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जीवन धारा: सुख और दुख से परे है जीवन का रहस्य, अपनी सीमाओं को पहचानने का सूत्र अपनाएं

सार

मनुष्य की सबसे बड़ी क्षमता अपने विचारों की लगाम पकड़ने की है। यही शक्ति उसे सृष्टि में खास बनाती है, जो उसे आनंद और पीड़ा, दोनों से सीखने की योग्यता देती है।
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मेडिटेशन (सांकेतिक) - फोटो : अमर उजाला प्रिंट
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विस्तार
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अस्तित्व के सृष्टिकर्ता ने हमें केवल जीवन ही नहीं दिया, बल्कि उसे संभालने की अद्भुत क्षमता भी दी है। उन्होंने हमें ऐसा सामर्थ्य दिया है कि हम अपने शरीर के अंगों को अपनी इच्छा अनुसार नियंत्रित या स्थिर रख सकते हैं। इसी प्रकार हमारे मन को भी उन्होंने यह विलक्षण शक्ति प्रदान की है कि वह कल्पनाओं, विचारों और विषयों में से बेहतर का चयन कर सके। यह तय कर सके कि किस दिशा में विचार प्रवाहित होने चाहिए, किन विषयों की खोज में ध्यान और लगन लगाई जाए। यही मानसिक क्षमता हमें विचारों व कर्मों के बीच संतुलन बनाना सिखाती है। हमारे सृष्टिकर्ता ने बुद्धिमानी से हमारी संवेदनाओं और विचारों के साथ आनंद का संबंध जोड़ा है। यदि आनंद और अनुभवों का मिलन न होता, तो हमारे पास किसी विचार या क्रिया को श्रेष्ठ या तुच्छ ठहराने का कोई मापदंड न रहता, क्योंकि तुलना तथा निर्णय का आधार ही अनुभव और विचार हैं। 

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कल्पना कीजिए, यदि हम न अपने शरीर को काबू में करें, न ही अपने विचारों को दिशा दें, बल्कि मन को यूं ही बहने दें, जैसे कोई धारा बिना मार्ग के बहती चली जाए, तो हम एक निष्क्रिय, आलसी इन्सान बनकर अपने वक्त को लक्ष्यहीन सपने देखने और व्यर्थ निद्रा में गंवा देंगे। इसलिए, हमारे सृजनहार ने अत्यंत बुद्धिमानी से, अनेक वस्तुओं एवं उनसे उत्पन्न विचारों में आनंद की अनुभूति का तंतु पिरो दिया है, ताकि हमारी शक्तियां निष्क्रिय न पड़ी रहें, बल्कि सक्रिय होकर जीवन में उद्देश्य भरें। 

दर्द और सुख, दोनों ही समान रूप से महत्वपूर्ण हैं। हालांकि, हम प्रायः आनंद की खोज और पीड़ा से बचने के प्रयास में रहते हैं। फिर भी यह सत्य है कि दोनों का अस्तित्व एक-दूसरे से गहराई से जुड़ा है। जीवन में अक्सर वही वस्तुएं जो हमें आनंद देती हैं, कभी-कभी हमारे दर्द का कारण भी बनती हैं। यही हमारे रचयिता की दूरदर्शी बुद्धिमत्ता और करुणा का प्रमाण है, जिन्होंने हमारे कल्याण के लिए पीड़ा को चेतावनी का संकेत बनाया। यह योजना हमारे अस्तित्व की रक्षा के लिए गढ़ी गई है। उदाहरण के लिए, ऊष्मा जब तक संतुलित रहे, हमें सुख देती है, परंतु थोड़ा बढ़ जाने पर वही हमें पीड़ा भी देती है। ठीक वैसे ही प्रकाश, जो हमारी दृष्टि क्षमता के लिए बेहद जरूरी है, यदि तीव्रता में अपनी सीमा लांघ जाए, तो आंखों के लिए कष्टदायक बन जाता है। इसीलिए, प्रकृति ने इन सीमाओं का निर्धारण बेहद बुद्धिमानी से किया है, ताकि जब किसी वस्तु की अनुभूति अपनी क्षमता से अधिक होकर हमारे नाजुक अंगों को प्रभावित करे, तो दर्द हमें चेतावनी के रूप में मिले और हम समय रहते उससे खुद को बचा सकें। इस प्रकार, आनंद और पीड़ा, दोनों ही हमारे अस्तित्व के आवश्यक प्रहरी हैं-एक हमें आगे बढ़ने की प्रेरणा देता है, दूसरा हमें सुरक्षित रहने की सीख। यही संतुलन सृष्टिकर्ता की परम बुद्धिमत्ता का जीवंत प्रमाण है।
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सूत्र: अपनी सीमाओं को पहचानें
जीवन में हर सुख, हर अवसर, हर शक्ति तभी कल्याणकारी है, जब वह अपनी सीमा में रहे। इसलिए, अपनी सीमाओं को जानिए, उन्हें स्वीकारिए और उसी के अनुरूप योजना बनाते हुए आगे बढ़िए। यही समझ बुद्धिमत्ता कहलाती है, और यही संतुलन सफलता का सबसे गहरा रहस्य। सुख-दुख तो इन्सान की कल्पना मात्र हैं।

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