इस देश में शिक्षण संस्थानों में प्रवेश परीक्षाओं का आयोजन भी राजनीति का मुद्दा बन जाए, ऐसा शायद ही हुआ है। क्योंकि इसमें मन माफिक राजनीतिक मक्खन निकलने की संभावना कम ही रहती है। लेकिन इस दफा देश की दो अहम प्रवेश परीक्षाओं जेईई और नीट के आयोजन को लेकर भी मोदी सरकार और विपक्षी राज्य सरकारों के बीच ठन गई है।
इसी बहाने कांग्रेस ने विपक्ष को फिर एक मंच पर लाने का प्रयास नए सिरे से शुरू कर दिया है। विपक्ष की कोशिश है कि केंद्र सरकार इस मुद्दे पर संवेदनशीलता दिखाते हुए झुके तो सत्तापक्ष ने साफ संकेत दे दिए हैं कि परीक्षा तो होके रहेगी। जिसे जो करना है, कर ले।
केंद्रीय शिक्षा मंत्री रमेश पोखरियाल निशंक का कहना है कि प्रवेश परीक्षाएं अभिभावकों के अनुरोध पर आयोजित की जा रही हैं। जबकि विपक्ष और कई छात्रों का तर्क है कि देश में कोरोना के बढ़ते संक्रमण, देश के कई राज्यों में बाढ़ की स्थिति तथा आवागमन के साधनों के अभाव के चलते इन दोनो प्रवेश परीक्षाओं को टाला जाना चाहिए।
इसको लेकर सुप्रीम कोर्ट में याचिका भी दायर की गई थी, लेकिन कोर्ट ने कहा कि कोरोना के कारण जिंदगी की रफ्तार तो रोकी नहीं जा सकती। लेफ्ट और कांग्रेस से जुड़े छात्र संगठन इस मुद्दे को सड़क की लड़ाई में तब्दील करने का प्रयास कर रहे हैं।
दूसरी तरफ परीक्षा के आयोजन के समर्थक अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद और विद्यार्थी मित्र ने दावा किया कि उन्होंने इस माह के शुरू में ही जेईई नीट में शामिल होने के इच्छुक विद्यार्थियों के लिए प्रेक्टिस के तौर पर ऑनलाइन माॅक टेस्ट आयोजित कराए, जिसमें बड़ी तादाद में छात्रों ने भाग लिया।
हालांकि ये परीक्षाएं हो या नहीं, इसको लेकर छात्र भी एक मत नहीं है। जो छात्र परीक्षा को लेकर बहुत गंभीर हैं, वो नहीं चाहते कि उनका एक साल बर्बाद हो। लेकिन बहुत से छात्रों का मानना है कि कोरोना संक्रमण का खतरा उठाकर परीक्षा देने जाना आपदा को खुद न्यौता देने जैसा है।
उनका यह भी कहना है कि जब बहुत से जरूरी काम टाले जा रहे हैं तो सरकार इन प्रतियोगी परीक्षाओं को आयोजित करने पर क्यों अड़ी हुई है? यानी राजनीति दोतरफा है। और ये लड़ाई अब सत्तापक्ष और विपक्ष की मूंछ की लड़ाई में तब्दील होती दीख रही है। लेकिन इन सब के पीछे कुछ जायज सवाल भी हैं, जिनका जवाब तो सरकार को देना ही होगा।
देश की इन दो प्रतिष्ठित प्रवेश परीक्षाओं का आयोजन राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनटीए) करती है। कोरोना वायरस के व्यापक संक्रमण और सोशल डिस्टेंसिंग की जरूरत के चलते इन परीक्षाओं को स्थिति सामान्य होने तक स्थगित करने की मांग उठ रही थी।
शुरू में यह कुछ छात्रों की ओर से ही थी। लेकिन जल्द ही राजनीतिक दल भी उनके समर्थन में उतर आए। इससे उन छात्रों में भी असमंजस फैला जो परीक्षा की तैयारी पूरी गंभीरता से कर रहे थे। हालांकि कोरोना का डर उनके मन में भी रहा है। वामपंथी छात्र संगठन ऑल इंडिया स्टूडेंट एसोसिएशन (आइसा) के तत्वावधान में चार हजार परीक्षार्थियों ने एक दिनी भूख हड़ताल की।
वैसे आइसा इस शैक्षणिक वर्ष को ‘शून्य वर्ष’ घोषित करने की मांग भी कर रहा है। ट्विटर पर भी #सत्याग्रहअगेंस्टएक्जामकोविड काफी ट्रेंड हुआ। कांग्रेस से जुड़े एनएसयूआई भी परीक्षा आयोजन का विरोध कर रहा है। तर्क दिया जा रहा है कि जब देश में कोरोना के कारण करीब 60 हजार मौतें हो चुकी हैं, तब प्रवेश परीक्षा आयोजित कर लाखों छात्रों की जान जोखिम में डालना कहां तक उचित है?