प्रतिभा और परिश्रम का संसार: लोकल से ग्लोबल तक का सफर
- फोटो : instagram/ravirajmurmu
इस कहानी में एक राजनीतिक और दार्शनिक संदेश छिपा है। रवि राज मुर्मु के अनुसार उन्होंने देवियों को प्रतीकात्मक रूप से 'विकास' के प्रतीक के रूप में दर्शाने का प्रयास किया है। 'विकास' जिसका अंधाधुंध अनुसरण हमें एक ऐसे मोड़ पर ले जा रहा है, जहां से वापसी असंभव है।
फिल्म का अंत जानबूझकर खुला छोड़ा गया है, क्योंकि इसी कहानी पर पूरी फीचर फिल्म अभी बननी बाकी है। रवि मुर्मू के अनुसार यह फिल्म एक पौराणिक कथा मात्र नहीं है, बल्कि यह आदिवासी समाज और प्रकृति के बदलते रिश्ते की कहानी भी है। तेजी से हो रहे शहरीकरण के कारण जंगल, जल स्रोत और वे स्थान लगातार खत्म हो रहे हैं, जिन्हें आदिवासी समुदाय अपनी सांस्कृतिक और आध्यात्मिक पहचान का हिस्सा मानता है। फिल्म में पानी को दो दुनियाओं के बीच पुल के रूप में दिखाया गया है। रवि का कहना है, विज्ञान भी मानता है, जीवन की शुरुआत पानी से हुई थी, इसलिए उन्होंने इसे फिल्म का केंद्रीय प्रतीक बनाया।
पुरस्कार मिलने पर ‘आंगेन’ फिल्म के निर्माता-निर्देशक रवि राज मुर्मू खुश हैं। उन्हें इसकी उम्मीद नहीं थी। इसे उन्होंने 2024 में जमशेदपुर के करीम सिटी कॉलेज के अपने छात्रों के साथ मस्ती-मजाक में बनाया था। जब वे उन्हें फिल्म निर्माण की बारीकियां सिखा रहे थे। वे लोग पास के प्राकृतिक स्थलों पर गए, वहां इसकी शूटिंग की। वे इस लघु फ़िल्म को फीचर फिल्में बनाने के लिए एक लॉन्चिंग पैड मानते हैं। वे आदिवासी कहानियों और एक-दूसरे के साथ उनके अंतर्संबंध दिखाने हेतु आदिवासी भाषाओं – संथाली, हो, मुंडारी आदि – का उपयोग करके एक फीचर फिल्म बनाने की योजना बना रहे हैं। रवि राज को अपनी पहली फ़ीचर लिए कम-से-कम 10-15 करोड़ रुपये की आवश्यकता होगी।
उन्हें प्रोड्यूसर मिले, उनकी यह इच्छा पूरी हो, इसी शुभकामना के साथ उन्हें ‘आंगेन’ के गैर फ़ीचर फिल्म के राष्ट्रीय पुरस्कार की बधाई!
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