ज्यादातर लोग पछतावे को एक ऐसी भावना मानते हैं, जिससे बचना चाहिए। हम कहते हैं कि जो हो गया, उसे भूल जाओ या अतीत को बदल नहीं सकते या पीछे मुड़कर देखने से क्या फायदा, और कभी-कभी हम गर्व से यह भी कहते हैं कि मुझे किसी बात का पछतावा नहीं। लेकिन, क्या वास्तव में पछतावे से मुक्त होना हमेशा अच्छी बात है? शायद नहीं। पछतावा इस बात का प्रमाण नहीं है कि हमने जीवन गलत जिया, बल्कि वह इस बात का प्रमाण भी हो सकता है कि हमने अपने जीवन से कुछ सीखा है। हम पीछे मुड़ कर देखते हैं और पहली बार साफ-साफ देख पाते हैं कि कहां हमने गलत फैसले लिए और कहां डर को अपने ऊपर हावी होने दिया।
पछतावा अतीत का दरवाजा है, लेकिन उसका मकसद हमें उसी दरवाजे के भीतर बंद कर देना नहीं है। उसका उद्देश्य है कि हम उस दरवाजे से कुछ सीख कर बाहर निकलें। अतीत को बदला नहीं जा सकता, पर उससे मिलने वाली सीख भविष्य बदल सकती है। यही अंतर पछतावे को बोझ से बुद्धि में बदल देता है। हमारे जीवन में दो तरह की गलतियां होती हैं। कुछ वे, जिन्हें हमने किया और जिनके बारे में बाद में लगता है कि यह नहीं करना चाहिए था।
कभी हम गलत व्यक्ति पर विश्वास करते हैं, कभी सही व्यक्ति को वक्त नहीं देते, कभी कोई अवसर सामने होता है और हम डर जाते हैं। कभी हमें किसी प्रिय व्यक्ति के पास बैठना चाहिए था, पर नहीं बैठे। और फिर, वर्षों बाद यही सब क्षण हमारी स्मृति में लौटते हैं और तब हमें लगता है कि काश मैंने उस समय ऐसा किया होता! यही पछतावा है। पछतावा हमारे भीतर एक संदेश लेकर आता है। पछतावा हमारे मूल्यों का एक प्रकार का आईना है कि जिस चीज के खोने का हमें अफसोस है, अक्सर वही चीज हमारे लिए वास्तव में महत्वपूर्ण थी। पछतावा यदि सीख में न बदले, तो वह आत्म-दोष बन सकता है। हम बार-बार उसी घटना को याद करते हैं और अपने आप को कोसते रहते हैं कि मैंने ऐसा क्यों किया? इसलिए, पछतावे के साथ व्यवहार करने का एक बेहतर तरीका यह है कि पहले घटना को स्वीकार करें, फिर अपनी भावना को। उसके बाद स्वयं से पूछें कि इस अनुभव से मैं अपने भविष्य के लिए क्या नियम बना सकता हूं।
मैंने अवसर खो दिया-यह पछतावा है। अगली बार डर के कारण अवसर नहीं छोड़ूंगा-यह सीख है। यानी पछतावा तब उपयोगी होता है, जब वह व्यवहार को बदलता है। मैंने कुछ वर्षों को व्यर्थ जाने दिया, इसलिए अब अपने बचे हुए समय के प्रति अधिक सजग रहूंगा। यह दृष्टि अतीत को बदलती नहीं, पर उसका अर्थ बदल देती है। और, कभी-कभी यही हमारे पास उपलब्ध सबसे बड़ी स्वतंत्रता होती है। अतीत हमारा घर नहीं है। वह एक स्कूल है, बशर्ते हम उससे सीखना चाहें।
सूत्र: अतीत में न जिएं
जो बीत गया, उसे बदला नहीं जा सकता, पर उससे मिली सीख आने वाले कल को जरूर बदल सकती है। अपनी गलतियों को स्वीकार करें, खुद को क्षमा करें और हर पछतावे से एक नया सबक लें। अतीत में मत ठहरिए, उससे सीखकर आगे बढ़िए। क्योंकि, पछतावा तब बोझ बनता है, जब हम उसमें जीते हैं और बुद्धि तब बनती है, जब हम उससे सीखते हैं।