दुख देख कर मनुष्य सहज ही पूछता है- ऐसा मेरे साथ ही क्यों हुआ? मैंने ऐसा क्या किया था कि मुझे यह पीड़ा सहनी पड़ी? जब जीवन हमारी इच्छाओं के अनुसार नहीं चलता, जब कोई प्रिय व्यक्ति हमसे दूर हो जाता है, जब परिश्रम के बाद भी सफलता नहीं मिलती, जब बीमारी या असफलता हमारे दरवाजे आ खड़ा होता है, तब हमें लगता है कि जीवन हमारे विरुद्ध हो गया है। पर दुख को केवल इस दृष्टि से ही देखना उसके गहरे अर्थ को न देखना है। दुख जीवन का अंतिम सत्य नहीं है। वह मनुष्य की चेतना को एक सीमित घेरे से बाहर निकालने वाली शक्ति भी हो सकता है। जिस प्रकार धरती के भीतर दबा बीज अंधकार व दबाव को सह कर ही अंकुर बनता है, उसी प्रकार मनुष्य की चेतना भी पीड़ा के दबाव में अपने भीतर छिपी किसी नई संभावना को जन्म देती है।
सुख में मनुष्य अपने वर्तमान स्वरूप से संतुष्ट रहता है। लेकिन दुख उसके सामने एक ऐसा प्रश्न रख देता है, जिससे बचना कठिन होता है और यह प्रश्न है- 'मैं वास्तव में कौन हूं?' और यहीं से भीतर की यात्रा शुरू हो सकती है। जब जीवन हमारी इच्छाओं को पूरा करता है, तब हम उससे यह नहीं पूछते कि 'मैं वास्तव में कौन हूं?'। हम जो चाहते हैं, उसे प्राप्त कर लेते हैं और समझते हैं कि यही सुख है। लेकिन जब हमारी इच्छा और वास्तविकता के बीच दूरी बनने लगती है, तब मन का निर्मित संसार टूटने लगता है। और कभी-कभी इसी टूटने में एक बड़ा द्वार खुलता है।दुख हमें यह दिखा सकता है कि जिस पर हम अपना जीवन टिकाए हुए थे, वह कितना अस्थायी था। हम धन को स्थायी मानते थे, लेकिन एक दिन वह चला गया। हम रिश्तों को स्थायी मानते थे, एक दिन वे बदल गए। ऐसे में मनुष्य के सामने पहली बार यह संभावना आती है कि शायद मैं वह नहीं हूं, जिसे अब तक अपना 'मैं' समझ बैठा था। दो मनुष्य एक ही दुख से गुजर सकते हैं, लेकिन दोनों की यात्राएं बिल्कुल अलग हो सकती हैं। एक व्यक्ति पीड़ा से कठोर हो सकता है, तो दूसरा करुणामय बन सकता है। एक व्यक्ति संसार से घृणा करने लगेगा, तो दूसरा मनुष्य के दुख को और गहराई से समझने लगेगा। एक कहेगा- दुनिया ने मेरे साथ अन्याय किया, तो दूसरा धीरे-धीरे पूछेगा- क्या अब मैं दूसरों के दुख को पहले से अधिक समझ सकता हूं? यहीं पर दुख चेतना को विस्तृत करने लगता है। जिस मनुष्य ने स्वयं पीड़ा नहीं जानी, वह दूसरे के आंसू को केवल एक घटना की तरह देख सकता है। लेकिन जिसने अपने भीतर टूटने का अनुभव किया है, वह दूसरे की चुप्पी में भी दर्द सुन सकता है। और तभी करुणा जन्म लेती है। प्रकृति एक मूर्तिकार की तरह होती है। पत्थर पर चोट पड़ती है, तो पत्थर को लगता है कि उसे नष्ट किया जा रहा है। लेकिन मूर्तिकार जानता है कि हर चोट उस आकृति को प्रकट कर रही है, जो अभी पत्थर के भीतर छिपी है। मनुष्य भी ऐसा ही है। जीवन की कुछ चोटें हमें नष्ट करने नहीं, हमारे भीतर छिपे किसी बड़े मनुष्य को प्रकट करने आती हैं।
सूत्र: हर चोट को बुरा न समझें
जैसे बीज अंधकार और दबाव सहकर अंकुर बनता है, वैसे ही मनुष्य पीड़ा से गुजरकर अधिक मजबूत और संवेदनशील बन सकता है। कठिन समय हमें यह समझाता है कि धन, रिश्ते और सफलता स्थायी नहीं हैं। जब जीवन हमारी इच्छाओं के अनुसार नहीं चलता, तभी हम स्वयं को गहराई से जानना शुरू करते हैं। इसलिए हर चोट को बुरा न समझें।