coronavirus संक्रमण रोकने के लिए लगाए गए जनता कर्फ्यू के दौरान सायं पांच बजे कोरोना सेनानियों के सम्मान में ताली, थाली और शंख बजाते लोग।
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इसमें कोई दो राय नहीं कि मौजूदा दौर के वैश्विक नेताओं में भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपना अलग स्थान रखते हैं। वे ऐसे राष्ट्र प्रमुख हैं, जिनसे एक ही समय में अमेरिका, रूस, चीन,जापान जैसे मुल्कों के राष्ट्र् प्रमुख दोस्ताना संबंध का भरोसा रखते हैं और मोदीजी उनके यकीन पर खरे भी उतरते हैं और देश हित को सर्वोपरि रखते हुए उस भरोसे को आगे बढ़ाते हैं।
एक तरफ अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प तो दूसरी तरफ मोदी बराबरी का कद बनाए हुए हैं। उन्हीं मोदीजी के आग्रह को देशवासियों ने मानकर यह बता दिया कि वे हर बेहतर पहल का सम्मान करना जानते हैं।
कभी वक्त था जब देश के तत्कालीन प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री को यह रुतबा हासिल था। 1965 के बुरे दौर में शास्त्रीजी ने अपील की थी कि देशवासी प्रति सोमवार को एक समय ही भोजन करें, ताकि अन्न संकट से जूझ रहा देश थोड़ी राहत महसूस कर सके।
इसका असर हुआ और हम उस दौर को निकाल ले गए। तब शास्त्रीजी ने ही जय जवान, जय किसान का नारा देकर देश के प्रति अपनी सोच का इजहार किया था। अफसोस वे असमय विदा हो गए और देश उनके दृढ़ सोच के बूते मजबूती हासिल करने का अवसर गवां बैठा।
बहरहाल, कोरोना के संदर्भ में बात करें तो इस महामारी के फैलने के बाद जब काफी हद तक यह बेकाबू हो गई और यह बात समझ आए कि दवाओं के जरिए उपचार की बजाय सावधानी व एकांत में रहकर इससे काफी हद तक बचा जा सकता है, तब तक काफी देर हो चुकी थी।
इसे भारतीय प्रधानमंत्री ने ससमय समझा और चंद भारतीय लोगों की मौत से ही सबक लेकर वो कदम उठाया, जिसकी सराहना दुनिया कर रही है। 22 मार्च को जनता कर्फ्यू के जबरदस्त सफल होने को दुनिया भी देख ही चुकी है, जिससे उसे आगे के लिए अपने देश में भी इसका पालन कराने में आसानी हो जाएगी।
इसी के साथ मोदीजी की यह अपील भी बेहद अनुकूल और असरकारी रही कि आपदा से निपटने के जतन भी बंद नहीं किया जा सकते और जो लोग इस प्रक्रिया में रात-दिन लगे हैं,उनका सम्मान भी जरूरी है। इसलिए 22 मार्च को तमाम देशवासी अपने घर के दरवाजे-खिडक़ी पर खड़े रहकर ताली-थाली, झांझ-मजीरे बजाकर उनका अभिनंदन करने की बात भी लोगों के दिल को छू गई। उसने देश मेें ऐसे अवसर पर जान का बाजी लगाने वालों में भी जोश भर दिया।
मोदीजी की यह युक्ति भी एक सजग और बड़प्पन से भरे अभिभावक की तरह साबित हुई, जब बच्चों से अच्छा काम कराने के लिए हम उन्हें कुछ प्रोत्साहन देने का कहते हैं। देश में हजारों-लाखों डॉक्टर, स्वास्थ्यकर्मी, सफाईकर्मी,परिवहन सेवा में रत लोग, मीडियाकर्मी, पुलिस, सुरक्षा बल जैसी अनेक एजेंसी सब कुछ भूलकर अपना दायित्व निभा रही हैं।
वे निश्चित ही दुगने जोश से अब अपना काम करेंगे। यह प्रयोग बताता है कि किस तरह छोटे-छोटे उपाय के जरिये भी आप बड़ी मुसीबत से निपट सकते हैं। कारोबार, दफ्तरों को बंद कर, बुजुर्गों को घर में रहने की ताकीद कर, स्कूल-कॉलेजों के अवकाश कर इस महामारी के आक्रमण की 90 प्रतिशत तक आशंका को कम कर दिया गया।
ताज्जुब नहीं कि दुनिया इस तरीके को अब अपने यहां भी अपनाये और वांछित परिणाम प्राप्त कर लें। जो बीमारी संक्रमण से बढ़ती है, वहां ऐसे उपाय आगे के लिये भी मानक का काम करेंगे। भारत ने जनता कफ्र्यू के सफल प्रयोग के जरिये 1962 व 1965 के भारत-चीन युद्ध के दिनों को भी याद कर लिया।
हालांकि,तब केवल रात में साइरन बजने के बाद अंधेरा छा जाता था । तब घर के अंदर मोमबत्ती, दीया तक नहीं जलाया जाता था। उससे आगे जाकर लोगों ने स्व अनुशासन का पालन करते हुए ऐसी मिसाल कायम की है, जो दुनिया में याद रखी जायेगी और इस तरह का आचरण भी संकट के वक्त सुविधाजनक तरीके से कर सकेगी।
यह प्रवृत्ति हमारी राष्ट्र चेतना का प्रतीक बनकर उभरी है, जिसे आगे भी कायम रखने की दरकार है। आज तो हम सीना तानकर गर्व महसूस कर सकते हैं कि इस भयावह संकट से निपटने की दिशा में हमने मजबूती से करोड़ों कदम आगे बढ़ाए हैंं।
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