लेकिन, जीवन की एक विचित्र बात है। वह आपको वह सब कुछ दे सकता है, जिसके लिए आप संघर्ष कर रहे हैं, किंतु इसके बावजूद, आपके भीतर एक खालीपन छोड़ सकता है। जब मैंने पहली बड़ी ट्रॉफी जीती, तो मुझे लगा था कि अब सब बदल जाएगा। सोचा था कि अब मुझे वह संतोष मिलेगा, जिसकी तलाश थी। लेकिन, हर जीत के उत्साह के कुछ समय बाद मैं फिर से एक उलझे हुए, बेचैन और भीतर से अधूरे व्यक्ति में तब्दील हो जाता था। धीरे-धीरे मुझे समझ आने लगा कि मैं केवल अपने प्रतिद्वंद्वी से नहीं लड़ रहा था, बल्कि मेरा सबसे कठिन मुकाबला तो खुद से ही हो रहा था। कई बार मुझे लगा कि मैं अपनी ही बनाई हुई छवि में कैद हो गया हूं। दुनिया मुझे ‘आंद्रे अगासी’ के रूप में जानती थी, जो एक टेनिस स्टार, एक चैंपियन है। पर, मैं खुद से पूछता था कि क्या यही मेरी पूरी पहचान है? यह सवाल मुझे परेशान करने लगता, क्योंकि किसी भी पहचान के साथ एक खतरा जुड़ा होता है। यदि हम स्वयं को केवल अपनी उपलब्धियों से परिभाषित करने लगें, तो हमारी आत्मा उन उपलब्धियों की गुलाम बन जाती है।
मैंने देखा कि हर जीत के बाद मुझे अगली जीत चाहिए होती थी। और यह दौड़ कभी खत्म नहीं होती। तब जीवन ने मुझे कुछ कठिन सबक भी सिखाए। उन दिनों में मैंने अपने बारे में सबसे अधिक सीखा। जब आपके पास सब कुछ होता है, तब स्वयं को जानना कठिन होता है। लेकिन, जब बहुत कुछ टूट जाता है, तब आप पहली बार अपने असली स्वरूप को देख पाते हैं। मैंने महसूस किया कि मैं केवल एक खिलाड़ी नहीं, एक मनुष्य भी हूं। यहीं से मेरी सबसे महत्वपूर्ण यात्रा शुरू हुई। मैंने स्वयं से ईमानदार होना सीखा। यह स्वीकारना सीखा कि मैं हमेशा मजबूत नहीं हूं। जब मैंने अपने मुखौटे उतारने शुरू किए, तभी मैं पहले से ज्यादा स्वतंत्र महसूस करने लगा। आज अगर कोई मुझसे पूछे कि मेरी सबसे बड़ी जीत कौन-सी थी, तो शायद मैं कहूंगा कि मेरी सबसे बड़ी जीत वह थी, जब मैंने खुद को स्वीकार किया। क्योंकि, अंततः शोहरत वक्त के साथ धुंधली पड़ जाती है। लेकिन, यदि आपने भीतर के सत्य को छू लिया, तो वह उपलब्धि कभी पुरानी नहीं होती।
-ऑटोबायोग्राफी ‘ओपन’ से