सप्ताह में सात दिन होते हैं। इनमें से रविवार अवकाश का दिन होता है। सरकारी कार्यालयों में शनिवार भी आधी छुट्टी का दिन होता है। अब तो सप्ताह सात के बजाय पांच दिन का होने लगा है। लेकिन मन बेचारा रात-दिन काम में जुटा रहता है। एक क्षण के लिए भी छुट्टी नहीं लेता। क्या ही अच्छा रहे कि मन भी रविवार के दिन छुट्टी मनाया करे! मन को भी अवकाश मिलना चाहिए। लेकिन प्रश्न है कि मन को छुट्टी मिले कैसे? छुट्टी न भी मिले तो कोई बात नहीं, किंतु बुरे विचारों और नकारात्मक विचारों से तो इसे बचाया ही जाना चाहिए।
मन में कचरा भरा है, तो किसी अच्छे चिंतन के लिए अवकाश कहां रहता है? एक व्यक्ति किसी महात्मा के पास गया और निवेदन किया कि उपदेश सुनाएं। महात्मा को उस व्यक्ति का आभामंडल अच्छा नहीं लगा। दूसरे शब्दों में कहें, तो वह व्यक्ति महात्मा जी को उपदेश ग्रहण करने का पात्र नहीं लगा। उसकी आकृति और प्रकृति बता रही थी कि यह अतिशय चंचल मन वाला व्यक्ति है।
महात्मा जी ने टालने के अंदाज में कहा, ‘फिर कभी आना।’ उस व्यक्ति ने कहा, ‘कोई बात नहीं, कभी अमृत वचन सुनाने की कृपा कर दीजिएगा, किंतु आज इतनी कृपा कर दें कि मेरे हाथ से थोड़ी-सी भिक्षा ग्रहण करें।’ साधु ने स्वीकृति दे दी। महात्मा जी अपने कक्ष में गए। वहां से एक पात्र लेकर आए और उस व्यक्ति के साथ उसके घर गए। वहां भिक्षा लेने के लिए जब झोली से पात्र निकाला तो देखा उसमें कूड़ा, करकट और मिट्टी भरी है। भक्त ने भिक्षा देने के लिए बढ़ाया हुआ अपना हाथ रोक लिया। बोला, ‘महाराज! पात्र में तो गंदगी भरी है। इसमें खीर और मालपुए के लिए गुंजाइश कहां है? पहले पात्र को खाली करें। अन्यथा इसमें भी जो अच्छी चीज डाली जाएगी, वह खराब हो जाएगी।’
महात्मा जी ने कहा, ‘मैंने भी तुम्हें इसलिए उपदेश नहीं दिया, क्योंकि तुम खाली नहीं हो। बहुत-सी गंदी चीजें तुम्हारे मन में भरी हुई हैं। पहले मन को उनसे खाली करो, फिर अच्छी चीज के लिए उसमें जगह मिलेगी। अभी जो भी उसमें डाला जाएगा, वह अच्छा होकर भी खराब हो जाएगा। इसलिए मन के शोधन का उपाय खोजें। महर्षि पतंजलि ने योगसूत्र में लिखा है, ‘योगश्चित्तवृत्तिनिरोध:।’ योग का मतलब है चित्तवृत्ति का निरोध करना। जितना शोधन, उतना अच्छा निरोध। मन के साथ जबर्दस्ती नहीं चलती। मन के साथ अगर कोई जबर्दस्ती करने की कोशिश करेगा, तो वह बागी हो जाएगा।
मन को नियंत्रित करने के लिए शोधन का उपाय काम में लिया जाना चाहिए। कुछ लोग मानसिक समस्या से मुक्त होने के लिए मन को जबर्दस्ती अपने कब्जे में लेना चाहते हैं। लेकिन मन आसानी से काबू में कहां आता है? मन को नियंत्रित करने का एक ही उपाय है-शोधन। उसके साथ मित्रता का व्यवहार करें। अपने भीतर की दुनिया को देखें, भाव जगत को देखें। भावों को समझने का प्रयत्न करें, सूक्ष्म की ओर जाएं, तो व्यक्ति अपने लिए दूसरों के लिए भी उपयोगी हो सकता है, शांतिमय वातावरण का निर्माण कर सकता है।
सूत्र- सरल बनें
क्रोध एक नकारात्मक भाव है, तो क्षमा में उसका सकारात्मक भाव मौजूद है। इसी तरह अहंकार के सामने विनम्रता, मृदुता, छल-कपट के सामने सरलता, लोभ के सामने संतोष, घृणा के सामने प्रेम आदि ऐसे शक्तिशाली हथियार हैं, जिनके सामने किसी भी तरह के नकारात्मक भाव बेअसर साबित हो सकते हैं।