क्या आपने कुम्हार को बर्तन बनाते देखा है? वह मिट्टी को थपथपाता है, दबाता है, चाक पर भी घुमाता है और फिर आग में तपाता है। तब कहीं जाकर बर्तन बनता है। उसी तरह हृदय भी जीवन की अग्नि में तपता है, ताकि वह आनंद को धारण करने की क्षमता पा सके। यदि जीवन में कभी दुख नहीं आए, तो फिर हृदय इतना विशाल कैसे बनेगा कि उसमें आनंद का महासागर समा सके? हम अक्सर कहते हैं-‘मैं केवल सुख चाहता हूं।’ पर, क्या ऐसा संभव है? क्या कभी ऐसा हुआ है कि केवल दिन ही हो और रात न आए? केवल वसंत ही हो और पतझड़ न आए? यदि ऐसा हो, तो ऋतुएं अपना अर्थ खो देंगी। इसी तरह यदि जीवन में केवल आनंद ही होता, तो हम उसे पहचान भी नहीं पाते। आनंद कोई स्थायी महल नहीं है, जिसमें मनुष्य सदा के लिए बस जाए। वह तो सुबह की ओस की बूंद के समान है, जो सूरज की पहली किरण के साथ चमकती है और फिर विलीन हो जाती है। पर, उसका विलीन होना व्यर्थ नहीं है, वह धरती में उतर कर फिर किसी नए फूल का जीवन बन जाती है। इसलिए, जब आनंद आपके पास आए, तो उसे कैद न करें। उसे खुला आकाश दें। वह जितनी स्वतंत्रता से आएगा, उतनी ही सुंदर स्मृति बनकर जाएगा। और, जब दुख आए, तो उसके लिए भी अपने दरवाजे बंद मत करिए। दुख एक मौन शिक्षक है। वह यह दिखाने आता है कि हमारा हृदय किन चीजों से बंधा है।
सुख और दुख दो अलग नहीं, बल्कि एक ही रास्ते के दो पड़ाव हैं। अगर आज आंखों में आंसू हैं, तो उन्हें छिपाने का प्रयास न करें। यही आंसू कल मुस्कान को गहराई देंगे। जो व्यक्ति कभी रोया नहीं, उसकी हंसी भी सतही होती है। पर, जिसने अपने भीतर दुख का समुद्र पार किया है, उसकी मुस्कान में करुणा, विनम्रता होती है और एक ऐसा प्रकाश होता है, जो दूसरों के अंधकार को भी थोड़ा कम कर देता है। इसलिए, किसी भी सुख को अंतिम और दुख को शाश्वत न समझें। जीवन आपको बार-बार खाली करेगा और फिर भर देगा। यह रिक्त होना और भरना ही उसका संगीत है। बांसुरी इसलिए मधुर बजती है, क्योंकि वह भीतर से खोखली होती है। यदि वह अपने भीतर सब कुछ भर लेती, तो संगीत जन्म न लेता। इसलिए हृदय को खुला रखें। जब आनंद आए, उसका स्वागत करें। जब दुख आए, तो उसे भी अतिथि की तरह स्थान दें। अंततः आप पाएंगे कि दोनों आपको एक ही सत्य की ओर ले जा रहे थे, उस सत्य की ओर, जहां मनुष्य बाहरी परिस्थितियों से नहीं, बल्कि अपने भीतर के प्रकाश से जीना सीखता है। तभी आप वास्तव में जीवन का स्वाद चख पाएंगे।