फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

जीवन धारा: सबसे बड़ा चमत्कार है अपनी आदतों को बदलना, और इसका सूत्र है आत्म आलोचना

Mon, 17 Mar 2025 07:25 AM IST
शुभम कुमार आचार्य महाप्रज्ञ

सार

व्यक्ति जितना अपने-आप को समझ सकता है, दूसरा उसे बीस प्रतिशत से ज्यादा नहीं समझ सकता। आदत को बदलने का सबसे पहला सूत्र है आत्म आलोचना यानी स्वयं का निरीक्षण करना।
 
विज्ञापन
जीवन धारा - फोटो : अमर उजाला
विज्ञापन

विस्तार
वॉट्सऐप चैनल फॉलो करें

पुरानी आदत को बदलना और नई आदत डालना मुश्किल है। दोनों कठिन काम हैं। आदत बदलने के लिए बहुत शक्ति चाहिए। सामान्य प्रयत्न से न तो किसी आदत का निर्माण किया जा सकता है और न पुरानी आदत को बदला जा सकता है। उसके लिए एक प्रक्रिया की जरूरत है। उस प्रक्रिया का पहला अंग है- आलोचना-अपने आपको देखना। जो अपनी आदत को देखता ही नहीं, उसे बदलने की बात ही कहां उठेगी। जिसने अपनी आदत को देखना सीख लिया, वह चाहे, तो उसे बदलने के लिए पहला चरण उठा सकता है। आत्म आलोचना से व्यक्ति छोटी, बड़ी, सूक्ष्म और स्थूल - सभी प्रवृत्तियों को देखता है। जो दूसरे का जजमेंट होता है, वह अस्सी प्रतिशत गलत होता है, बीस प्रतिशत ही सही हो सकता है। हर व्यक्ति अपने भाव जगत में जीता है और दूसरा केवल उसका व्यवहार पकड़ता है। भाव जगत में जीने वाला व्यक्ति जैसा व्यवहार करता है, वैसा दूसरा कैसे कर सकता है? व्यवहार के आधार पर सही निर्णय नहीं किया जा सकता है। एक व्यवहार दो हेतुओं से भी उत्पन्न हो सकता है। आचरण के पीछे दो कारण हो सकते हैं। एक व्यवहार के पीछे मारने का कारण भी हो सकता है और जिलाने का भी। जिलाना चाहता है, पर व्यवहार वह मारने वाला कर रहा है। मारना चाहता है, पर व्यवहार वह जिलाने वाला कर रहा है। व्यवहार दोनों के समान, किंतु हेतु दोनों के बिल्कुल भिन्न हैं। डॉक्टर ऑपरेशन करता है, चाकू चलाता है। यह व्यवहार कोई अच्छा नहीं लगता है, किंतु इसके जो प्रेरक तत्व हैं, वे बहुत अच्छे हैं। डॉक्टर उसे स्वस्थ एवं दीर्घायु बनाना चाहता है। वही चाकू दूसरा आदमी चलाता है, छुरा घोंपता है और पेट फाड़ कर किसी व्यक्ति को मार डालता है। डॉक्टर ने भी छुरा चलाया और उस व्यक्ति ने भी छुरा चलाया। एक ही क्रिया है, पर उसके दो अर्थ हो जाते हैं। एक ने छूरा चलाया जीवन के लिए और दूसरे ने छुरा चलाया जीवन-हरण के लिए। व्यवहार के आधार पर किसी भी व्यक्ति की व्याख्या नहीं की जा सकती है। हमारी व्याख्या का मूल सूत्र है भाव जगत। कहां जी रहा है, किस भाव में जी रहा है? अपूर्णदृष्टि वाला आदमी व्यवहार में जीता है और व्यवहार के आधार पर आदमी को अच्छा या बुरा बताता है। किंतु आलोचना करने वाला व्यक्ति स्थूल बात को नहीं पकड़ेगा, वह सूक्ष्म बात तक जाएगा। इसलिए यह कहना मुझे बहुत पसंद है कि व्यक्ति जितना अपने आप को समझ सकता है, दूसरा उसे बीस प्रतिशत से ज्यादा नहीं समझ सकता। जो आदमी अपनी आलोचना करता है, अपने आपको देखता है, वह अपने आपको जिस तरह समझ सकता है, दूसरा कभी नहीं समझ सकता। आदत को बदलने का सबसे पहला सूत्र है आत्म आलोचना, अपने आप को देखना, अपने आपका निरीक्षण करना, अपनी आदतों, प्रवृत्तियों और व्यवहार का निरीक्षण करना। जब आलोचना होती है, तब सारे भावों और व्यवहारों का साक्षात्कार होता है और तब परिवर्तन की बात आती है। दुनिया का सबसे बड़ा चमत्कार है अपनी आदतों को बदलना। इससे बड़ा कोई दिखा ही नहीं सकता और जो व्यक्ति अपनी आदत को बदल देता है, वह दुनिया का सबसे बड़ा चमत्कारी है।
विज्ञापन


सूत्र- स्वयं को जानें
कोई किसी को नहीं बदल सकता है। आपके भीतर प्रेक्षा का भाव नहीं है, तो आप नहीं बदल सकते। प्रेक्षाध्यान का मर्म है-अपने आपको देखना। जीवन में सफलता, खुशी और प्रेम चाहिए, तो सबसे जरूरी है, स्वयं को जानना। इसके बाद ही आप एक बेहतर इन्सान बन सकते हैं।
विज्ञापन
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें