मनुष्य के छोटे-से-छोटे विचार, वचन अथवा कर्म से लेकर आकाशीय शक्ति पुंजों पर इसी विधान की सर्वोच्च सत्ता है। इसमें एक क्षण के लिए भी किसी की मनमानी नहीं चल सकती, क्योंकि इस तरह की स्वेच्छाचारिता का अर्थ इस विधान की अस्वीकृति अथवा उसे नकारना ही है। अत: जीवन की प्रत्येक दशा एक शृंखला से बंधी हुई है, इस प्रकार हरेक दशा का रहस्य अथवा कारण उसी के अंदर निहित है।
मनुष्य जैसा बोएगा, वैसा काटेगा। यह विधान समय के भाल पर स्वर्णाक्षरों में लिखा है। कोई इसे नकार नहीं सकता, इसे झुठला नहीं सकता और न ही इससे बचकर निकल सकता है। यदि कोई अपना हाथ आग पर रखेगा, तो वह जलेगा ही, जब तक कि आग स्वयं बुझ नहीं जाती। उससे होने वाली पीड़ा को न तो मनुष्य की कराहें और न ही प्रार्थनाएं दूर कर सकेंगी। ठीक वही नियम मन की दुनिया पर भी लागू होता है। घृणा, क्रोध, ईर्ष्या, स्पर्धा, काम व लोभ- ये सभी अग्नियां हैं, जो जलाती हैं। जो कोई इनका केवल स्पर्श मात्र करता है, उसे भी जलने की यातना को सहना पड़ेगा। मन की इन दशाओं को ठीक ही पाप कहा गया है, क्योंकि ये विधान को उखाड़ फेंकने की दिशा में अज्ञानता के कारण, किए गए प्रयत्न हैं और इसलिए ये हमें कष्ट और अनिश्चितता की ओर ले जाते हैं।
इस प्रकार हम देर या सवेर, बाहरी संकटों, जैसे दुख और पीड़ा अथवा निराशा से पूर्ण रोगों, असफलताओं एवं दुर्भाग्यों के द्वारा घिर जाते हैं। इस प्रकार विपरीत प्रेम, सद्भावना और पवित्रता, ये गुण आत्मा को सुख पहुंचाते हैं, और ये शाश्वत नियम से संबद्ध होते हैं, इसलिए स्वास्थ्य, शांति, स्थायी सफलता और सौभाग्य के रूप में हमारे सामने आते हैं।
सारे विश्व पर छाने वाले इस शाश्वत नियम को अच्छी तरह समझ लेने से मन उस अवस्था को प्राप्त होता है, जिसे समर्पण भावना कहते हैं। संसार में न्याय, अनुरूपता और प्रेम सबसे ऊपर है। इससे यह आशय निकलता है कि विपरीत और त्रासदायक दशाएं इस नियम के प्रति अवहेलना का परिणाम हैं। ऐसा ज्ञान हमें बल और शक्ति प्रदान करता है, और इसी की आधारशिला पर ही हम एक सच्चे जीवन, स्थायी सफलता व सुख का निर्माण कर सकते हैं।
सभी दिशाओं में अविचल बने रहने और सभी स्थितियों को अपने निखार के लिए आवश्यक मानकर स्वीकार करने का अर्थ है, सभी पीड़ादायक दशाओं से ऊपर उठ जाना और ऐसी विजय, जिसमें पीड़ाएं एवं कष्ट सिर नहीं उठा सकते! जो इस विधान को मानता है, उसके अनुसार चलता है, उसे चिरस्थायी सफलता मिलती है। वह जो कुछ रचनात्मक कार्य करता है, वह कभी नष्ट नहीं होता। समस्त शक्ति अथवा समस्त दुर्बलता का कारण हमारे अंदर विद्यमान है। -फ्रॉम पॉवर्टी टू पावर के अनूदित अंश
सूत्र: जैसा बोओगे, वैसा काटोगे
‘जैसा बोओगे, वैसा काटोगे’, यह अटल नियम जीवन के हर क्षण पर लागू होता है। इसलिए अपने विचारों को पवित्र, वचनों को मधुर और कर्मों को श्रेष्ठ बनाएं, क्योंकि भीतर की शुद्धता ही सुख, शांति, स्वास्थ्य और स्थायी सफलता का द्वार खोलती है और समर्पण भाव से सत्य के मार्ग पर चलने वाला व्यक्ति हर परिस्थिति को अवसर में बदल सकता है।