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जीवन धारा: जीवन की सीमा ही उसे मूल्यवान बनाती है

Mon, 22 Jun 2026 07:00 AM IST
निर्मल कांत मार्टिन हाइडेगर

सार

जो व्यक्ति अपने अंत को जानता है, वह समय को हल्के में नहीं लेता। वह समझता है कि जीवन कोई अनंत भंडार नहीं, बल्कि एक सीमित अवसर है। यही सीमा जीवन को मूल्यवान बनाती है।
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सांकेतिक तस्वीर - फोटो : अमर उजाला प्रिंट
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विस्तार
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मनुष्य इस संसार में एक ऐसी सत्ता है, जो केवल जीती ही नहीं है, बल्कि अपने होने के बारे में सवाल भी करती है। पत्थर, वृक्ष, पशु आदि अस्तित्व में तो हैं, पर वे अपने अस्तित्व पर विचार नहीं करते। लेकिन, मनुष्य अलग है, क्योंकि वह जानता है कि वह है। मनुष्य यह भी जानता है कि एक दिन वह नहीं रहेगा। यह ऐसा शाश्वत सत्य है, जिससे सामान्यतः मनुष्य बचना चाहता है। वह अपने जीवन को ऐसे व्यवस्थित करता है, मानो समय असीम हो। वह योजनाएं बनाता है, इच्छाएं संजोता है, महत्वाकांक्षाएं पालता है और इन सबके बीच यह भूल जाता है कि उसका समय सीमित है।
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यहीं से एक विचित्र स्थिति जन्म लेती है। मनुष्य जीवन में उपस्थित तो रहता है, पर वास्तव में जीता नहीं। वह भीड़ के विचारों में बहता है। और इस तरह वह अपने जीवन को समाज की अपेक्षाओं के अनुसार ढालने लगता है। पर, एक क्षण ऐसा आता है, जब मनुष्य अनुभव करता है कि मृत्यु कोई ऐसी घटना नहीं, जो केवल दूसरों के साथ घटेगी, वह मेरी भी संभावना है। यह अनुभूति उसमें भय पैदा करती है। यदि मनुष्य इस भय से भागने के बजाय उसका सामना करे, तो एक अद्भुत बदलाव संभव हो सकता है।

जब मैं समझ लेता हूं कि मेरा समय सीमित है, तब जीवन का अर्थ बदलने लगता है। तब मैं पूछता हूं-क्या मैं वास्तव में वही जीवन जी रहा हूं, जो मेरा अपना है? क्या मेरी इच्छाएं वास्तव में मेरी हैं? क्या मेरे फैसले वाकई मेरे हैं, या मैं केवल दूसरों की अपेक्षाओं का अनुसरण कर रहा हूं? मृत्यु का बोध इन प्रश्नों को जन्म देता है। और यही प्रश्न मनुष्य को प्रामाणिकता की ओर ले जाते हैं। प्रामाणिक जीवन का अर्थ यह है कि वह अपनी सीमा को स्वीकार कर ले। वह जान ले कि हर दिन एक ऐसा दिन है, जो फिर लौट कर नहीं आएगा। जब यह समझ गहरी हो जाती है, तब वर्तमान क्षण साधारण नहीं रह जाता। इसका कारण यह नहीं कि संसार बदल गया है, बल्कि उसे देखने वाला बदल गया है। जो अपने अंत को जानता है, वह समय को हल्के में नहीं लेता। वह समझता है कि जीवन कोई अनंत भंडार नहीं, बल्कि एक सीमित अवसर है। यही सीमा जीवन को मूल्यवान बनाती है। जैसे किसी कविता की सुंदरता उसके शब्दों में ही नहीं, उसके अंत में भी निहित होती है, वैसे ही जीवन का अर्थ उसकी समाप्ति की संभावना से जुड़ा है।
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अस्ताचल की ओर जाता सूरज हमें यही सिखाता है। सूर्यास्त उदासी का दृश्य नहीं है, वह पूर्णता का दृश्य है। दिन समाप्त हो रहा है और इसी कारण उसका सौंदर्य अधिक तीव्र हो उठता है। यदि दिन कभी समाप्त न होता, तो शायद हम उसकी सुंदरता को महसूस ही न कर पाते। मनुष्य का जीवन भी ऐसा ही है। अपने अंत का ज्ञान हमें निराश करने के लिए नहीं है। उसका मकसद हमें जगाना है। वह हमें याद दिलाता है कि समय बह रहा है और इसलिए यही क्षण मूल्यवान है।
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