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जीवन धारा: जीवन अवसर देता है, दिशा नहीं

Tue, 23 Dec 2025 04:44 AM IST
निर्मल कांत मिशेल डी मोंटेग्ने

सार

दिशा हमारी इच्छा, समझ और सजगता से बनती है। जिसने जीने की कला सीख ली, वह थोड़े समय में भी जीवन का सार पा लेता है, और जिसने यह कला नहीं सीखी, वह लंबे जीवन में भी खाली हाथ रह सकता है।
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सांकेतिक तस्वीर - फोटो : अमर उजाला प्रिंट
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विस्तार
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जीवन का मूल्य दिनों की गिनती में नहीं, बल्कि इस बात में है कि हम उन दिनों को कैसे बरतते हैं। बहुत से लोग लंबा जीवन जीते हैं, पर जीवन उन्हें भीतर से समृद्ध नहीं कर पाता। और कई ऐसे भी होते हैं, जिनके दिन कम होते हैं, पर उनका अनुभव गहरा और पूरा होता है। मतलब समय अपने आप में कुछ नहीं है, उसे अर्थ हमारा विवेक और संकल्प देता है। मनुष्य प्रायः यह मान लेता है कि अधिक वर्ष सुख और संतोष देंगे, पर जीवन इस प्रकार नहीं चलता। जीवन हमें अवसर देता है, दिशा नहीं। दिशा हमारी इच्छा, हमारी समझ और हमारी सजगता से बनती है। जिसने जीने की कला सीख ली, वह थोड़े समय में भी जीवन का सार पा लेता है, और जिसने यह कला नहीं सीखी, वह लंबे जीवन में भी खाली हाथ रह सकता है। संतोष न तो भाग्य की देन है और न ही वर्षों की कमाई। वह हमारे भीतर की स्थिति है। यदि मन अशांत है, तो सुविधाओं और समय की अधिकता भी व्यर्थ हो जाती है। यदि मन स्थिर है, तो सीमित साधनों और कम समय में भी जीवन पूर्ण प्रतीत होता है। जीवन से मिलने वाली तृप्ति इस बात पर निर्भर करती है कि हम उसे कितनी स्पष्ट दृष्टि से देखते हैं, न कि इस पर कि वह कितना लंबा है। जीवन का सही उपयोग उसे समझने में है, न कि वर्ष गिनने में। जो व्यक्ति हर दिन को बिना देखे, बिना सोचे, केवल आदत में जीता है, वह धीरे-धीरे जीवन को खो देता है। इसके विपरीत, जो व्यक्ति स्वयं पर विचार करता है, अपने अनुभवों को परखता है और उनसे सीखता है, वह हर दिन जीवन को थोड़ा और गहराई से जीता है। आत्मचिंतन जीवन का बोझ नहीं, बल्कि प्रकाश है। मनुष्य अक्सर जीवन को भविष्य की चिंता में या अतीत की स्मृतियों में नष्ट कर देता है। वह वर्तमान को जीने के स्थान पर टालता रहता है। पर जीवन केवल इसी क्षण में उपस्थित होता है। जो वर्तमान से चूक गया, वह जीवन से चूक गया। समय को थामना हमारे वश में नहीं, पर इस क्षण को समझना और जीना वश में अवश्य है। जीवन को समझदारी के साथ हल्केपन में जीना अधिक स्वाभाविक है। हंसी, स्वीकार और संतुलन, ये जीवन के सच्चे सहचर हैं। जो हर गिरावट को अपमान समझता है, वह जीवन से डरने लगता है। और जो गिरने में भी सीख देखता है, वह जीवन के निकट पहुंच जाता है।
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आज मनुष्य तुलना में उलझा हुआ है। वह अपने वर्षों को दूसरों के वर्षों से तौलता है, अपने जीवन को दूसरों के जीवन से आंकता है। पर जीवन कोई समान माप का वस्त्र नहीं है। हर व्यक्ति को अपना जीवन स्वयं समझना होता है, स्वयं जीना होता है। दूसरे की गति, दूसरे की उपलब्धि, दूसरे की राह, इनसे जीवन का मूल्य तय नहीं होता। जीवन की महानता उसके विस्तार में नहीं, उसकी सजगता में है। जिसने जीना जान लिया, उसके लिए समय पर्याप्त है। और जिसने नहीं जाना, उसके लिए अनंत समय भी कम है।

सूत्र: सकारात्मक रहें
जीवन सदा ही सुंदर रहा है, अंतर केवल देखने के दृष्टिकोण का है। कोई कमल के फूल को देखकर उसे कीचड़ में उगा हुआ कहकर दूर हो जाता है, जबकि जो उसकी वास्तविक सुंदरता को पहचानता है, उसके लिए वही दृश्य आनंद का क्षण बन जाता है। जीवन भी ठीक इसी प्रकार है, जब सोच सकारात्मक होती है, तब सब कुछ अच्छा प्रतीत होने लगता है।
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