आपने अब तक अपनी जिंदगी में जो कुछ भी किया, चाहे वह कॅरिअर बनाना हो, व्यवसाय खड़ा करना हो, धन कमाना हो या फिर पारिवारिक दायित्व का निर्वहन, अक्सर इन सबके पीछे एक ही उद्देश्य छिपा होता है, वह है खुश रहना। पर क्या आपको नहीं लगता कि इस सरल-सी चाह को पूरा करते-करते जीवन कहीं न कहीं उलझता ही चला जाता है। यदि आप किसी अन्य जीव के रूप में जन्म लेते, तो जिंदगी की चिंता सीमित होती, भूख लगती, आप पेट भरते और आपको सहज शांति मिल जाती। लेकिन एक इन्सान के रूप में, जीवन न केवल जीवित रहने की जरूरत है, बल्कि उसमें आनंद और शांति की तलाश भी है। मानव इतिहास की सबसे सुविधासंपन्न पीढ़ी है। आप एक बटन दबाकर साल भर का सामान मंगवा सकते हैं। सौ साल पहले राजा-महाराजाओं के पास भी ऐसी सुविधाएं नहीं थीं, जो आज आम आदमी की पहुंच में हैं। फिर भी, विडंबना यह है कि हम संतुष्ट, प्रसन्न और प्रेमपूर्ण पीढ़ी नहीं हैं। आखिर क्यों? क्या कभी हमने इसकी वजह जानने की कोशिश की है?
दरअसल, हमने बाहर की दुनिया को तो व्यवस्थित करने के लिए पूरी ताकत झोंक दी, पर भीतर की अव्यवस्था जस की तस बनी रही। यदि हम बाहरी चीजों को और नियंत्रित करने निकल पड़ें, तो इस धरती की ही सांसें थम जाएंगी। फिर भी हमें वह प्रसन्नता नहीं मिलेगी, जिसकी हम कामना करते हैं। यदि इतनी कोशिशों के बाद भी संतोष नहीं मिला, तो क्या यह समय नहीं है कि हम देखें कि गलती कहां हुई? यही वह क्षण है, जब दृष्टिकोण बदलना चाहिए।
आश्चर्य तो यह है कि पृथ्वी पर अधिकांश लोगों का एक भी दिन वैसा नहीं गुजरता, जैसा वे चाहते हैं। हर व्यक्ति ने कभी-न-कभी आनंद, शांति या प्रेम का स्पर्श अवश्य महसूस किया होगा, लेकिन ये क्षण हमेशा क्षणिक ही रहे। वे स्थायी नहीं बन पाए, क्योंकि मनुष्य का संतुलन साधारण-सी परिस्थितियों से भी डगमगा जाता है। एक मामूली-सी बात भी उसके भीतर हलचल पैदा कर सकती है। ऐसे में, सवाल यह नहीं कि खुशी मिलेगी या नहीं, बल्कि यह है कि क्या हम इसे स्थायी बना सकते हैं? और इसका उत्तर सीधा और स्पष्ट है-जब आप अपने अंदर से खुशी तलाश लेते हैं, तो आप स्वाभाविक रूप से संसार में शांति और प्रेम का स्रोत बन जाते हैं। फिर किसी धर्मग्रंथ, उपदेश या सिद्धांत की आवश्यकता नहीं रह जाती। आप जैसे ही भीतर से आनंदमय होते हैं, वैसे ही आपके अस्तित्व से सहज करुणा, सहज प्रेम और सहज शांति प्रवाहित होती है। वास्तव में, एक शांतिपूर्ण समाज और आनंदमय संसार के निर्माण का एकमात्र अचूक उपाय यही है कि प्रत्येक मनुष्य अपने भीतर उस प्रसन्नता के स्रोत को खोजे, जिसे वह बाहर तलाश रहा है। खुशी कोई उपलब्धि नहीं, जिसे बाहर तलाशा जाए, बल्कि यह आपके अस्तित्व का स्वभाव है। जब आपके भीतर शांति होगी, तो बाहर का संसार भी अपने आप सुंदर दिखाई देने लगेगा।
सूत्र: जीवन का परम उद्देश्य पहचानें
आंतरिक प्रसन्नता ही जीवन का परम उद्देश्य है, और इसे पाने का रास्ता तलाशने के लिए अपने भीतर की गहराई में उतरें, स्वयं को जानें, और उस आनंद को कायम रखें, जो संसार की किसी भी वस्तु या परिस्थिति से स्वतंत्र है। यही मानव जीवन की वास्तविक महत्ता है। शांतिपूर्ण समाज और आनंदमय संसार बनाने के लिए आंतरिक प्रसन्नता जरूरी है।