पीडीपी की अध्यक्षता महबूबा मुफ्ती
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जम्मू-कश्मीर में सुरक्षा संबंधी चुनौतियां
बहरहाल, राज्यपाल ने इस फैसले के पीछे सुरक्षा संबंधी तर्क भी दिए हैं। देखा जाए तो जम्मू-कश्मीर में सुरक्षा संबंधी चुनौतियों से इनकार नहीं किया जा सकता। मगर इतने समय तक जब विधानसभा निलंबित थी, तब यह चुनौती बड़ी क्यों नहीं लगी? नई सरकार के गठन का प्रस्ताव मिलते ही यह चुनौती इतनी विकट क्यों हो गई? राज्यपाल के इस फैसले पर जम्मू-कश्मीर भाजपा का यह कहना कि नई सरकार के गठन की पहल चरमपंथियों के इशारे पर हुई थी, गले नहीं उतरता। यह चुने हुए प्रतिनिधियों के समर्थन से चुने हुए प्रतिनिधियों की सरकार बनाने का प्रस्ताव था, उसमें किसी की साजिश देखते हुए उसे खारिज कर देना लोकतांत्रिक प्रक्रिया नहीं कही जा सकती।
फैसलों से लोकतांत्रिक प्रक्रिया होती है कमजोर
राज्यपाल जैसे संवैधानिक पद पर बैठे व्यक्ति की ओर से ऐसे फैसले कर्इ बार लोकतांत्रिक प्रकिया में बाधक भी बनते हैं। देखा जाए तो राज्य में इस फैसले से न सिर्फ प्रशासन की नाहक कवायद बढ़ेगी, राज्य के कामकाज प्रभावित होंगे बल्कि, खजाने पर बोझ बढ़ेगा। यही नहीं दूसरी ओर बल्कि आम नागरिकों में लोकतांत्रिक प्रक्रिया पर से भरोसा भी कमजोर होता है।
इससे पहले वहां भाजपा और पीडीपी गठबंधन की सरकार थी, वह अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर पाई। बीच में ही संबंध विच्छेद हो गया, तो यह उन दोनों पार्टियों के बीच मतभेद की वजह से हुआ। फिर करीब छह महीने तक विधानसभा को निलंबित रखा गया। जब वहां नए राज्यपाल नियुक्त हुए, तो उम्मीद बनी थी कि लोकतंत्र की बहाली का रास्ता खुलेगा, पर उनकी तरफ से ऐसी कोई पहल नहीं दिखी। यूं कहें कि राज्यपाल ने विधानसभा भंग करने का फैसला सुनाकर अच्छा नहीं किया। उन्हें राज्य में एक लोकतांत्रिक सरकार के गठन का मौका देना चाहिए था। राज्य में जनता के लोकतांत्रिक अधिकारों, वहां की स्थितियों के लिए कोई एक नहीं बल्कि सारे सियासी दल जिम्मेदार हैं। पहले जोड़-तोड़ और अवसर के बल पर सरकार बना लेना और बाद सत्ता की तनातनी के बीच अलग हो जाना। यह लोकतंत्र के लिए अच्छा नहीं है। वह भी जम्मू कश्मीर जैसे राज्य में तो बिल्कुल भी नहीं।
बहरहाल, देखना यह है कि विधानसभा भंग किए जाने का मसला कहां जाकर ठहरता है।
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