झारखंड में जनता ने स्थानीय मुद्दों पर भाजपा को विफल करार दिया।
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हिंदू-मुस्लिम ध्रुवीकरण में भी विफल रही भाजपा
दरअसल, चुनाव प्रचार के दौरान भाजपा ने हिंदू-मुस्लिम ध्रुवीकरण पर भी जोर दिया। तीसरे चरण के चुनाव से ठीक पहले नागरिकता संशोधन कानून संसद में पारित हुआ था। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने चुनाव प्रचार में इसे मुद्दा बनाया। उधऱ भाजपा के दूसरे नेताओं ने चुनाव प्रचार में भव्य राम मंदिर की खूब बात की। बता दें कि झारखंड राज्य में 15 प्रतिशत के करीब अल्पसंख्यक है। पहले भी झारखंड के कई इलाके हिंदू-मुस्लिम हिंसा के चलते सुर्खियों में रहे हैं।
इधर, राज्य के कई गैर आदिवासी इलाके खासकर शहरी इलाके हिंदू मुस्लिम तनाव के लिए जाने जाते रहे हैं। लेकिन भाजपा को हिंदू मुस्लिम ध्रुवीकरण कराने में सफलता नहीं मिली। लोगों ने स्थानीय मूलभूत मुद्दों पर वोट किया है। भाजपा हाईकमान को अब सोचना होगा कि आखिर कितनी देर तक राम मंदिर, धारा 370 के आधार पर भाजपा चुनाव लड़ेगी ? क्योंकि राज्य के कुछ वे विधानसभा सीटें भी भाजपा के हाथ से निकलती दिख रही है जहां हिंदू-मुस्लिम ध्रुवीकरण की संभावना अक्सर रहती है।
मुख्य मुद्दों पर भाजपा ने ध्यान नहीं दिया
झारखंड के लोग गरीब हैं, जबकि राज्य संसाधनों में अमीर है। झारखंड राज्य का गठन आदिवासियों की मांग पर किया गया था। झारखंड गठन के बाद राज्य में आदिवासी मुख्यमंत्री बनते रहे। इसमें बाबू लाल मरांडी, अर्जुन मुंडा जैसे लोग भाजपा सरकारों में मुख्यमंत्री बनते रहे। लेकिन भाजपा ने 2014 में एक नया प्रयोग करते हुए झारखंड में गैर आदिवासी रघुवर दास की ताजपोशी मुख्यमंत्री के तौर पर कर दी। इससे राज्य की आदिवासी जनता में भारी नाराजगी थी।
रघुवर दास के कार्यकाल में आदिवासियों के जल जंगल और जमीन को लेकर आंदोलन हुआ। आदिवासियों ने अपनी जमीनों को बचाने के लिए संघर्ष किया। रघुवर दास के कार्यकाल में पत्थलढ़ी मूवमेंट ने राज्य में जोर पकड़ा। पत्थलगड़ी आंदोलन ने आदिवासियों को लामबंद किया। ग्रामसभा को ज्यादा ताकत देने की मांग की गई। लेकिन भाजपा ने इस पर ध्यान नहीं दिया। भाजपा को उम्मीद थी कि राष्ट्रवादी मुद्दे तमाम स्थानीय मुद्दों पर भारी पड़ेंगे। लेकिन भाजपा फिर एक बार झटका खा गई।
सरयू राय का विद्रोह भी महंगा प़ड़ा
भाजपा को अपने ही पुराने दिग्गज सरयू राय का विद्रोह महंगा पड़ा। इसके लिए भाजपा हाईकमान भी दोषी हैं। सरयू राय झारखंड ही नहीं संयुक्त बिहार में भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई के अगुवा रहे। लालू यादव को चारा घोटाले में जेल भेजने में उनकी अहम भूमिका रही है। रघुवर दास सरकार मे सरयू राय मंत्री थे। लेकिन उन्हें नजरअंदाज किया गया। मुख्यमंत्री रघुवर दास से उनकी नहींं बनी। भाजपा हाईकमान ने भी उनकी नहीं सुनी। सरयू राय का टिकट भी हाईकमान जल्दी से घोषित नहीं कर रहा था।
सरयू राय लगातार रघुवर सरकार पर भ्रष्टाचार को पोषित करने का आरोप लगा रहे थे। उनकी नाराजगी राज्य के कुछ भ्रष्ट नौकरशाहों से भी थी। लेकिन रघुवर दास उनकी सुन नहीं रहे थे। अंत में सरयू राय ने भाजपा ही छोड़ दिया। रघुवर दास के खिलाफ ही मोर्चा खोल बैठे। अब खबर आ रही है कि मुख्यमंत्री रघुवर दास खुद सरयू राय से चुनाव हार सकते हैं। अब भाजपा हाईकमान को भी सोचना होगा कि सरयू राय जैसे नेताओं को नजर अंदाज करना कितना वाजिब था?
दरअसल सरयू राय को किनारे लगाने में अकेले रघुवर दास की भूमिका नहीं थी। भाजपा हाईकमान ने भी सरयू राय को नजर अंदाज किया। इसके पीछे राज्य के कुछ ताकतवर नौकरशाह थे, जिनकी नजदीकी भाजपा हाईकमान से थी।
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