झांसी की घटना में अब तक जो लापरवाही सामने आ रही है, वो बेहद गंभीर है। जब आग वॉर्ड में फैल रही थी, तब वॉर्ड ब्वॉय ने अग्निशमन यंत्र (फायर एक्सट्विंगशर) चलाया, लेकिन वो काम नहीं कर रहा था, क्योंकि उसे एक्सपायर हुए चार साल बीत चुके थे। भारत सरकार की स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रोसीजर (एसओपी) पर अगर ध्यान दें तो उसमें स्पष्ट दिशा-निर्देश हैं। एसओपी के अनुसार अग्निशमन यंत्र का मासिक आधार पर निरीक्षण किया जाना चाहिए। सालाना निरीक्षण किसी पेशेवर द्वारा कराया जाना चाहिए। अग्निशमन यंत्रों के चयन, स्थापना, रख-रखाव के लिए भारतीय मानक 2190 का पालन करना आवश्यक है, क्योंकि प्रत्येक अग्निशमन यंत्र को आग के प्रकार के आधार पर चिन्हित किया जाता है। ऐसे और भी दिशा-निर्देश एसओपी में दिए गए हैं।
स्पष्ट है कि भारत सरकार के बने दिशा-निर्देशों का पालन झांसी के अस्पताल में नहीं हो रहा था। यदि केंद्र सरकार देशभर में अस्पतालों में फायर ऑडिट कराए तो उत्तर प्रदेश ही नहीं, अन्य राज्यों के अस्पतालों भी की पोल खुल जाएगी। भले वो सरकारी हों या निजी अस्पताल। अग्निशमन यंत्रों के साथ बिजली उपकरणों का ऑडिट भी आवश्यक है, क्योंकि आग लगने की घटना के पीछे सबसे बड़ा कारण शॉर्ट सर्किट ही निकाल कर आता है। झांसी के केस में भी ऑक्सीजन कंसंट्रेटर में स्पार्किंग हुई और फिर धमाके से आग फैली।
घटना के चंद घंटों में झांसी पहुंचे उत्तर प्रदेश के उप मुख्यमंत्री बृजेश पाठक ने स्वास्थ्य विभाग, पुलिस और मजिस्ट्रेट से जांच की बात कही है। पाठक कह रहे हैं कि अगर कोई चूक पाई जाती है तो जिम्मेदारों पर कड़ी कार्रवाई होगी। अब यह देखना होगा कि अग्निशमन यंत्रों के रख-रखाव के लिए जिम्मेदार असली व्यक्ति पर सरकार की कार्रवाई कब तक होती है?
उत्तर प्रदेश में चार दिन बाद यानी 20 नंवबर को 10 सीटों पर विधानसभा उप चुनाव भी हैं तो इस घटना से राजनीति भी गरमा गई है। विपक्ष प्रदेश की योगी आदित्यनाथ सरकार पर हमलावर है, लेकिन यह समय राजनीति से ज्यादा एकजुटता का होना चाहिए। केवल एक राज्य सरकार की बात नहीं है। पक्ष-विपक्ष की सरकारों को एकमत होकर कड़े नियम बनवाने और लागू कराने की जरूरत है, ताकि आए दिन ऐसे हादसों की पुनरावृत्ति न हो।
जिन 10 बच्चों की जान गई है, वो देश का भविष्य थे। उन नवजातों का क्या कसूर था? सिस्टम की लापरवाही ने उनकी जान ले ली। अब यह सरकार का दायित्व है कि वो केवल जांच के नाम पर मामले खींचने के बजाय न केवल दोषियों को सजा दे, बल्कि ऐसा संदेश भी जाए, जिससे लापरवाह सिस्टम जागे। एक और झांसी देश या प्रदेश में न बने।
डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।