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गहराई में उतरने का वक्त: अबतक की तैयारियां यहीं पहुंचने की थीं, अब चेतना को अलग स्तर पर पहुंचते देखने की कोशिश

सार

यह नदी में पैर डालकर बैठने का नहीं, बल्कि गहराई में उतरने का समय है। इस दौर को ऐसे देखें, मानो अब तक की सारी तैयारियां यहीं पहुंचने की थीं। अब अपनी चेतना को एक अलग स्तर पर पहुंचते हुए देखने की कोशिश करें।
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मेडिटेशन (सांकेतिक) - फोटो : अमर उजाला प्रिंट ग्राफिक्स / एजेंसी
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विस्तार
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जीवन के पहले भाग का कार्य अपने लिए एक उचित पात्र बनाना और उसे इन आवश्यक प्रश्नों के उत्तर से भरना है, जैसे - ‘मुझे क्या महत्वपूर्ण बनाता है?’ और ‘मेरे साथ कौन चलेगा?’ जीवन के दूसरे भाग का कार्य, सीधे शब्दों में कहें, तो उस पात्र में निहित वास्तविक तत्वों को खोजना है।

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अधिकांश लोग इस अनमोल जीवन के बारे में सिर्फ योजना बनाते रहते हैं? पात्र अपने आप में कोई अंत नहीं है, बल्कि आपके गहन और पूर्णतम जीवन में आपको महज एक आधार देने के लिए मौजूद है! बहुत से लोग केवल पात्र की मरम्मत करते रहते हैं और कभी भी ‘अपने जाल गहरे सागर में नहीं डालते’ इसका अर्थ है, अपने जीवन के बड़े उद्देश्यों, गहरी सोच और वास्तविक समस्याओं की ओर वह कभी नहीं बढ़ते।

यदि वे आगे बढ़ेंगे, तो बड़ा खजाना पा सकते हैं, जो उनकी प्रतीक्षा कर रहा है। जीवन के पहले हिस्से में हम तीन बड़े सवालों से जूझते हैं, पहचान, सुरक्षा और बाहरी चीजों के पीछे भागना। ये तीन बड़ी चिंताएं हैं। ये हमें केवल व्यस्त ही नहीं रखतीं, बल्कि पूरी तरह से हम पर हावी हो जाती हैं। जब हम युवा होते हैं, तो इतने आत्म-केंद्रित होते हैं कि एक ही समय में बहुत रक्षात्मक व आक्रामक हो जाते हैं।
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हमारे पास स्वयं को देखने का, या प्रकृति के साथ जुड़ने के लिए समय ही नहीं बचता। जैसा कि कार्ल जंग ने जीवन को दो भागों में विभाजित करने का विचार लोकप्रिय किया, पहले भाग में एक स्वस्थ अहंकार का निर्माण होता है और दूसरे भाग में व्यक्ति बाहरी दुनिया से अंदर की ओर जाकर ‘स्वयं’ को एकीकृत करता है। जीवन के दूसरे भाग में हम चिंता से चिंतनशील हो जाते हैं।

इसका अर्थ है कि हम गहरे में स्थिर होना और आराम करना सीखते हैं, बजाय इसके कि हम रोजमर्रा की छोटी-छोटी बातों में उलझे रहें। एक उम्र के बाद, आप समझ जाते हैं कि यह सब कुछ एक दिन बीत जाने वाला है। जो चीजें आप 22 या 42 की उम्र में इतने जोश से चाहते थे या जिनके लिए गुस्सा हुए, अब उनका कोई मतलब नहीं रहता। तो, ‘चिंतन’ या ‘ध्यान’ का मतलब है एक अलग तरह की चेतना, जो समय को अलग ढंग से देखती है।

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