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जीवन धारा: लोकतांत्रिक ढांचे में 'व्यक्तिगत इच्छा' सर्वोपरि, लेकिन सुधार का संकल्प घर से शुरू हो

Mon, 26 Jan 2026 08:15 AM IST
पवन पांडेय महात्मा गांधी

सार

चिंतन की वास्तविक क्रांति तभी धरातल पर उतर सकती है, जब सुधार का हर संकल्प पहले 'अपने घर से' शुरू हो। लोकतांत्रिक ढांचे में 'व्यक्तिगत इच्छा' सर्वोपरि तो होती है, लेकिन वह 'सामाजिक इच्छा' यानी राज्य की मर्यादाओं से बंधी होती है।
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जीवन धारा: सुधार का संकल्प घर से शुरू हो - फोटो : Amar Ujala
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विस्तार
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लोकतंत्र केवल नियमों या प्रशासनिक बदलावों का नाम नहीं, बल्कि यह व्यक्ति के हृदय परिवर्तन की मांग करता है। इसकी नींव समाज में रचे-बसे उस 'भाईचारे' पर टिकी है, जो इसे महज एक राजनीतिक व्यवस्था से ऊपर उठाकर एक जीवंत मानवीय स्वरूप प्रदान करती है। वास्तव में, यह वह उत्कृष्ट कला व विज्ञान है, जो समाज के हर वर्ग के शारीरिक, आर्थिक और आध्यात्मिक संसाधनों को 'सर्वजन हिताय (सबकी भलाई)' के महान उद्देश्य के लिए एकजुट कर देता है।
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यही कारण है कि एक अनुशासित और प्रबुद्ध लोकतंत्र को दुनिया की सबसे सुंदर रचना माना जाता है। इसके विपरीत, यदि यही व्यवस्था पूर्वाग्रहों और अंधविश्वासों की जकड़न में फंस जाए, तो यह अराजकता की ओर बढ़ते हुए स्वयं के विनाश का मार्ग प्रशस्त कर लेती है। इस विनाश से बचने का एकमात्र मार्ग स्वतंत्र चिंतन है, जहां हर पुरुष और महिला को अपने विवेक से सोचना सिखाया जाता है। हालांकि, चिंतन की यह वास्तविक क्रांति तभी धरातल पर उतर सकती है, जब सुधार का हर संकल्प पहले 'अपने घर से' शुरू हो।

लोकतांत्रिक ढांचे में 'व्यक्तिगत इच्छा' सर्वोपरि तो होती है, लेकिन वह 'सामाजिक इच्छा' यानी राज्य की मर्यादाओं से बंधी होती है। स्वतंत्रता की असली परीक्षा भी यही है कि एक व्यक्ति अपनी मर्जी का मालिक तब तक है, जब तक उसकी गतिविधियों से किसी दूसरे के जीवन या संपत्ति को कोई आंच न आए। इस मर्यादा को आत्मसात करने वाला व्यक्ति ही 'जन्मजात लोकतंत्रवादी' कहलाता है, क्योंकि वह नियमों और कानूनों का पालन किसी दबाव में नहीं, बल्कि अपनी सहज इच्छा से करता है।
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लोकतंत्र का सच्चा सिपाही बनने की पहली शर्त 'निःस्वार्थ' होना है, क्योंकि यह पूरी व्यवस्था केवल आपसी 'विश्वास' के नाजुक धागों पर टिकी होती है। भारत के संदर्भ में देखें, तो इस लोकतांत्रिक भावना की सबसे बुनियादी इकाई हमारा 'गांव' है। लेकिन यहां एक गंभीर प्रश्न खड़ा होता है कि यदि बहुसंख्यक आबादी स्वार्थी और अविश्वसनीय हो जाए, तो 'पंचायत राज' का आदर्श भला कैसे सफल होगा?
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