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जीवन धारा: अच्छी पुस्तकें स्थायी साथी... सत्य की खोज महंगे लैब बिना भी संभव; मन की शक्ति से नियंत्रण संभव...

Sat, 06 Sep 2025 06:48 AM IST
ज्योति भास्कर डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम, पूर्व राष्ट्रपति

सार

आइंस्टीन बारह वर्ष की उम्र में यूक्लिडियन ज्योमेट्री पर लिखी किताब पढ़कर समझ पाए कि सर्वमान्य सत्य की खोज बिना किसी महंगी प्रयोगशाला और उपकरण की मदद के भी की जा सकती है। इस प्रक्रिया को सिर्फ मन की शक्ति से नियंत्रित किया जाता है।
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एपीजे अब्दुल कलाम (ग्राफिक्स) - फोटो : kavya
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विस्तार
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धरती पर विभिन्न कालखंडों में कई महान मानव सभ्यताओं का जन्म हुआ, किंतु उनमें से कुछ ही सभ्यताएं अस्तित्व में हैं। प्राचीनकाल में दार्शनिक और बाद में वैज्ञानिक, प्रौद्योगिकी विशेषज्ञ, अर्थशास्त्री और समाजशास्त्री, सभी ने मिलकर विभिन्न सभ्यताओं को संपन्न बनाया।

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भारतीय सभ्यता ने विभिन्न संस्कृतियों के संपर्क से होने वाले परिवर्तनों को स्वीकार करते हुए उन्हें अपने में रचा-बसा लिया। यही कारण है कि करोड़ों की जनसंख्या वाले हमारे समाज में विभिन्न संस्कृतियों, भाषाओं और धर्मों को मानने वाले लोग हैं, किंतु मानसिक स्तर पर हम सब एक हैं। इसका श्रेय हमारे चिंतकों को जाता है।

हमारे यहां महाभारत, तिरुक्कुरल, कबीरवाणी और नारायणीयम जैसे ग्रंथों की परंपरा रही है, जो आज भी कायम है। किसी अच्छी पुस्तक के संपर्क में आने और उसका संग्रह करने से जिंदगी हमेशा के लिए खुशहाल बन जाती है।
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अच्छी पुस्तकें हमारी स्थायी साथी बन जाती हैं। कई पुस्तकें काफी पहले लिखी गईं, किंतु वे अब भी हमारा जीवन भर मार्गदर्शन करती हैं और आगे भी कई पीढ़ियों को दिशा दिखाती रहेंगी। कला जिंदगी की खूबसूरती को बड़ी नजाकत से पेश करती है। यह मानव के अस्तित्व को अर्थ देने के साथ-साथ उसे शक्ति भी प्रदान करती है।

बारह साल की उम्र में अल्बर्ट आइंस्टीन ने अपने पथ प्रदर्शक मैक्स टालमुड से यूक्लिडियन ज्योमेट्री पर एक पुस्तक पाकर विस्मय का अनुभव किया था। इस पुस्तक को पढ़ने से आइंस्टीन ने विचार की असली दुनिया में कदम रखा और वह समझ पाए कि सर्वमान्य सत्य की खोज बिना किसी महंगी प्रयोगशाला और उपकरण की मदद के भी की जा सकती है। इस प्रक्रिया को सिर्फ मन की शक्ति से नियंत्रित किया जाता है।

हम अपने चारों ओर दुख और भाग्यवाद पाते हैं, किंतु हमारे अंदर की निष्ठा उन्हें चुनौती देती है। साहित्य इसी तरह हमारे मन को सबल बनाता है। लेखक समाज की चेतना के प्रहरी होते हैं। हमारे चिंतक और लेखकगण युवकों को तेजस्वी मन वाले नेता बना सकते हैं। वे अपने लेखन से युवकों के मन में उदारता और मानवता के भाव भर सकते हैं। वे नई पीढ़ी को अदम्य साहस की याद दिला सकते हैं, जिसके सहारे वे किसी भी प्रकार की दुर्बलता और अभाव पर विजय प्राप्त कर सकते हैं।  

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