कुछ ऐसी स्मृतियां हैं, जो मेरे भीतर किसी तीखे कांटे की तरह चुभती हैं। समय बीत जाता है, पर मन पर अंकित ऐसे अनुभव मिटते नहीं, बल्कि वे हमें झकझोरते रहते हैं, पर साथ ही हमें खुद को समझने का अवसर भी देते हैं। मेरे पास ऐसी कई कड़वी यादें हैं। यद्यपि लिखते समय लज्जा का अनुभव हुआ, फिर भी लगा कि आत्मस्वीकार ही आत्मशुद्धि का प्रथम सोपान है। यदि यह साहित्य कम और आत्मदंड अधिक है, तो भी इसमें आत्मबोध का बीज निहित है।
अपने जीवन की विफलताओं को स्वीकार करना सरल नहीं। मैंने एक कोने में पड़े-पड़े, अनुकूल वातावरण के अभाव का बहाना बनाकर, वास्तविक जीवन से स्वयं को काटकर, और भीतर पलते हुए द्वेष को पोषित कर अपने जीवन को क्षीण किया। यह स्वीकार करना पीड़ादायक है, परंतु आवश्यक भी। हम सब कहीं-न-कहीं जीवन से कटे हुए हैं, और कमोबेश भीतर से अपंग हैं। यह स्वीकारोक्ति ही परिवर्तन की दिशा में पहला कदम हो सकती है। हम वास्तविक जीवन से इतने दूर हो गए हैं कि उससे हमें वितृष्णा होने लगती है। हम उसे परिश्रम मानते हैं, बोझ समझते हैं, और किताबों की दुनिया में शरण ढूंढते हैं। फिर भी कभी-कभी हम व्याकुल हो उठते हैं, कुछ और चाहने लगते हैं, जबकि हमें स्वयं नहीं पता कि वह ‘कुछ और’ क्या है? यदि हमारी हर जिद या अधिक पाने की इच्छा पूरी हो जाए, तो संभव है हम और भी भ्रमित हो जाएं।
जरा सोचिए, यदि हमें खुली छूट दे दी जाए, हमारे ऊपर से नियंत्रण हटा लिया जाए, तो क्या हम सचमुच उसे संभाल पाएंगे? शायद नहीं। यह कटु सत्य है कि हम अक्सर अपनी कायरता को ही विवेक का नाम दे देते हैं और आत्मप्रवंचना में सांत्वना खोज लेते हैं। मैंने जो अतिशयता अपनाई, वह केवल उसी प्रवृत्ति का चरम रूप है, जिसे अनेक लोग भीतर ही भीतर जीते हैं, पर स्वीकार नहीं करते। संभव है, इसी कारण मेरे भीतर अब भी जीवन की एक तीव्र आकांक्षा शेष है। आज स्थिति यह है कि हम जीने का अर्थ ही भूलते जा रहे हैं। यदि पुस्तकों का सहारा छिन जाए, तो हम दिशाहीन हो जाएंगे। हमें समझ नहीं आएगा कि किससे जुड़ें, किससे प्रेम करें, किसका सम्मान करें। रक्त-मांस से बने वास्तविक मनुष्य होने में हमें संकोच होता है और हम अमूर्त आदर्शों के पीछे छिपना चाहते हैं। हम विचारों में जन्म लेना चाहते हैं, क्योंकि वास्तविकता का भार हमें असह्य लगता है।
परंतु यहीं ठहरकर सोचना चाहिए। यदि हम अपने भीतर की इन नकारात्मक प्रवृत्तियों को पहचान लें, तो शायद इनसे ऊपर उठने का मार्ग भी खोज सकें। आत्मस्वीकार, चाहे वह कितना ही कठोर क्यों न हो, मनुष्य को पुनर्जन्म की ओर ले जा सकता है। अब मैं इतना अवश्य कहूंगा कि जीवन से विमुख होकर नहीं, बल्कि उसका सामना करके ही हम स्वयं को पा सकते हैं।
सूत्र: कमियों को स्वीकार करें
जीवन की कटु स्मृतियों और विफलताओं को स्वीकार करना कायरता नहीं, बल्कि साहस का परिचायक है। वास्तविक जीवन की चुनौतियों से डरकर पुस्तकों या आदर्शों में छिपने के बजाय यथार्थ का सामना करना ही हमें जीवंत बनाता है। जो व्यक्ति अपनी कमियों को स्वीकार कर आत्मबोध प्राप्त करता है, वही स्वयं को बदलने की शक्ति रखता है।