चर्चा में आए बिहार के ये दो लड़के, इन पर है पूरे देश की निगाहें

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बिहार की राजनीति में इन दिनों जिन दो युवाओं की सबसे अधिक चर्चा है, - फोटो : कन्हैया के ट्विटर अकाउंट से
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बिहार की राजनीति में इन दिनों जिन दो युवाओं की सबसे अधिक चर्चा है, वे तेजस्वी यादव और कन्हैया कुमार हैं। तेजस्वी राजद प्रमुख लालू प्रसाद के सबसे छोटे बेटे हैं। 2015 के विधानसभा चुनाव में राघोपुर जो कि उनके पिता की परंपरागत सीट थी से निर्वाचित होने के साथ ही उन्हें उपमुख्यमंत्री बनने का मौका मिला। हालांकि बाद में जब आईआरसीटीसी होटल मामले में उनके खिलाफ मामला दर्ज कराया गया तब नीतीश कुमार ने भ्रष्टाचार का आरोप लगाते हुए न केवल गठबंधन तोड़ लिया बल्कि भाजपा के साथ मिलकर रातों-रात सरकार बना ली।

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दूसरे युवा कन्हैया कुमार हैं। जेएनयू में आजादी का गीत गाने वाले कन्हैया ने तब खूब चर्चा बटोरी जब उन्हें देशद्रोह के मामले में अभियुक्त बनाया गया। कन्हैया ने अपनी राजनीति रोहित वेमूला के द्वारा आत्महत्या किए जाने के बाद शुरू की। यह उनका लांचिंग पैड बना। दोनों युवाओं में कई सारी समानताएं हैं। वहीं भिन्नताएं भी बहुत हैं। मसलन कन्हैया जेएनयू से स्नातक हैं तो तेजस्वी कागजी तौर पर मैट्रिक भी पास नहीं हैं। कन्हैया गरीब भूमिहार परिवार से आते हैं। जबकि तेजस्वी लालू प्रसाद यादव के सबसे छोटे बेटे हैं। 

तेजस्वी को भले ही राजनीति विरासत में मिली, परंतु राह बहुत मुश्किल थी - फोटो : फाइल फोटो
अब बात समानताओं की। तेजस्वी को भले ही राजनीति विरासत में मिली, परंतु राह बहुत मुश्किल थी। वे राजनीति में तब सक्रिय हुए जब उनके पिता लालू प्रसाद को चारा घोटाला मामले में सजायाफ्ता करार दे दिया गया। एक समय लगा था जैसे राजद अब अस्तित्वहीन हो जाएगी। लेकिन तेजस्वी ने पार्टी की कमान संभाली और न केवल पार्टी को टूटने से बचाया बल्कि 2015 में इस लायक बनाया कि वह सत्ता में शामिल हो सके।

तेजस्वी की मुश्किलें सत्ता में आने के बावजूद खत्म नहीं हुईं। पिता के जेल में रहने के कारण उन्हें एक तरफ नीतीश कुमार की राजनीति का सामना भी करना पड़ रहा था और दूसरी तरफ खुद को साबित करने की चुनौती भी थी। फिर वह समय भी आया जब तेजस्वी एक परिपक्व राजनेता के रूप में उभरने लगे। लेकिन इससे पहले ही नीतीश कुमार ने उन्हें सत्ता से बेदखल कर दिया।
 
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कन्हैया कुमार - फोटो : social media
कन्हैया की बात करें तो उनके सामने भी चुनौतियां कम नहीं हैं। केंद्र सरकार से सीधे टकराने से लेकर संसदीय राजनीति में अपने लिए जगह बनाना आसान काम नहीं है। उनके पास वामपंथ जो कि बिहार में लगभग असरहीन साबित हो चुका है, उसे न सिर्फ जिंदा करने की चुनौती है बल्कि उसे अपने पैरों पर खड़ा भी करना है।

दोनों में एक समानता यह भी है कि दोनों कहीं न कहीं अपनी जातिगत पृष्ठभूमि को अपना आधार मानते हैं। तेजस्वी यादव ने तो खुलकर ओबीसी कार्ड खेला है। वहीं कन्हैया भूमिहार कार्ड खेल रहे हैं। वे बेगूसराय से चुनाव लड़ रहे हैं। तेजस्वी ने उनके खिलाफ अपने अनुभवी तनवीर हसन को मैदान में खड़ा किया है।

बहरहाल, कन्हैया और तेजस्वी में कौन बेहतर राजनेता साबित होंगे, यह तो आने वाला वक्त ही बताएगा। दोनों अभी युवा हैं और दोनों के सामने लंबा जीवन शेष है।
 

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण) : यह लेखक के निजी विचार हैं. आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है. आप भी अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं. लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें.

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